यह सब मात्र संयोग नहीं है, न ही एक दिन का प्रयोग है जो आज लाखों का वेतन लेने वाले आराम से कुर्सियां तोड़ रहें और पांच हजार महीना वाले उनकी जगह खट रहें, जी तोड़ मेहनत कर रहे और दिहाड़ी के हिसाब से भी 100 रूपये दिन के हिसाब से 8 घंटे मेहनत कर रहें जो जीवन जीने के लिए नाकाफी है । यह वित्त आयोग की वर्षों की अथक मेहनत, लगातार प्रयास और बिना विचलित हुए अपनी विचारधारा पर डटे रहने का परिणाम है कि कई वित्त आयोग लागू कर लगातार उनका वेतन बढ़ा रहा जो काम ही नहीं करते जबकि प्राइवेट शिक्षकों, मजदूरों, और कर्मचारियों की कोई सुनवाई नहीं ना उनके लिए कोर्ट के आदेश में या सरकार के एजेंडे में कोई व्यवस्था ! अब से 75 साल पहले जो गरीब खुद को अमीर बनाने के लिए छोटी सी राजनीति का बीज बोए थे वह अब विशाल वृक्ष बन चुका है। अब इसकी जलकुंभी और इसकी जड़ें समाज के हर हिस्से में समान रूप से फैल चुकी हैं। इस खतरनाक वृक्ष को उखाड़ना अब किसी के लिए भी संभव नहीं है क्योंकि अब इसकी सभी शाखाएं भ्रष्टाचार के तने का रूप ले चुकी हैं। नोटों की ढेर पर बैठा नेता अब यह एक ऐसा रावण है जिसके पास आरक्षण के दस सिर हैं, एससी – एसटी एक्ट की सौ भुजाएं है, लेकिन इसे ख़त्म करने की कोई नाभि नहीं है । मोदी जी के 12 साल के शासन की सबसे बड़ी सफलता यही है कि अब अभिषेक मनु सिंघवी जैसे धनाढय लोग संसद को भी नोट की चमक से चमकदार कर रहें। आपको बता दें कि विगत दिनों संसद सत्र के दौरान सीट नंबर 222 से पांच सौ रूपये की सौ नोटों वाली गड्डी मिली जिसपर किसी नें दावा नहीं किया जबकि जिस सीट से मिली वह कांग्रेस के सांसद और विवादित वकील अभिषेक मनु सिंघवी की सीट थी तो अब इससे अच्छे दिन और क्या देखें जनता ! एक ऐसे समाज का निर्माण हो चुका है जो अब नोटों से भरा हुआ है। अब उसे किसी नेतृत्व या मोटिवेशन की जरूरत नहीं है। गरीबों के प्रति जो नफरत लोगों में पहले किसी कोने में दबी रहती थी अब वो खुल कर सामने हैं। अब उनको सार्वजनिक रूप से इस नफरत के इजहार पर संकोच नहीं कर रहें । अब लोग इस नोट प्रदर्शन के सहारे निजी स्वार्थ साधने से लेकर राजनीतिक लक्ष्य प्राप्त करने में जोर शोर से लगे हुए हैं। जनता के प्रति यह नफरत समाज के सभी वर्गों और स्तरों पर समान रूप से पाई जाने लगी है। पुलिस, प्रशासन, न्यायपालिका, मीडिया, लेखक, कलाकार, खिलाड़ी, भूतपूर्व सैनिक, छात्र, गृहणी, व्यापारी, सरकारी अफसर और कर्मचारी, वकील आदि सभी लोग इस नोट प्रेम का इजहार करने में बढ़चढ़ कर आगे रहे हैं। कहीं कोई गुरेज या संकोच नहीं है क्योंकि उनको इस बात का अब पूर्ण विश्वास हो चुका है कि नोट के रहते न तो कानून उनका कुछ बिगाड़ सकता है और न ही पुलिस प्रशासन उनके खिलाफ कोई एक्शन लेगा। उन्हें पता है सत्ता और सरकार उनके साथ है और समाज में अब कहीं कोई उनका विरोध करने की स्थिति में नहीं है। इसके उलट इस कृत्य पर उन्हें मीडिया, सेलिब्रेटी, राजनीतिज्ञों, सामाजिक संगठनों का व्यापक समर्थन भी मिलेगा। इसी का नतीजा है कि एक दशक पहले गरीबी के इजहार का जो काम चंद झुग्गीयों के माध्यम से किया जाता था वह अब सार्वजनिक स्तर पर होने लगा है। चाहे वोह ट्रेन में किसी टोपी बेचने वाले बुजुर्ग से अभद्रता हो या बहराइच में गोली मार कर सवर्ण युवक की हत्या। ताजमहल में जल चढ़ाने की कोशिश हो या किसी घर पर चढ़ कर भगवा लहराने का बेमतलब भरा काम। मनोज मुंतशिर, सोनू निगम, कंगना रनौत, गौतम गंभीर, बबीता फोगाट जैसे सैकड़ों लोग हैं सार्वजनिक रूप से कांग्रेस के प्रति अपनी नफरत का इजहार कर चुके हैं। इसका उन्हें राजनैतिक और सामाजिक समर्थन भी हासिल हुआ है। प्रदेश के राजनीतिक विश्लेषक और जौनपुर के वरिष्ठ पत्रकार पंकज सीबी मिश्रा लिखते है कि किसी नेता ने चाहे आपका कुछ नहीं बिगाड़ा हो या उससे आपको कोई नुकसान होने की भी संभावना न हो लेकिन फिर भी आप उसका लोकतंत्र में विरोध तो कर सकते हैं और आपको मीडिया, पुलिस, प्रशासन, सामाजिक संगठनों का भरपूर समर्थन मिलने की पूरी गारंटी है पर बाद नें नोटों कि चमक से आपके समर्थन वाले आपका विरोध करेंगे और नोट वाले कि चापलूसी करेंगे । आधुनिक कहे जाने वाले शहरों में सोसाइटियां अब पूरी तरह से दिखावटीपन में जकड़ चुकी हैं। नोटवादी विचारधारा समाज के एक बड़े हिस्से पर अधिकार जमा चुकी है। 12 वर्ष की सत्ता ने इसको इतना खाद पानी दे दिया है कि अगले 120 साल तक इसको पोषण मिलता रहेगा। नोटों और आरक्षण के बल पर शिक्षा, पाठ्यक्रम, स्कूल, विश्वविद्यालय, इतिहास, लेखन, न्यायतंत्र, पुलिस, कानून सबके साथ खिलवाड़ हुआ है, व्यापक परिवर्तन किए गए हैं। कुछ के परिणाम अभी देखने को मिल रहे हैं और कुछ के अब से 20 साल बाद देखने को मिलेंगे। सवर्णो को विद्रोह की तरफ धकेला जा रहा जो आने वाले समय में एक ऐसा ज्वालामुखी बनेगा जिसे रोकपाना इन नेताओं के वश में नहीं होगा।

पंकज सीबी मिश्रा
