- भारत में सुधार के लिए समय-समय पर बड़े और साहसिक कदम उठाए तो गए किन्तु जड़ों में व्याप्त भ्रष्टाचार की रोक के लिए नाकाफी
2014 में जब भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र दामोदर दास मोदी बने तो भारत की उत्साहित जनता में इतना उत्साह था कि लोगों को लगा कि देश में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के रूप में भोलेनाथ ने सत्ता संभाली और अब देश में व्याप्त भ्रष्टाचार रूपी भस्मासुर का वध हो जाएगा काले धन और भ्रष्टाचार पर बड़ी कार्यवाही करते हुए नोट बन्दी अथवा बदली की गई 2016 में ही नोटबंदी एक मील का पत्थर थी। 500 और 1000 रुपये के नोटों को चलन से बाहर करने का निर्णय कालेधन, भ्रष्टाचार और टैक्स चोरी पर लगाम लगाने का एक महत्वाकांक्षी प्रयास था। उस समय देशवासियों ने इसे भ्रष्टाचार के खिलाफ एक निर्णायक प्रहार के रूप में देखा। मगर, इस कदम की सार्थकता तब धूमिल हो गई, जब 2000 रुपये के नए नोट बाजार में आए और हालांकि भारतीय अर्थशास्त्रीयो कि रिकमेंट से कुछ ही समय बाद इन्हें भी वापस भी लेना पड़ा। यह सवाल आज भी अनुत्तरित है कि बड़े मूल्य के नोटों का प्रचलन अर्थव्यवस्था के लिए कितना लाभकारी है, और क्या यह वास्तव में भ्रष्टाचार को बढ़ावा देने का कारण बन रहा है?बड़े नोटों का अभिशाप बड़े मूल्य के नोट, जैसे 2000 रुपये, न केवल नकदी के भंडारण को प्रोत्साहित करते हैं, बल्कि लालच और अनैतिक आर्थिक गतिविधियों को भी हवा देते हैं। जब धन कुछ लोगों की तिजोरियों व अलमारियों में कैद हो जाता है, तो अर्थव्यवस्था का प्रवाह बाधित होता है। भारतीय रिजर्व बैंक के आंकड़ों के अनुसार, उच्च मूल्य के नोटों का एक बड़ा हिस्सा लेनदेन के बजाय भंडारण में उपयोग होता है। यह स्थिति न केवल बाजार में नकदी की कमी पैदा करती है, बल्कि छोटे व्यापारियों, दिहाड़ी मजदूरों और मध्यम वर्ग को आर्थिक संकट की ओर धकेलती है। परिणामस्वरूप, देश में गरीबी का अनुपात बढ़ता है, और सामाजिक-आर्थिक असमानता गहराती है। आत्महत्या जैसी त्रासद घटनाएं होती है, जो आर्थिक तंगी से जुड़ी हैं, इस असमानता की भयावह तस्वीर पेश करती हैं।100 रुपये से बड़े नोटों को बंद करने का सुझाव इस संदर्भ में विचारणीय है। छोटे मूल्य के नोट और डिजिटल लेनदेन को बढ़ावा देना नकदी भंडारण को हतोत्साहित करने के साथ-साथ अर्थव्यवस्था में पारदर्शिता ला सकता है। डिजिटल भुगतान प्रणालियों, जैसे यूपीआई, ने पहले ही भारत में क्रांति ला दी है। यदि बड़े नोटों को पूरी तरह हटा दिया जाए और डिजिटल लेनदेन को और सुलभ बनाया जाए, तो कालेधन और भ्रष्टाचार पर प्रभावी अंकुश लगाया जा सकता है।टैक्स चोरी और कमर्शियल वाहनों में लगने वाले आरएफआईडी टैग की अधूरी कहानी बन कर रह गई टैक्स चोरी भारत की अर्थव्यवस्था के लिए एक और गंभीर चुनौती है। 2014 में मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद कमर्शियल वाहनों में आरएफआईडी (रेडियो फ्रीक्वेंसी आइडेंटिफिकेशन) टैग लगाने की पहल शुरू हुई थी। इस तकनीक का उद्देश्य टोल संग्रह को पारदर्शी बनाना और टैक्स चोरी पर निगरानी रखना था। शुरुआती दौर में इस योजना ने आशाजनक परिणाम दिए, और तकरीबन 40% कमर्शियल वाहनों में टैग लगाए गए। मगर, इसके बाद इस पहल में अजीब सी सुस्ती आ गई। प्रशासन और शासन के बीच समन्वय की कमी या नीतिगत अनिर्णय के कारण यह महत्वपूर्ण सुधार ठंडे बस्ते में चला गया।आरएफआईडी टैग न केवल टैक्स चोरी को रोकने में प्रभावी हो सकते हैं, बल्कि सड़क परिवहन को और व्यवस्थित भी बना सकते हैं। इसके बावजूद, इस तकनीक को पूर्ण रूप से लागू करने में रुचि की कमी चिंताजनक है। बड़े करदाता आज भी टैक्स चोरी के लिए नए-नए रास्ते खोज लेते हैं, जिसका सीधा असर सरकारी खजाने पर पड़ता है। टैक्स राजस्व में कमी का बोझ अंततः आम जनता पर पड़ता है, जो बढ़ती महंगाई और आर्थिक तंगी के रूप में सामने आता है।आर्थिक असमानता का गहराता संकट बड़े नोटों का प्रचलन और टैक्स चोरी का यह दुष्चक्र अमीर और गरीब के बीच की खाई को और चौड़ा कर रहा है। विश्व बैंक की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत में आय असमानता वैश्विक औसत से कहीं अधिक है। जब देश का धन कुछ लोगों के हाथों में केंद्रित हो जाता है, तो सामाजिक-आर्थिक तनाव बढ़ता है। शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार जैसी बुनियादी सुविधाओं तक पहुंच सीमित हो जाती है, जिससे गरीब और मध्यम वर्ग का जीवन और कठिन हो जाता है।समाधान की रास्ता इस संकट से निपटने के लिए सरकार को तत्काल और ठोस कदम उठाने होंगे। सबसे पहले, 100 रुपये से बड़े नोटों को बंद करने पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए। डिजिटल लेनदेन को और प्रोत्साहित करने के लिए ग्रामीण क्षेत्रों में इंटरनेट और बैंकिंग सुविधाओं का विस्तार करना होगा। साथ ही, आरएफआईडी टैग जैसी तकनीकों को न केवल कमर्शियल वाहनों, बल्कि अन्य क्षेत्रों में भी लागू करना होगा। टैक्स प्रणाली को और सख्त करने के लिए डेटा एनालिटिक्स और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का उपयोग किया जा सकता है, ताकि टैक्स चोरी के मामलों का तुरंत पता लगाया जा सके।इसके अलावा, जन जागरूकता अभियान चलाकर लोगों को डिजिटल भुगतान और कर अनुपालन के प्रति प्रोत्साहित करना होगा। सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि नीतियों का कार्यान्वयन केवल कागजों तक सीमित न रहे, बल्कि जमीनी स्तर पर प्रभावी हो।
सलाह –
भारत जैसे विकासशील देश के लिए आर्थिक पारदर्शिता और समावेशिता केवल नीतिगत लक्ष्य नहीं, बल्कि अनिवार्यता है। बड़े नोटों का प्रचलन और टैक्स चोरी न केवल अर्थव्यवस्था को कमजोर करते हैं, बल्कि सामाजिक न्याय के सिद्धांतों को भी ठेस पहुंचाते हैं। नोटबंदी और आरएफआईडी जैसी पहलों को अधूरा छोड़ना देश के भविष्य के साथ खिलवाड़ है। सरकार को चाहिए कि वह इन सुधारों को पूर्ण दृढ़ता ईमानदारी के साथ लागू करे, ताकि भारत एक ऐसी अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ सके, जहां धन कुछ लोगों की तिजोरियों में कैद न हो, बल्कि विकास और समृद्धि का साधन बने। यह समय है कि हम आर्थिक सुधारों को केवल घोषणाओं तक सीमित न रखें, बल्कि उन्हें जमीनी हकीकत बनाएं।
