चिराग सबके बुझेंगे साहेब, हवा किसी की सगी नही होती…!

पंकज सीबी मिश्रा/राजनीतिक विश्लेषक एवं पत्रकार जौनपुर यूपी
आपको कुछ नाम राजनीति में याद दिलाता हूं जो अपनी महत्वाकांक्षा और लालच के लिए हिंदूवादी संघर्ष के पीठ में छुरा घोंपा। पहला और बड़ा नाम है सत्यपाल मालिक का जिन्हे कभी जम्मू और कश्मीर के राज्यपाल बनाया गया था, जम्मू और कश्मीर जैसे संवेदनशील राज्य का राज्यपाल यदि भाजपा बना रही तो निश्चित आपका कद बड़ा होगा वैसे भी जम्मू कश्मीर का राज्यपाल कोई यूँ ही नहीं बन जाता ! राजनैतिक रूप से इस राज्य का राज्यपाल बनने के लिए सैकड़ो गुण चाहिए और सबसे बड़ा गुण होता है राष्ट्र और हिंदू के प्रति वफादारी ! सत्यपाल मालिक का कार्यकाल औरों से ज्यादा महत्त्वपूर्ण इस लिए भी हो जाता है क्योंकि उनके कार्यकाल के दौरान ही धारा 370 हटाई गई थी ! फिर सत्यपाल मालिक ने उपराष्ट्रपति पद को लेकर लॉबिंग शुरू की और जा बैठे सेक्युलर लॉबी के गोद में ।
जब बात नही बनी तब मीडिया मे आकर निम्नतम स्तर की बयानबाजी शुरू कर दिया इन्होंने भाजपा के खिलाफ। यहां तक कि पुलवामा हमले को मोदी की साजिश बता दिया अब ऐसे चिराग को कहा तक हवा से बचाया जाता। अब हश्र सबके सामने है। पुलवामा पर भाजपा की साजिश कह विपक्ष के साथ सुर मिलाने वाले भी जानते थे कि पाकिस्तान ऐसा बेतुका बयान हाथो हाथ उठा लेगा और अंतराष्ट्रीय मंच पर उसका दुरूपयोग करेगा फिर भी पद के मोह में अंधे सत्यपाल मालिक नही रुके और उन्होंने हर वो बयान दिया जो पाकिस्तान के काम आया ! उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी पर ओछी व्यक्तिगत टिप्पणी की , यहाँ तक कहा कि कई उद्योगपति उनके पास मोदी का नाम लेकर फायदा लेने आते थे! किसान आंदोलन के दौरान जितना भी जहर उनसे उगला जा सका उन्होंने उगला! सोचो संघ और भाजपा ने उन पर किस स्तर तक विश्वास किया होगा जो कि इतने संवेदनशील समय में उन्हे राज्यपाल बनाया ! उधर  जाति से यादव, 1982 में एबीवीपी से जुड़े मोहन लाल यादव आज एमपी के सीएम है, 1990 में एबीवीपी से जुड़े भजन लाल शर्मा आज राजस्थान के सीएम है और अब दिल्ली एबीवीपी से जुड़ी रही रेखा गुप्ता दिल्ली की सीएम बनने जा रही तो जो लोग संघ के वर्चस्व को सत्ता से नकार रहे उनके लिए मेरा यह आंकड़ा आंख खोलने वाला होगा। प्रवेश वर्मा, बांसुरी स्वराज , विजेंद्र गुप्ता, कपिल मिश्रा ऐसे तमाम नाम पर बाजी मारी रेखा गुप्ता ने। यह संघ का वर्चस्व और एबीवीपी के प्रति अपार श्रद्धा और जातीय समीकरण साधने का परिणाम है। दूसरा उदाहरण हनुमान बेनीवाल का , वह भी भाजपा के समर्थन से ताकतवर बने राजस्थान में बाद में किसान आंदोलन के समय उनका भी नफरती चेहरा सामने आ गया । वह भी मात्र एक जातिवादी नेता बनकर अब बिलबिला रहे ।
                       
ऐसे कुछ अन्य उदाहरण भी है जहाँ देश की एकता और अखंडता को दांव पर लगाकर केवल जातीय वर्चस्व को कायम रखने की जिद्द ने नेताओं की समाज में ऐसी छवि बनाई जिस से वे न घर के रहे ना घाट के। उनकी मक्कारी से न आम आदमी उबर पाया है और ना भाजपा। ये बात केवल सत्यपाल मालिक और हनुमान बेनीवाल की ही नही है। सत्यपाल मालिक से लेकर, चौधरी, टिकैत परिवार, पहलवान आंदोलन में हरियाणा के जाट नेताओं का रवैया, अखिलेश सरकार में गुंडागर्दी, बिहार में लालू की और पश्चिम बंगाल में ममता का हिंदुत्व पर लगातार अत्याचार इत्यादि अब जनता को चुभ रहे। मेरा व्यक्तिगत मत है कि भाजपा भविष्य में किसी नमक हराम नेता को कोई संवेदनशील जिम्मेदारी नही देने वाली है ! बाहर वालो को लगता है कि अंदर से इन जातिवादी नेताओं की सेटिंग है पर इनके लिए देश बाद में है और जाति पहले है ! मैं उस समय भी लिखता था और कहता था कि राहुल, तेजश्वी और अखिलेश से समाज की छवि खराब ही नहीं बल्कि धूमिल हो रही हैं।
ये तीनो जातिवाद के ब्रांड एम्बेसडर बन रहे है जो कि भविष्य में हानिकारक होगा! लोगो ने जैसे दलित राजनीति को जमीन सुंघाई ठीक उसी तरह यादव राजनीति का नम्बर आया ! आज हालत यह है कि ग्राम प्रधान तक के चुनाव लठ और पैसे के दम पर जीतने पड़ रहे है नही तो हमने वो दिन भी देखे हैं जब बिना एक रुपया खर्च किये भी गांव गिराव के बुजुर्ग ग्राम प्रधान बनते थे और सम्मान भी पाते थे ! यह भाजपा है यहां आम आदमी भी कार्यकर्ता बन कर सीएम और पीएम बन सकता है और नीतियां बिलकुल स्पष्ट की आप के दिल में अगर हिंदुत्व है और आप राम के है तो आप जनता के हितैषी है और फिर आपको भाजपा सिर आंखों पर बिठा लेगी वरना तो सत्यपाल मालिक से लेकर ममता बनर्जी जैसों से इतिहास पटा पड़ा है जिन्होंने निजी लाभ के लिए भारत के सीने में खंजर तक भौंकना स्वीकार कर लिया ।

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