डॉयवर्स शूटआउट और द केरला स्टोरी का कनेक्शन ..!

 पंकज कुमार मिश्रा मीडिया पैनलिस्ट शिक्षक एवं पत्रकार केराकत जौनपुर
सोशल मीडिया पर अभी कुछ दिनों पूर्व एक साउथ इंडियन एक्ट्रेस शालिनी का डाइवोर्स फ़ोटो शूट वायरल हुआ था।   यह थोड़ा अटपटा  और फनी था क्योंकि हम अभी भी डाइवोर्स को बेहद ख़राब मानते हैं ।एक दो दिन में समझ में आया और फिर पूरी केरला स्टोरी का खुलासा यूं हुआ कि  शालिनी का निकाह रियाज़ से हुआ था। पूर्व में भी शालिनी ने पति के ख़िलाफ़ शारीरिक और मानसिक पीड़ा की शिकायत की थी । नहीं माना, तलाक़ दे दिया । ऐसे किसी भी बंधन से छुटकारा मिलता है तो खुश होना लाजमी है , खुशी होनी ही चाहिए  और जीवन बहुत बड़ा है, ऐसी कड़वी यादों को भुला कर आगे बढ़ना ही समझदारी है – दोनों के लिए । भारत में लव जिहाद में लड़कियाँ हैं जो अब्यूसिव मैरिज में हैं । पति मार पीट गाली गलौज सब करते हैं, बाहर अफ़ेयर भी हैं । पत्नी का काम घर पर खाना बनाना और बच्चे पालना है।चूँकि वह आर्थिक सक्षम नहीं हैं, तो सह रही हैं । यदि वह भी आर्थिक सक्षम हों तो कोई मनुष्य पशु जीवन स्वेच्छा से ख़ुशी ख़ुशी नहीं जीता ।
ये बात अलग है कि समय के साथ आदत हो जाती है और फिर यह तुलना होती है कि पति अब बदल गये हैं, पहले रोज़ मारते थे अब तीसरे दिन ही मारते हैं । जैसे जैसे महिलायें आर्थिक सक्षम होंगी, तलाक़ के मामले बढ़ने ही हैं।उच्च आय वर्ग में अब तलाक़ लगभग उतना ही कॉमन है जितना पश्चिम के देशों में है । हाँ मध्यम वर्ग में जिन केसेज में महिलायें पूरी तरह से आर्थिक रूप से पति पर निर्भर हैं वहाँ तलाक़ ने अभी दस्तक नहीं दी है, पर बस यह अंतिम पीढ़ी है । उन घरों में भी नई जनरेशन पढ़ लिख रही है, लड़कियाँ वहाँ भी अब पढ़ी लिखी आर्थिक मज़बूत निकल रही हैं ।कभी कभी मैं यह विचार करने को बाध्य हो जाती हूं कि क्या हम उसी हिंदू संस्कृति या फिर आर्य संस्कृति के वाहक हैं जिसने अपनी कन्याओं को स्वयंवर   अर्थात अपना जीवनसाथी / पति को स्वयं ही चुनने की स्वतंत्रता  या फिर अधिकार  प्रदान की थी  जबकि पूरे विश्व में अन्यत्र किसी भी पंथ ,मजहब और रिलीजन में लड़कियों को यह अधिकार नहीं दिया गया था। आखिर क्या कारण है जो आज हमारी लड़कियां अपना विवेक, बुद्धि और सामान्य ज्ञान से रहित हो गई हैं जो अपने लिए सही प्रेमी या पति का चुनाव करने में सक्षम नहीं हैं। हमारी सभ्यता में ही सावित्री ,माता सती ,माता पार्वती,दुर्गावती आदि ने स्वयं ही अपने भावी पति का चुनाव किया था और सही चुनाव किया था।
ठीक है कि सेक्युलर शिक्षा और जिहादी बॉलीवुड ने लड़कियों की बुद्धि भ्रष्ट कर दी है लेकिन हमारे परिवार अपना धर्म और कर्तव्य निभाने में असमर्थ क्यों और कैसे हो गए कि अपने संतानों में विशेष कर लड़कियों को सामान्य ज्ञान और सामान्य शत्रु बोध भी नहीं सीखा सके ।
आखिर क्यों एक  युवा लड़की चार बीवियों , तीन तलाक़, हलाला , कुफ्र और शबाब वाले इस लाम की सच्चाई से अवगत नहीं है ? क्यों एक सामान्य हिंदू लड़की को मुस्लि म समाज की स्त्री विरोधी  सच्चाई का ज्ञान तक नहीं है लेकिन वह अपने हिंदू धर्म की सामाजिक बुराइयों और कुप्रथाओं के विरोध में लंबे भाषण दे सकती है जबकि वह कुप्रथाएं अब दूर भी की जा चुकी हैं । आखिर क्यों  एक हिंदू लड़की अपने घर में तो मिनी स्कर्ट पहनने से रोकने पर आसमान सर पर उठा लेती है लेकिन हिजाब और बुर्का पहन लेने में उसको कोई भी आपत्ति नहीं होती है। मेरा मानना है कि एक अभिभावक के रूप में ही हिंदू समाज का एक बड़ा हिस्सा असफल हो गया है और इसलिए लव जिहाद की  सबसे ज्यादा पीड़ित लड़कियां हिंदू ही हैं ,विचार कीजिए क्योंकि इसी साधारण से प्रश्न में लव जिहाद की भयावह स्थिति के बीज छुपे हुए हैं।ये बहुत कम लोगों को पता होगा कि द केरल स्टोरी के लेखकों ने जब वहाँ के राज्य सरकार से आरटीआई के तहत यह जानकारी चाही कि केरल से अब तक कितनी हिंदू एवं ईसाई लड़कियाँ को सीरिया के आतंकी संगठन आई एस आई के लिए धर्मांतरित करके वहाँ के मौलानावों द्वारा सप्लाई किया गया तो पहले तो उन्होंने इसे बताने से इनकार कर दिया, बाद में दबाव पड़ने पर उन्होंने आरटीआई के जवाब में एक सरकारी वेबसाईट का नाम लिख दिया और कहा कि सारी जानकारी उस वेबसाइट पर उपलब्ध है।
जब फ़िल्म के लेखकों ने उस वेबसाइट से जानकारी लेने का प्रयास किया तो पता चला कि सरकार ने उस वेबसाइट को इंटरनेट से ही हटा दिया था अथवा ऐसी कोई वेबसाइट पहले से थी ही नहीं। केरल के कम्युनिस्ट मुख्यमंत्री का बयान है कि केरल से हिंदू ईसाई लड़कियों को वहाँ के मौलानाओं ने धर्मांतरित करके सीरिया के आतंकियों को सेक्स स्लेव बनाकर भेज दिया। फ़िल्म ऑथेंटिक न लगे इसके लिए सारे डेटा को वेबसाइट से हटा लिया गया।  अब जब डेटा ही नहीं है तो शशि थरूर से लेकर ज़ुबैर गैंग तक सब इस फ़िल्म को प्रॉपगेंडा फ़िल्म बताने में लगे हैं। इस पूरे गिरोह से पूछा जाना चाहिए कि जब तुम लोगों को लग रहा है कि फ़िल्म में ग़लत बातें दिखाई जाने वाली हैं तो ख़ुद तुम लोग क्यों नहीं सारे डेटा को वहाँ के सरकार से सार्वजनिक कराते हो? ज़ुबैर तो भारत में अप्रत्यक्ष तौर पर प्रपोगैंडा  एजेंट है, वह जिस व्यक्ति का नाम लेकर चीखने चिल्लाने लगता है उसका स्पष्ट मतलब यह होता है कि दुनिया भर के आतंकियों को सिग्नल चला गया कि अमुक व्यक्ति को हलाक करना है। नूपुर शर्मा के मामले में इसीलिए इतनी सावधानी बरती जा रही है क्यूँकि इसने सिग्नलिंग कर दी थी। इसलिए यदि यह फ़िल्म से जुड़े किसी व्यक्ति अथवा कलाकार को टार्गेट करके ट्वीट करे तो सरकार को तुरंत उस व्यक्ति अथवा कलाकार को सुरक्षा मुहैया करानी चाहिए।  यह पूरा गैंग इतना शातिर है कि इनमें आपस में फ़िज़िकल बातचीत की आवश्यकता नहीं पड़ती, केवल इशारा काफ़ी होता है, इसी कारण इतने मुक़दमे के बाद और हत्याओं को अंजाम देने के बाद भी कोर्ट द्वारा सुरक्षित हैं।  द केरल स्टोरी भारत में लव जेहाद का वैक्सीन बनकर आ रही है। इसको स्वयं देखें, बच्चियों को दिखाइए, सम्भव हो तो दस बीस बच्चियों को स्पान्सर भी करिए। उधर टूलकिट के बिखरते पुर्जे और   टूलकिट ‘ बहुत मशहूर हुआ था ये शब्द जनवरी – फरवरी 2021 में जब मशहूर पर्यावरण कार्यकर्ता 18 वर्षीय ( तब ) लड़की स्वीडन की ग्रेटा थनबर्ग और अमेरिकन पाॅप सिंगर रियाना ने भारत में चल रहे किसान आन्दोलन की तरफ विश्व का ध्यान आकर्षित करने का प्रयास किया था ।
किसान आन्दोलन में दिल्ली की सीमा पर बैठे लाखों किसानों में वे भी  थे जो 2013 में उत्तर प्रदेश में तत्कालीन चुनाव के टूलकिट पर काम करते हुए रामपुर साम्प्रदायिक दंगों के बाद कट्टर  हो गए थे । 2020 आते – आते तीन किसान कानूनों को देखकर वे फिर से हिन्दू – मुस्लिम भाईचारे के अन्तर्गत  एक आवाज़ में अल्ला हो अकबर और हर – हर महादेव के नारे लगाने लगे थे । तब कांग्रेस के आई टी सेल को वे किसान ही  नहीं लगे क्योंकि उनमें से कुछ ड्राई फ्रूट्स और पित्जा खा रहे थे जो ‘ दो बीघा ज़मीन ‘ के  शम्भू महतो (  बलराज साहनी ) की छवि से मैच नहीं कर रहा था । 2019 के अन्तिम दिनों में शाहीन बाग में सी ए ए के विरोध में कार में कापती महिलाओं पर कुछ प्रसिद्ध महिला पहलवान  दिहाड़ी पर बैठे होने का इल्ज़ाम लगा रही थीं । आज जन्तर-मन्तर पर बैठी सिसकती हुई महिला पहलवानों पर कांग्रेसी आईटी सेल के कुछ सदस्य यही इल्ज़ाम लगा रहे हैं । शायद टिकैत की  टूलकिट का मंत्र है हर आन्दोलनकर्ता को  मजदूर किसान घोषित करना क्योंकि उसके आई टी सेल के सक्रिय सदस्य दिहाड़ी पर नहीं पीस रेट पर काम करते हैं । देश में एक विशाल यज्ञ चल रहा है । देश के भिन्न-भिन्न वर्ग यज्ञ में समिधा बनकर बारी – बारी स्वयं की आहुति दे रहे हैं । अपने को यजमान समझने की भूल किसी को नहीं करनी चाहिए। जंगल बहुत घना है , किसी ना किसी हिस्से को काटकर हवन की लकड़ी मिलती ही  रहेगी ।

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