प्रयागराज में लगे महाकुंभ में वीआईपी और आम जन मानस डुबकी सबने लगाई पर व्यवस्था सबके लिए अलग – अलग थी तो कौन ले गया अमृत स्नान का लाभ और महाकुंभ का महापुण्य ! आइए आपको एक महाकुंभ संत श्रीकुल पीठाधीश डॉ सचिंद्र नाथ महाराज के कथनानुसार महाकुंभ में स्नान प्रक्रिया और उससे प्राप्त पुण्य का सही तार्किक अर्थ बताते है। धर्म शास्त्रों में यह वर्णित है कि जिसकी जितनी कठिन तपस्या होती है सेवा पुण्य उसी को उतना प्राप्त होता है। ईश्वर सदैव तपस्या देखता है, सुविधा जन लोगो से तो ईश्वर दूर भागते है। आप का वीआईपी कल्चर जज पुलिस वकील लिखी और सायरन बजाती गाडियां जो आसानी से संगम घाट तक चली गई पर ये पैदल चल तपस्या कर रहे लोगो की आस्था को डिगा नहीं पाए और उन्हें ईश्वर का आशीर्वाद ऐसे ही आम जनमानस को मिलता गया जो बीसो किलोमीटर पैदल चलते गए और जहां घाट मिला ईश्वर को याद कर स्नान किया, जमीन पर बैठ रात बिताई और जो मिला वही पवा लिया, उसी पुण्य का ओज लेकर हजारों दिक्कतों के बीच घर वापिस भी आ रहे, उनका मन प्रसन्न है क्युकी उन्हें ईश्वर प्राप्त है ।
बुजुर्गो के लिए कोई ट्रांसपोर्टेशन सुविधा न होने से बहुत तीखी प्रतिक्रिया देखी गई, सरकार के प्रति लोगों को गहरा आक्रोश रहा। जहां बुजुर्गों की अंतिम इच्छा तीर्थ होती है ऐसे लोगों के लिए 10 से 15 किलोमीटर मेले में पैदल चलना किसी भी कष्ट से कम नहीं था। हालांकि उत्तर प्रदेश सरकार को कि इस पर ध्यान देने की जरूरत है की मेले में अधिकारी मनमानी कर रहे हैं। वह आमजन को रोक रहे हैं और वीआईपी को सुविधा प्रदान कर रहे हैं। त्रिवेणी में वीआईपी को स्नान करने के लिए बोट मुहैया कराई जा रही है और आमजन संगम घाट को ही संगम समझकर गंगा और जमुना में डुबकी लगाकर चले जा रहे हैं। इसी के साथ वीआईपी के लिए वीआईपी घाट बनाना भी बहुत दुखद है। उन्हें वीआईपी बोट पर त्रिवेणी में स्नान करने में प्रशासन जुटा हुआ है। खैर इसका अफसोस किसी को नहीं करना चाहिए। दर्शन, पूजन, तीर्थ में जितने कष्ट होते है उतने ही भगवान उस व्यक्ति से प्रसन्न होते हैं। जिसने भी कष्ट उठाए पुण्य का भागी भी वही होगा। उड़नखटोला और लग्जरी कार और वीआईपी बोट से स्नान करने वाले कभी भी इसका लाभ नहीं उठा सकते। वह कृत्रिम शान शौकत तो दिखा सकते हैं लेकिन उन्हें कभी भी आत्मीय शांति नहीं मिल सकती। महाकुंभ में स्नान करने और प्रयागराज में एक रात बिताने का सौभाग्य मिला। हालांकि अवसर मेरे बाईक राइडिंग की वजह से मिला। ब्रह्म राष्ट्र एकम विश्व महासंघ की ओर से आयोजित शिविर और सायं राष्ट्रीय अधिवेशन महाकुंभ मैं शामिल होने का अवसर मिला।
इस अवसर को मैंने अध्यात्म में बदल दिया सायं पहुंचना स्नान और अगली सुबह 9 बजे वापसी। संगम में डुबकी लगाना न सिर्फ आध्यात्मिक सुकून दे गया, बल्कि मन को भी पवित्र और भावपूर्ण कर गया। यह पवित्र स्नान और अनुभव निश्चित रूप से अविस्मरणीय रहा। वहाँ की भीड़, आरती, साधु-संतों के दर्शन और कुंभ का दिव्य वातावरण—सब कुछ मनोरम रहा, हालांकि महाकुंभ में उमड़ी भीड़ का वीआईपी की सुविधाओं पर घोर प्रतिकार है। 9 फरवरी को मैं गांव में पुनः प्रयागराज से वापिस गया हूं। आशा थी कि वसंत पंचमी के स्नान के बाद स्नानार्थियों की भीड़ में कमी आ जाएगी लेकिन ऐसा नहीं हुआ। प्रयागराज को आने वाली प्रत्येक महत्वपूर्ण सड़क भीड़ से भरी हुई है। शास्त्री पुल, फाफामऊ पुल, नैनी का यमुना पुल, लखनऊ एवं प्रतापगढ़ की तरफ से आने वाली सड़क पर मलाक हरहर पर बना नया पुल वाहनों के कारण जाम चल रहे हैं और शहर से बाहर बने पार्किंग स्थलों पर बलात पार्किंग कराई जा रही है जिससे बाहर से आ रहे यात्री गण शहर व कुंभ क्षेत्र में पैदल ही आ रहे हैं।
उन्हें कुंभ क्षेत्र में पहुंचने के लिए 6 से 10 किलोमीटर पैदल चलना पड़ रहा है लेकिन मां गंगा में डुबकी लगाने के आकर्षण से लोग खिंचे चले आ रहे हैं। आस्था और श्रद्धा का ज्वार यही है। मैं भी रास्ते की भीड़ के कारण रविवार को पर्याप्त विलंब से वाराणसी पहुंचा। प्रयागराजवासी, विद्यार्थी, दूकानदार इस भीड़ तथा जाम से त्रस्त हैं। सब्जियां बहुत महंगी हो चली हैं। आवश्यक सामग्री बाहर से आ नहीं पा रही है, शहर के पेट्रोल पंप ड्राई हो रहे हैं। दवाओं के स्टाक का भी समाप्त होने का खतरा हो गया है। उक्त कष्ट होने के बाद भी यह कुंभ अपने आप में दिव्य तथा भव्य है। अभी तक कितने लोग कुंभ में आए, इस पर विवाद संभव है लेकिन इससे पहले इतनी संख्या में लोग किसी कुंभ में नहीं आए, यह निर्विवाद सत्य है। इसका कारण सरकार का देश-विदेश में प्रचार, चौड़ी सड़कों का जाल, बढ़ती जनसंख्या व वाहन, बढ़ता आस्था का ज्वार से प्रयागराज ओवर क्राउड की चपेट में है। मां त्रिवेणी की कृपा सभी श्रद्धालुओं पर बनी रहे।

पंकज सीबी मिश्रा/राजनीतिक विश्लेषक एवं पत्रकार जौनपुर, यूपी
