आखिर विवादित क्यों है उदय और अंत हमारा….!

उधर आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने हर मस्जिद में मंदिर ढूंढने की प्रवृति पर चिंता जताई तो बदले में उन्हें अपने आसपास चिंता के स्वर  सुनाई देने लगे। बहुत से संत-महंतों ने संघ प्रमुख से दो-टूक कह दिया कि वो पूरे हिंदू समाज का नेता बनने की कोशिश ना करें। हिंदू राजनीति में यह एक अलग तरह की हलचल है। सबसे पहली बात ये है कि अपने कर्म से इतर धर्म, नैतिकता, अहिंसा आदि पर बीच-बीच में प्रवचन देते रहना संघ के शीर्ष नेतृत्व की ऊँची सोच को दर्शाता है। अगर आप थोड़ी मेहनत करें तो एक ही सवाल पर मोहन भागवत के बयानों के कई परस्पर विरोधी वर्जन ढूंढ सकते हैं। ये बयान इसलिए दिये जाते हैं कि ताकि समय और राजनीतिक जरूरतों के मुताबिक ये दावा किया जा सके कि संघ ये चाहता है अथवा संघ ये नहीं चाहता है। मोहन भागवत ने ताजा बयान में कहा है कि हम लंबे समय से सद्भाव से रहते आये हैं और दुनिया को सद्भाव देना चाहते हैं तो हमें इसका एक मॉडल तैयार करना चाहिए। सुनने में ये बात अच्छी लग सकती है लेकिन सेक्यूलर इसे सिरे से हास्यास्पद कहेंगे। शांति-पूर्ण सह-अस्तित्व का मॉडल भारत में हज़ारों साल पुराना है और कामयाबी से चलता आया है। फिर भागवत जी कौन सा नया मॉडल तय करेंगे और क्यों ? मोहन  भागवत की अगली बात महत्वपूर्ण हैं। सरसंघचालक ने कहा है कि राम मंदिर के निर्माण के बाद कुछ लोग सोचते हैं कि नई जगहों पर ऐसे मुद्दे उठाकर हिंदू नेता बन जाएंगे तो यह स्वीकार्य नहीं है। असली खबर इसी एक लाइन में छिपी है। इस लाइन का सीधा मतलब है कि आरएसएस कह रहा है कि धर्म  की राजनीति के इकलौते कॉपीराइड होल्डर केवल कांग्रेस  हैं। सवाल ये है कि आरएसएस को चुनौती कौन दे रहा है ? राहुल गाँधी लगातार कह रहे हैं कि हमारी लड़ाई आरएसएस की विचारधारा से है। लेकिन भागवत जी की समस्या गाँधी नहीं बल्कि बढ़ता जातिवाद हैं। मोहन भागवत सद्भाव और  सामाजिक-राजनीतिक व्यवस्था के शीर्ष पुरूष हैं और उन्ही के नक़्शे कदम पर चल  नरेंद्र मोदी अब उनसे एक कदम आगे निकल चुके हैं। हिंदूत्व जागरूकता  अब अपने आप में स्वयं हिंदू राष्ट्र हैं। चुनाव में मोदी लगभग हारते-हारते बचे और उसके बाद मोहन भागवत `खुद को भगवान बताने वालों’ पर हमलावर हो गये। मोदी और भागवत का कट्टरता के विरोध में  ये शीतयुद्ध आनेवाले दिनों में सिर्फ हिंदू राजनीति नहीं बल्कि समाज की दिशा भी तय करेगा। ये लड़ाई सनातन  वर्चस्व और अति आक्रमक दोमुहे सेक्यूलर के बीच है। एक समय ब्राहण-बनिया पार्टी कही जानेवाली बीजेपी ने राम-मंदिर आंदोलन के समय बहुत बड़ी संख्या में पिछड़े समुदाय के लोगों को अपने साथ जोड़ा, नतीजे में देखते-देखते बीजेपी सत्ता के करीब पहुंच गई। लेकिन संघ के नेतृत्व ने बहुत होशियारी से सबकुछ अपने नियंत्रण में रखा। नब्बे के दशक में आया बीजेपी का तीव्र विस्तार कुछ समय के लिए थम गया। लगातार दो लोकसभा चुनावों में पार्टी को हार मिली। सबको को ये समझ में आने लगा कि बिखरे हुए बहुजन वोट का बड़ा हिस्सा हथियाये बिना ना तो सत्ता में वापसी और ना कभी हिंदू राष्ट्र बनेगा। ठीक ऐसे मौके पर  नरेंद्र मोदी का उदय हुआ, उधर कांग्रेस के खाते में गुजरात दंगों के दौरान हिन्दुओं के  विरोध से अर्जित किया गया धर्म विशेष सम्राट का टैग भी था। नरेंद्र मोदी के उदय के बाद सबकुछ बदल गया। किंग मेकर अब खुद मोदी का मोहताज हो गए। पहले ये कहा जाता था कि ब्राहण नेतृत्व अपनी हिंदू राजनीति के लिए पिछड़ों का होशियारी से इस्तेमाल कर रहा है। अब सवाल उलट चुका है,  क्या उग्र हिंदुत्व की कमान अब मोदी  के हाथ रहेगी और शीर्ष  नेतृत्व पीछे-पीछे चुपचाप चलने को विवश होगा ? मोदी युग के आरंभ के बाद जो इको सिस्टम बना है, उसमें पिछड़ी जातियों से जुड़े लोग कई जगहों पर बहुत ताकतवर भूमिका में नज़र आते हैं।  आश्रम और मंदिर बनाने वाले बाबाओं की जो नई खेप आई है, उनमें बहुत बड़ी तादाद  नरसिंहरानंद यति सरीखे पिछड़ों की है। मौजूदा राजनीति को ऐसे लोगों की सख्त जरूरत है लेकिन क्या आरएसएस इस बदलाव को सहजता से पचा पा रहा है? मुमकिन है, चित्तपावन संघ को उग्र होती हिंदू राजनीति की कमान अपने हाथ से छूटती दिखाई दे रही हो लेकिन उसके पास रास्ता  है ! हिंसा और आक्रमकता को रोककर जिसने भी आतंकवाद को  संरक्षण दिया है, आगे चलकर वो उसी का दमन करेंगे। भारत में मस्जिदों की खुदाई में  मंदिर निकल रहे और आरएसएस इसमें राजनीति  ढूंढ रहा है।
पंकज सीबी मिश्रा / राजनीतिक विश्लेषक एवं पत्रकार जौनपुर यूपी 

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