लखनऊ। कहते है दूध का जला छाँछ भी फूँक – फूँक कर पीता है तो कुछ ऐसा ही देखने को मिलेगा इस बार भाजपा के संगठन चुनाव में, ज़ब भाजपा के चुनावी पर्यवेक्षक जिलों से जिला आलाकमान की बागडोर इस बार उन्हें देंगे जो पार्टी के प्रति ईमानदार रहें है, पर्दे के पीछे से या फ्रंट से पार्टी के लिए जमीनी स्तर पर काम किए हो और जिनकी छवि जनपद के जनता में बेहद अच्छी और ईमानदार रही हो। आपको बता दें कि विगत लोकसभा चुनाव में जिलाध्यक्षो के निकृष्टता और गैर जिम्मेदाराना भूमिका के कारण बीजेपी अकेले पूर्ण बहुमत से वंचित हो गई और फ़ैजाबाद मछलीशहर, जौनपुर, चंदौली, गाजीपुर जैसे कई जिलों में लोकसभा चुनाव हार गई। बात जब संगठन के प्रदेश नेतृत्व तक पहुँची तो विश्लेषण हुआ और पता चला कि वर्तमान रहें सांसदों का तानाशाही रवैया और उनके साथ रहें जिलाध्यक्षो की मनमानी नें चुनाव में काफ़ी नुकसान पहुँचाया जिसके बाद अब पुनः नये सिरे से प्रदेश में बीजेपी संगठन तैयार किया जाना है। संगठनात्मक चुनाव की प्रक्रिया से गुजर रही भारतीय जनता पार्टी इस बार पारदर्शिता प्रदर्शित करने को पूरी कवायद में जुटी है। इस बार सूत्रों की माने तो पार्टी दो बार जिला या महानगर अध्यक्ष रह चुके लोगों को तीसरा मौका देने के मूड में नहीं है। मंडल अध्यक्षों के मामले में पार्टी पहले ही यह व्यवस्था लागू कर चुकी है।
अब यही प्रयोग जिलाध्यक्षों के चयन में भी प्रदेश संगठन की ओर से अपनाया जाएगा। संगठन की माने तो पार्टी ने जिलाध्यक्ष पद पर युवाओं को तरजीह देने का भी मन बनाया है जिसमें तय किया गया है कि जिलाध्यक्ष की आयु सीमा 45 से 60 वर्ष के बीच हो ताकि जिलाध्यक्ष सक्रिय रहकर लोगो के मध्य अपनी उपस्थिति दर्ज कराता रहें और युवाओं में पकड़ बनी रहें । अब ऐसे में तीसरी बार जिला या महानगर अध्यक्ष बनने की आस पालने वाले भाजपा नेताओं को झटका लग सकता है। पार्टी उन्हें तीसरी पारी खेलने का अवसर नहीं देगी। उनके स्थान पर नये चेहरों को अवसर दिया जाएगा। फिलहाल मंडल अध्यक्षों की चुनाव प्रक्रिया चल रही है। संगठन की पिछली बैठक के अनुसार इसके लिए 15 दिसंबर तक की समय सीमा तय की गई है। पार्टी सूत्रों की माने तो 20 दिसंबर तक मंडल अध्यक्षों का फैसला हो जाएगा । जिलाध्यक्षों की चयन प्रक्रिया भी 20 दिसंबर के बाद शुरू होगा। बूथ समिति और मंडल अध्यक्षों की तर्ज पर जिलाध्यक्षों की चुनाव प्रक्रिया से पहले प्रदेश स्तरीय कार्यशाला आयोजित की जाएगी जिसमें सभी दावेदारों को अपनी परफॉरमेंस देनी होगी। बूथ स्तर से लेकर जिलास्तर तक का लेखा जोखा प्रदर्शित करना होगा।
इससे पूर्व सभी जोन की बैठक संगठन चुनाव प्रभारियों नें ली और कार्यशाला आयोजन को लेकर रुपरेखा बनाया जिसमें सभी 98 संगठनात्मक जिलों के लिए अध्यक्ष पद के चुनाव की पूरी प्रक्रिया तय कर ली जाएगी। जिलों में ही नामांकन होंगे। वहां से पैनल प्रदेश को भेजे जाएंगे। जिलाध्यक्षों की घोषणा तो प्रदेश स्तर पर होगी। हालांकि सूत्रों का कहना है कि अंतिम मुहर दिल्ली से लगेगी। उधर, जिलाध्यक्ष पद के दावेदारों की लखनऊ दौड़ का सिलसिला तेज हो गया है। वे प्रदेश अध्यक्ष और महामंत्री संगठन के दरबार में हाजिरी लगा रहे हैं। हालांकि उनको यही समझाया जा रहा है कि नीचे से पैनल में नाम शामिल होना चाहिए। अध्यक्ष पद के दावेदारों से ज्यादा सक्रियता उनके सरपरस्त जनप्रतिनिधियों की भी दिख रही है। दरअसल सांसद-विधायक व अन्य प्रभावशाली नेता अपने जिलों में संगठन में भी पूरा दखल चाहते हैं और अपने चहेते को ही जिलाध्यक्ष की कुर्सी पर बिठाना चाहते है। ऐसे में अब पारदर्शिता का पता चुनाव के बाद चलेगा ज़ब 2027 विधानसभा चुनाव के लिए इन नव निर्वाचित जिलाध्यक्षो का लिटमस टेस्ट होगा। इस बार कई युवा भी जिलाध्यक्ष बनने के लिए ताल ठोकेंगे और कई ऐसे युवा भी होंगे जो सक्रिय कार्यकर्ता के रूप में पार्टी के नीतियों का यथावत अनुसरण कर अपनी बारी का इंतजार करते नजर आएंगे।

पंकज सीबी मिश्रा – राजनीतिक विश्लेषक एवं पत्रकार जौनपुर यूपी
