जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हाल ही में हुए आतंकी हमले के बाद केंद्र सरकार ने पाकिस्तान के खिलाफ सख्त रुख अपनाते हुए कई बड़े फैसले लिए हैं. इन्हीं में से एक बड़ा फैसला है, सिंधु जल समझौते को निलंबित करने का फैसला. इस फैसले के बाद देश भर में बहस तेज हो गई है कि क्या भारत एकतरफा इस समझौते को खत्म कर सकता है और पाकिस्तान जाने वाले पानी को रोक सकता है.
जम्मू-कश्मीर के पूर्व डीजीपी एसपी वैद ने गुरुवार को कहा कि पाकिस्तान को झटका देने के लिए सिंधु जल समझौते को निलंबित करना जरूरी था. खासकर 1960 में हस्ताक्षरित सिंधु जल समझौता, जो बहुत एकतरफा था, जिसमें पाकिस्तान को 70 प्रतिशत पानी, यानी सिंधु बेसिन की मुख्य नदियां, सिंधु, चिनाब और झेलम का हिस्सा दिया गया, जबकि पंजाब की तीन नदियां भारत के हिस्से में आईं.
भारत ने दरियादिली दिखाई और अधिकतम पानी पाकिस्तान को दिया, लेकिन पाकिस्तान इसे हमारी कमजोरी समझता है. समझौते में एक प्रावधान है कि कोई भी पक्ष असंतुष्ट होने पर इससे बाहर निकल सकता है. चूंकि पाकिस्तान सभ्य तरीके से नहीं समझता, इसलिए उसे इस तरह का झटका देना जरूरी है.
उन्होंने दावा किया था कि पाकिस्तान का पानी बंद होगा, पानी का प्रवाह रोका जाएगा, और इसके लिए कदम उठाए जाएंगे. इसका असर आने वाले दिनों में दिखेगा. पाकिस्तान में कृषि, सिंचाई, बिजली उत्पादन प्रभावित होगा और पीने के पानी की किल्लत होगी. पाकिस्तान के काले कारनामों का असर उनके लोगों को दिखाना चाहिए ताकि उन पर दबाव पड़े.
भारत और पाकिस्तान के बीच 1960 में हस्ताक्षरित सिंधु जल संधि के तहत, रावी, सतलुज और ब्यास नदी का औसत जल लगभग 33 मिलियन एकड़ फीट (एमएएफ) भारत को विशेष उपयोग के लिए आवंटित किया गया था. वहीं, पश्चिमी नदियों, सिंधु, झेलम और चिनाब का औसत जल लगभग 135 एमएएफ पाकिस्तान को आवंटित किया गया था, सिवाय संधि में भारत को दिए गए निर्दिष्ट घरेलू, गैर-उपभोग्य और कृषि उपयोग के लिए.
बता दें कि सिंधु जल समझौता साल 1960 में भारत और पाकिस्तान के बीच वर्ल्ड बैंक की मध्यस्थता में हुआ था. इसके तहत भारत को तीन पूर्वी नदियों (रावी, ब्यास और सतलुज) का पानी मिला, जबकि पाकिस्तान को तीन पश्चिमी नदियों (सिंधु, झेलम और चिनाब) का पानी मिला.
