चुनावी रेवड़ियाँ खाने का समय है, कुछ दिन सब मुफ्त मिलेगा….

आजकल बिहार में  राजनैतिक रेवड़ियाँ भी खूब बंट रही हैं । वैसे तो मुफ़्त की रेवड़ियों के जनक तो दिल्ली वाले फर्स्ट केजरीवाल थे । आज  बिहार में ऐसे कई केजरीवाल है जो बस मुफ्त – मुफ्त – मुफ्त का हल्ला मचाए है। पर ये रेवड़ी बांटने वाले  चुनाव खत्म होते ही पता नहीं कहां लुप्त हो जाते है । क्या करें हांकते ही इतनी बड़ी बड़ी यें नेता गण कि बिग बॉस की बड़बोली तान्या मित्तल भी गश खाकर गिर पड़े । यद्यपि आजकल तो सभी हांक रहे हैं । योजनाओं के हिसाब से मोदी के आयुष्मान कार्ड नें तो 5 लाख का इलाज कार्ड के हिसाब से कर रही अब भले हॉस्पिटल वाले आयुष्मान  कार्ड की जगह एटीएम कार्ड मांग लें वो अलग बात है  । तेजस्वी नें तो रेवड़ी फेंकने में केजरीवाल को पीछे फेंक दिया, उन्होंने बताया बिहार में चुनाव के बाद 25 लाख सालाना का इलाज होगा बसर्ते बिहारी बीएचयू में गर्दा ना मचाएँ । तो रेवड़ियां खाने के लिए बिहार में रुके, मुंबई और दिल्ली में श्रमजीवी से श्रमजीवी बनकर ना जाए। हाँ मुकेश साहनी नें जरुर खिस निपोर कर बताया की तेजश्वी के योजना में ही दांत टूटने पर उसी कार्ड में कवर करा देंगे। सर्दियों में रेवड़ियां बड़ी अच्छी लगती हैं ।
मेरठ में गुड और देसी घी से बने रेवड़ी और गजक दुनिया भर में मशहूर है । लखनऊ  बाजार को हम कभी नहीं भुला सकते चूंकि वह तो पूरा बाजार ही रेवड़ी बाजार है । लालू के तेजस्वी ने तो रेवड़ी बांटने के चक्कर में लम्बे चौड़े बिहार के प्रत्येक घर को ही सरकारी नौकरी बांट डाली है । अब कौन नहीं जानता कि बिहारियों के लिए सरकारी नौकरी पाना जीवन का सबसे बड़ा लक्ष्य होता है । तो बबुआ ने फेंक दी रेवड़ियाँ । साथ में थमा दिया तेजस्वी प्रण जो असत्य रूप से पूर्ण होने से रहा । चूंकि लालू की चारा मंडी का एड्रेस तो सारे बिहारियों के पता है ? अभी दो दिन पूर्व हुई छठ पूजा पर व्रतधारी स्त्रियों की नाक से मांग तक भरा केसरिया भगवा ही तो था ? भगत सिंह सुखदेव और राजगुरु ने तो मां से अपना चोला ही बसंती मांगा था । शिवाजी और महाराणा प्रताप केसरिया की आन बान और शान के लिए आजीवन लड़ते रहे । इस देश की सन्नारियां मांग में भगवा सिंदूर भरकर शत्रु पर टूट पड़ती थीं और  घिर जाने पर भगवा जौहर सजाती थीं । भगवा इस देश की ऊंचाइयों का प्रतीक है । सच कहें तो भारत का प्रतिनिधि रंग है भगवा या केसरिया ।
बिहार नाम  गौरवशाली अतीत का परिचय है । इस बार वहां चुनाव में गजब रेवड़ियाँ फैलाई जा रही। खांड और चीनी वाली रेवड़ी गजक शायद ही लखनऊ से बढ़िया कहीं बनती हों । गुलाब की खुशबू वाली ये रावड़ियाँ खाना शुरू करें तो जब तक डिब्बा आधा न हो जाए , काम नहीं चलता था । लखनऊ की गजक तो और भी लाजवाब है । मुरैना , आगरा और इंदौर में भी रेवड़ियाँ खूब बनती हैं । लेकिन मेरठ और लखनऊ के रेवड़ी गजक का आज भी कोई जवाब नहीं । यह और बात है कि रेवड़ी हजारों जगह बनती होंगी । बिकती तो देश भर में हैं । बिहार में योगी आदित्यनाथ चुनावी सभाएं कर रहे हैं तो कुछ नेता भगवा पर ही बरस पड़े ? एक महाशय ने तो 90 के दशक की याद दिला दी जब लालकृष्ण आडवाणी सोमनाथ से राम रथ यात्रा लेकर अयोध्या जा रहे थे । चूंकि आडवाणी के साथ सैकड़ों भगवाधारी भी थे तो आगबबूला  लालू एंड कम्पनी ने यूपीए बैनर तले रथ यात्रा रोक दी थी ।
कल यदि तेजस्वी की सरकार आई तो एक भी भगवाधारी बिहार में नहीं आ पाएगा । अजीब बात है कि जिन लोगों ने बिहार में कल तक  जंगलराज फैलाया हुआ था वे उन बुलडोजर्स से डर गए जो संकेतक के रूप में योगी के पंडाल के बाहर लगाए गए थे । बात केवल योगी अथवा साधु संतों के भगवा पहनने की नहीं है भगवे रंग पर एतराज की है ! जो लोग यह मानते हैं कि भगवा रंग अशांति लाएगा , यह केवल उनके दिमाग का फितूर है ! संत परंपरा से जुड़ा भगवा भारतीय संस्कृति और सभ्यता का बड़ा हिस्सा है । अध्यात्म हमारी विरासत है और केसरिया हमारे राष्ट्रीय ध्वज का शिखर पर विराजमान है ! अच्छा हो यदि इस देश की सांस्कृतिक विरासत से रेवड़ी खिलवाड़ बंद हो जाए । याद रखिए , इस देश में अब बहुत कुछ नहीं चलेगा और बहुत सारा चलेगा । जी हां , भगवा तो खूब चलेगा। जी हां , हम असली रेवड़ियों की बात कर रहे हैं दोस्तों ।
केजरी बाबू को पीछे छोड़ने में लगे हैं अपने तेजस्वी बबुआ ।  तो रेवड़ियों की बात चली तो बता दें कि गुड तिल से बनीं रेवड़ियां होती लाजवाब हैं । जवानी में बड़ा मजा देती हैं । बुढ़ापे में जाड़ दांत साथ देना छोड़ दें तो गजक खाइए । गजक खाने में दांत की कम मुंह हिलाने और चबाने की ज्यादा जरूरत होती है , बाकी काम मसूड़े कर देते हैं । फिर आजकल बे दांत है ही कौन । ये गली गली बैठे डेंटिस्ट किसी को बे दांत छोड़ते कहां हैं । दांत नए उगा देते हैं ।  तब  शौंक से खाना जमकर खाना रेवड़ियां । मेरठ और लखनऊ की खस्ता गजक रेवड़ियां ? कुछ कमी पड़ जाए तो संकोच न करना । अभी तक गायब थे । अब आ गए हैं दिल्ली वाले विदेश यात्री । वे भी तो दे जाएंगे थोड़ी बहुत फटाफट रेवड़ियां ? लेते जाइए , वोट जिसे देना हो देते जाइए ?  न जानें लोग भगवा से क्यों चिढ़ते हैं । यह रंग भारत की उत्सवप्रियता को दर्शाता है रेवड़ी प्रिय देश ना बनाए इसे।
पंकज सीबी मिश्रा / राजनीतिक विश्लेषक एवं पत्रकार जौनपुर यूपी 

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