वाह रे न्यायतंत्र ! पांच हजार वर्ष पूर्व हुए राम से मांगे कागज, पांच सौ साल पुराने रहीम हुए सेल डिड 

न्यायालय भी अब राजनीति के लिए बैटिंग कर रही जिसमे जज साहब रिटायरमेंट के बाद किसी खास दल से टिकट प्राप्त करने का भरपूर प्रयास अभी से शुरू करते नजर आ रहे । लाखो वर्ष पूर्व सतयुग , त्रेता और द्वापर द्वापर के प्रामाणिक दस्तावेज मांगे गए कोर्ट में जिसे दिखाया भी गया । उधर जो इस्लाम हाल ही में 1500 वर्ष पूर्व जन्मा उसे लेकर वफ्फ सुनवाई के दौरान सेल डिड का बयान । इस तरह से तो धर्म को लेकर न्याय के लिए आप दो आंख कर रहे । आप ही नहीं जज साहब पूरा भारत केवल सनातन की बेइज्जती कर बच के निकल जाता है । हिम्मत नही किसी में कि कोई जादुई किताब के बारे में कुछ बोल दे। क्युकी वहां सर तन से जुदा का फरमान है जिससे माननीय जज साहब आपकी , इंद्रजीत सरोज , स्वामी प्रसाद मौर्य और स्टालिन जैसों की सांसे ऊपर नीचे होने लगती है और प्राण हलक में अटक जाती है । चलिए यह तो तय है कि इंद्रजीत सरोज , रामजीलाल सुमन , स्वामी प्रसाद मौर्य जैसे समाजवादी नेताओं ने राम का अपमान कर समाजवाद को लज्जित करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी और इनके बदौलत ही आज योगी आदित्यनाथ की सरकार रिकॉर्ड तीसरी बार सत्ता में वापसी का इतिहास रचने जा रही । अखिलेश के कमान संभालने के बाद समाजवादी पार्टी का जो पतन हुआ है वह अभूतपूर्व है और अब सपा यूपी की जूनियर कांग्रेस बन चुकी है । उधर इस हिसाब से भोजवासा , ज्ञानवापी, सम्भल और ताजमहल आदि पर हिन्दू समाज को कोई दावा पेश करने की जरूरत ही नहीं है क्युकी ये भी सेल डिड के तहत आ जायेंगी अब तो । राम मंदिर पर बेकार ही 500 वर्ष तक संघर्ष चला यह तो बिना लड़े सुप्रीम कोर्ट द्वारा पांच सौ साल पहले ही हिंदुओं को दे दिया जाना चाहिए था पर फिर भी सबूत मांगने के बाद फैसला आया । जब जज साहब ने सुप्रीमकोर्ट में साफ साफ कह दिया है 13वीं या 15वीं शताब्दी की मस्जिदों के सबूत नहीं मांगे जा सकते तो फिर हमसे क्यों मांगे  ! जज साहब ने कहा कारण यह कि डॉक्यूमेंटेशन का काम तो शुरू ही अंग्रेजों ने किया ,मुगलों ने तो डॉक्यूमेंटेशन कराया ही नहीं था ! मतलब अयोध्या मथुरा काशी में मंदिरों के सबूत देने की तो कोई जरूरत ही नहीं है ? भारत की जनता को यह गौरव प्राप्त है कि वह कोर्ट का बड़ा सम्मान करती आई है । यद्यपि अब निरंतर ऐसे  निर्णय आ रहे हैं जिन पर समाज सीधी प्रतिक्रिया देता है । अब बाद में उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने सुप्रीमकोर्ट और  न्यायाधीश को फटकार लगाई । काम करने वाली सरकारें संसद में बड़े बड़े निर्णय लेती हैं । राष्ट्रपति बड़े हैं या न्यायाधीश ? क्या कोर्ट को अधिकार है कि जनता द्वारा चुनी गई सरकार द्वारा संसद में बहुमत से प्रस्ताव को पूर्णतः खारिज कर दिया जाए ? कानून के जानकार मानते हैं कि जिस चीफ जस्टिस को शपथ भी राष्ट्रपति दिलाते हैं वह न्यायाधीश राष्ट्रपति के एक्ट पर कैसे सवाल उठा सकता है ? न्यायपालिका कभी भी राष्ट्रपति , लोकसभा अध्यक्ष , राज्यसभा सभापति अथवा राज्यपाल को तलब नहीं कर सकती । हां , संसद किसी न्यायाधीश पर महाभियोग लगाने की कार्रवाई कर सकती है । कुछ ही समय बाद यूसीसी बिल आने वाला है । देश के अच्छी तरह जग जाने का यही वक्त है सही वक्त है । यह जमाना सोशल मीडिया का जमाना है । 80 करोड़ हाथों में स्मार्टफोन आ गए हैं । सभी को सावधानी बरतनी पड़ेगी । कहा भी गया है कि अति सदा वर्जयेत । किसी को यदि कानून बन जाने के बाद भी सीएए , किसान एक्ट , एनआरसी , वक्फ़ एक्ट से परेशानी है तो और लोगों को भी प्लेसेस ऑफ वरशिप एक्ट से परेशानी हो सकती है ? हटाइए उसे भी ? और माननीयों को यह भी देख लेना चाहिए कि शाहबानों केस में सर्वोच्च अदालत का फैसला क्या था और तत्कालीन राजीव सरकार ने क्या लीपा पोती की!
पंकज सीबी मिश्रा/राजनीतिक विश्लेषक एवं पत्रकार जौनपुर यूपी 

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