ईवीएम पर रोता विपक्ष या एग्जिट पोल कर गया भौचक – कर्नाटक चुनाव 

पिछले कई सालों में पहला मौका है, जब किसी चुनाव के बाद हुए सभी एग्जिट पोल ने भारतीय जनता पार्टी को निर्णायक तौर पर हारते दिखाया पर मैं थोड़ा सा इससे असहमत हूं क्युकी यही एग्जिट पोल 2022 के यूपी विधानसभा चुनावों में भी बहुत कुछ बोल रहा था एंटीइनकैंबेंसी को लेकर पर सारे एग्जिट पोल को धता बताकर योगी आदित्यनाथ की सरकार बंपर तरीके से वापसी कर गई थी तो जो विपक्ष पहले एग्जिट पोल पर खुश था वो परिणाम के बाद ईवीएम का रोना लेकर बैठ गया। मतलब बंगाल जीतो ईवीएम ठीक , तमिलनाडु केरल छत्तीसगढ़ पंजाब इत्यादि के ईवीएम ठीक पर जब राज्य हारो तो ईवीएम पर सवाल खड़े कर दो ! वाह भाई वाह क्या तरकीब निकाली है खुद के जख्म के दर्द को कम करने की। खैर  इससे पहले किसी चुनाव में खास कर उन राज्यों में जहां भाजपा सीधे मुकाबले में होती है, वहां कम से कम एग्जिट पोल में भाजपा को स्पष्ट रूप से हारते हुए नहीं दिखाया जाता था लेकिन इस बार ऐसा नहीं हुआ। जो टीवी चैनल दिन-रात विपक्ष के एजेंडे पर काम करते हैं और चुनाव के दौरान उसका खुल कर प्रचार करते हैं, उन चैनलों पर भी एग्जिट पोल में भाजपा को सीधे तौर पर हारते हुए और कांग्रेस को बहुमत मिलते हुए दिखाया गया । सोशल मीडिया पर लोग कह रहे थे कि कर्नाटक में जब तक कांग्रेस नहीं जीत जाती, मुख्यमंत्री शपथ नहीं ले लेता, तब तक कोई भविष्यवाणी सही नही । अगर एग्जिट पोल के नतीजे के अनुसार ही असल नतीजे आए हैं तो ये बदलाव का संकेत है  नही तो अभी से कांग्रेस ईवीएम का रोना तो रो ही रही । कांग्रेस ने बजरंग दल पर प्रतिबंध की बात कहकर साहस का काम किया क्योंकि आने वाले अब कई चुनावों में इसकी गूज सुनाई देगी । इसे भाजपा ने अवसर के रूप में लिया और बजरंग दल को बजरंग बली यानी हनुमान जी से जोड़ दिया। भाजपा ने सारा फोकस बजरंग बली पर कर दिया। बजरंग बली बोलकर वोट डालने की अपील की। ये खुद प्रधानमंत्री ने किया। मंच से प्रधानमंत्री ने जय बजरंग बली के नारे लगाए। अमित शाह ने कहा कि कांग्रेस की सरकार आ गई तो कर्नाटक में दंगे होंगे। मुस्लिम आरक्षण खत्म करने की बात कही। मतलब सारा फोकस हिन्दू मुस्लिम पर रहा। बजरंग दल पर प्रतिबंध लगाने की बात सामने आने के बाद कहा जाने लगा था कि कांग्रेस ने सेल्फ गोल कर दिया है। एग्जिट पोल के नतीजे कहते हैं कि कर्नाटक की जनता धर्म के जाल में नहीं फंसी पर मेरा मानना है की बीजेपी 100 के आस पास सीट ले आएगी और निर्दलीय विधायकों की भूमिका महत्वपूर्ण होगी । इस सबके बावजूद असल नतीजे क्या रहेंगे, ये 13 मई को पता चलेगा। पिक्चर अभी बाकी है। इसका यह मतलब कतई नहीं है कि ये चैनल सुधर गए हैं और अब इन्होंने पेशागत ईमानदारी के साथ काम करना शुरू कर दिया है। आमतौर पर जिस भी प्रदेश में भाजपा मुख्य मुकाबले में होती है वहां एग्जिट पोल में उसे जीतते हुए दिखाया जाता है। अगर चुनाव प्रचार या आम मतदाताओं के व्यवहार से बनी धारणा के आधार पर यह स्पष्ट भी दिख रहा हो कि भाजपा नहीं जीत रही है तब भी वहां कांटे का मुकाबला या उसे कम से कम जीत के नजदीक तक जाते हुए जरूर दिखाया जाता है। टीवी चैनलों के बारे में यह धारणा पिछले 8-10 सालों के दौरान हुए चुनावों के एग्जिट पोल के निष्कर्षों पर आधारित है। टीवी चैनलों और सर्वे करने वाली एजेंसियों के इस व्यवहार को दो अलग किस्म के राज्यों के एग्जिट पोल अनुमानों से समझा जा सकता है। पहला राज्य पश्चिम बंगाल है, जहां 2021 में विधानसभा चुनाव हुए थे। बंगाल में भाजपा का बहुत जनाधार नहीं था और वह तृणमूल कांग्रेस से दलबदल कर आए शुभेंदु अधिकारी के चेहरे पर चुनाव लड़ रही थी। फिर भी राष्ट्रीय स्तर के कहे जाने वाले कम से कम दो टीवी चैनलों ने भाजपा को पूर्ण बहुमत मिलने का अनुमान जताया था। मैं और आप झूठे हैं , जब से हमको लगा कि हम समझदार हो चुके हैं तबसे हम झूठे हैं । दूसरे के सामने लेक्चर देने की जब मेरी या आपकी जब बारी आती है तो हम दार्शनिक भावों से बोल उठते हैं कि दुनिया कुछ भी कहें ,हमें फर्क नहीं पड़ना चाहिए  या फिर हम ऐसी बातें बोलते ही रहते हैं कि दुनिया जाए भाड़ में , दुनिया का तो काम ही बोलना है , दुनिया का तो काम ही बात बनाना है , लेकिन असल में हमें ही सबसे ज्यादा फर्क इसी का ही पड़ता है कि दुनिया क्या कहेगी ?  हम खुद को उसी तरीके से पेश करते हैं  जैसा लोग हमें देखना चाहते हैं , हम हमारे आस-पास के माहौल के अनुरूप  ही ढलने की पूरी कोशिश करते हैं , हमारे विचार विचार ना रहके रबड़ हो चुके हैं  जो हर जगह बदलते रहते हैं , माहौल के अनुसार , लोगों के समूह के अनुसार और जगह के अनुसार । असल में लाइफ़-स्टाइल का सम्बन्ध हमारे विचारों से  ही जुड़ा हुआ है , जैसा हम सोचते हैं ,जैसे हमारी विचारधारा है उसी के अनुसार हम पहनावा रखना शुरू कर देते हैं औऱ उसी चलन में खुद को ढालने का जोर लगा देते हैं ।
मुझे आश्चर्य होता है कि राजनीति में  लोग कैसे अपने विचार बिल्कुल विपरीत बदल लेते हैं  , इंसान के पास भले ही पैसे ना हो , बड़ी फेम ना हो लेकिन कम से कम अपने खुद के विचार तो हों ? सोशल मीडिया पर खुद को हीरो या मसीहा साबित करने के चक्कर मे लोग अपनी विचारधारा को खो देते हैं । विचारधारा और खुद को ,दोनों को रबड़ बना रखा  है  , बदलते रहो – बदलते रहो । कोई इंसान कैसे सबको खुश रख सकता है ? किसी व्यक्ति की बातों से सब लोग खुश हो ? ऐसा संभव नहीं है  ,क्योंकि सबके अपने निजी विचार होते हैं , जब इंसान के मस्तिष्क में उठने वाले मतों की संतुष्टि सामने वाले के द्वारा नहीं होती तो वह खुश नहीं होगा , और यही इंसान का मूल स्वरूप है कि वह सबको खुश नहीं रख सकता ,और ना ही उसे ऐसा सोचना चाहिए कि वह सबको खुश करें । लेकिन आजकल लोग ऐसा कैसे कर पा रहे हैं ? मैं आया तो वो मेरे अनुसार ढल जाते हैं औऱ कोई दूसरा आया तो वो उसके अनुसार ढल जाते हैं , उदाहरणस्वरूप मान लो अगर वह कॉमरेड विचारधारा का है तो थोड़ी ही देर में  वह किसी अन्य राजनीतिक दल की वाहवाही करने में लग जाते हैं ।ऐसे लोग आपको आस पास दिख जाएंगे जो धरातल पर तो अलग ही स्वभाव औऱ विचारों के साथ आपके बीच बैठें रहेंगे औऱ सोशल मीडिया पर एक अलग ही सोच के साथ मिलेंगे ,जिन्हें देखकर आप समझ नहीं पाएंगे कि यह वही है क्या ? मुझे नहीं लगता कि ऐसे लोगों की आगे चलकर कोई इज्जत रहेगी , उनके जैसे लोग ही उन्हें पसंद जरूर करेंगे लेकिन कुछ समय तक । मूल विचारधारा का एक अपना फायदा है कि उसे समय और परिस्थिति के अनुसार बदलने की जद्दोजहद नहीं करनी पड़ती , उसे सबकी वाहवाही करने में अपनी ऊर्जा को नष्ट नहीं करना पड़ेगा ,उसके अपने पुख्ता दोस्त होंगे न कि हर दूसरे दिन कोई नया दोस्त  ,  उसकी भले ही कम लोगों में ही सही लेकिन इज्जत जरूर होगी  , और वह खुद से संतुष्ट और खुश रहेगा । औऱ जो मिनटों में ही रंग बदलते हैं ,विचार बदलते हैं ,  दूसरों के हिसाब से अपने आप को ढालते हैं ,सोशल मीडिया पर हीरो बनने के चक्कर में  ‘हेड’ की भी वाहवाही और ‘टेल’ की भी वाहवाही करने में लगे रहते हैं ,वह खुद  के ही बोझ तले दब जाते हैं ,उन्हें समझ नहीं आता कि किसका भार कम करें और किसका भार लेंवे ,क्योंकि उनकी 360° वाहवाही लूटने की आदत ने उसे ना किसी विशेष समूह या वर्ग का छोड़ा औऱ ही किसी एक मत का । ऐसे लोग ना समाज के ठेकेदार हो सकते हैं ,ना किसी के सच्चे दोस्त औऱ ना ही एक अच्छे रॉल मॉडल । इंडिया टुडे समूह के आज तक और इंडिया टीवी ने 100 प्लस के मार्जिन से कांग्रेस के जीतने की भविष्यवाणी की और टीवी 9, एबीपी न्यूज सहित कई चैनलों ने कांटे का मुकाबला दिखाते हुए भाजपा को 70 प्लस से ज्यादा सीटें मिलने का अनुमान जताया अब देखना होगा अली या बजरंगबली .! कौन होगा कर्नाटक का अगला किंग .!

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