वीआईपी कल्चर का मजा उठाने के लिए राजनीति में एंट्री करने वाले गैर राजनीतिक लोगो से अब दूरी बनाने का समय आ गया है । कमल हासन , रवि किशन, विजय ,सन्नी देवल, निरहुआ, गौतम गंभीर, रवि किशन, हंस राज हंस, कंगना राणावत, शत्रुघ्न सिन्हा, पवन कल्याण समेत पूरे देश भर में न जाने कितने पैराशूट हस्तियों ने निर्वाचन प्रक्रिया में शामिल होकर जनता को ठगा है। सत्ता को अपने नेम फेम से सीट देकर किसी सही इंसान की राजनीतिक जिंदगियों को बर्बाद किया है। जनता बस इस बात को लेकर संतुष्ट हो जाती है कि वो फलाने अभिनेता, गायक, क्रिकेटर अथवा ओलंपिक खिलाड़ी के क्षेत्र की जनता है। ये इनका स्टैंडर्ड ही उनका गुरूर बन रहा जो उनके अपने ही हितों के लिए समझौता बनता नजर आ रहा है। अब बताएं, क्या ये पैराशूट प्रत्याशी जनता के लिए स्टैंडर्ड का विषय है या उनके अपने ही पैर पर मारी हुई कुल्हाड़ी? न जाने किस दिशा की तरफ बढ़ रही हमारे लोकतंत्र की चुनावी व्यवस्था ?आपको क्या चाहिए? एक सही प्रत्याशी जो इन सभी दायित्वों का निर्वहन करना जानता हो। जनसेवा के लिए प्रगतिशील हो। पूर्ण रूप से राजनीतिक समझ रखते हुए जनकल्याण की राजनीति करता हो। या फिर मैथिली जैसी पैराशूट प्रत्याशी जिन्हें राजनीति या जनसेवा का ककहरा भी मालूम न हो? एक जनप्रतिनिधि को ये पता होना चाहिए कि उसके क्षेत्र में कितनी जनता है अथवा उन्हें किन किन जरूरतों की जरूरत है। जनप्रतिनिधि समेत तमाम कोठी वाले जिन गरीब मजदूर लोगों के सहारे अपनी जरूरतों को पैसे देकर पूरा करते है उन गरीब मजदूरों की जरूरतों का भी ख्याल रखना भी इसी जनप्रतिनिधि का कर्तव्य होता है।
खेसारी और न जाने कितने स्टार अभी लाइन में है । सारे सवाल है सुबह से दिमाग में चरखी की तरह चक्कर काट रहें है जबसे ये खबर प्रकाशन में आया कि अलीनगर विधानसभा सीट से भाजपा ने गायिका मैथिली ठाकुर को टिकट दिया है। अपने क्षेत्र की जनता को सुख समृद्धिपूर्ण रखने के साथ साथ सामर्थ्यवान बनाने के लिए मानसिक स्तर योजनाएं बनाने के लिए प्रगतिशीलता लानी होती है। सरकारें हर मोर्चे पर फंड देने के लिए आनाकानी करती है, उन्हें अपनी बनाई योजनाओं से कन्वेंस कर के फंड आबंटित करवाना पड़ता है।इनके जैसे पैराशूट प्रत्याशियों को जिताकर क्षेत्र की जनता को स्टैंडर्ड तो मिल जाएगा पर क्या वो अपने हक के लिए उन तक सीधी वार्ता करने को उनका सुरक्षा घेरा भी पार कर पाएगी? संसदीय व्यवस्था की जानकारी न रखने वाले पैराशूट प्रत्याशी चाहे कोई भी हो, इस लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए अमान्य है। क्या जनता को ये बात समझ आएगी? क्या जन कल्याण के लिए चुनाव कराकर जनप्रतिनिधियों को चुनना कोई मज़ाक का विषय बनकर रह गया है? क्या हमारे लोकतांत्रिक देश में चुनाव एक जिम्मेदारी से ज्यादा सीटें जीतने के गुरूर का विषय बनता जा रहा है? कब आएगी जनता के भीतर इतनी समझ की वह अपने क्षेत्र के लिए सही प्रत्याशी कौन है इस बात का अनुभव कर के जनप्रतिनिधियों का चयन करे ? नो डाउट मैथिली एक बेहद ही शानदार लोकगायिका है। वो चुनाव जीते या न जीते ये बात तो जनता पर निर्भर करेगी, पर क्या मैथिली जन कल्याण कार्यों के लिए चुनावी प्रक्रिया में शामिल होने के लिए उपर्युक्त चेहरा रहेंगी ? क्या विधायक या अन्य कोई निर्वाचित जनप्रतिनिधि बनना हलुआ पूड़ी खाने जैसा काम है ? क्या जनता महज वो राशन की दुकान बनकर रह गई है जो आटा तेल चीनी देकर इन्हें हलुआ पूड़ी परोस रही है?

पंकज सीबी मिश्रा राजनीतिक विश्लेषक एवं पत्रकार जौनपुर यूपी
