फैसले ने कैसे बदल दी सदियों पुरानी परंपरा…. पिता नहीं, मां की जाति पर प्रमाणपत्र

एससी एसटी का रिजर्वेशन हिंदुस्तान की राजनीति और समाज में बहुत ही संवेदनशील मुद्दा रहा है। अक्सर ये सुना है कि जाति पिता से मिलती है और सदियों से यह नियम और परंपरा रही है। लेकिन क्या हो अगर देश की सर्वोच्च न्यायालय सबसे बड़ी अदालत यह निर्णय दे और साथ ही साथ सदियों पुरानी इस दीवार को एक निर्णय से ढहा दे। क्या मां की जाति के आधार पर बच्चे को अनुसूचित जाति का सर्टिफिकेट दिया जा सकता है? भले ही उसके पिता नॉन एससी हो। इसे सुप्रीम कोर्ट के केवल निर्णय भर से नहीं देख सकते। यह आरक्षण के पूरे फलसफे को साथ ही साथ संविधान की रूह को और आपकी पहचान के नियम को हमेशा के लिए बदलने का माद्दा रखती है। चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया सूर्यकांत की बेंच ने जो निर्णय दिया है उसमें उन्होंने एक बेटी को उसकी मां की अनुसूचित जाति की पहचान के आधार पर अनुसूचित जाति का एससी का सर्टिफिकेट देने का निर्णय दिया है। यह एक रेयर निर्णय है।

कैसे बदल दी सदियों पुरानी परंपरा

पहली बार एक फैसला हुआ है जिसमें मां के आधार पर बेटी को मिला अनुसूचित जाति का सर्टिफिकेट। सुप्रीम कोर्ट ने एक बेहद अहम फैसले में एक नाबालिक बच्ची को लेकर जो फैसला सुनाया उसमें सुप्रीम कोर्ट ने यह कहा कि इस नाबालिक बच्ची का जो जाति प्रमाण है वो उसकी मां को ध्यान में रखकर दिया जाएगा। एक नाबालिक की शिक्षा, उसकी मां की जाति आदि द्रविड़ के आधार पर अनुसूचित जाति यानी शेड्यूल कास्ट प्रमाण पत्र जारी करने की मंजूरी दे दी है। यह फैसला ऐसे वक्त में आया है जब शीर्ष अदालत के सामने पहले से ही कई याचिकाएं लंबित हैं। जिनमें उस परंपरागत नियम को चुनौती दी गई जिसके अनुसार बच्चे की जाति उसके पिता की जाति के आधार पर तय होती है।

मां के आधार पर बेटी को मिला अनुसूचित जाति का सर्टिफिकेट

सुप्रीम कोर्ट में सीजीआई सूर्यकांत और जस्टिस जॉय माला बागची की बेंच ने मद्रास हाईकोर्ट के उस आदेश को चुनौती देने से इंकार कर दिया जिसमें पुुडुचेरी की इस बच्ची को एससी जाति प्रमाण पत्र जारी करने का निर्देश दिया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा कि अगर बच्ची को समय पर जाति प्रमाण पत्र नहीं मिला तो उसका भविष्य खराब हो जाएगा। इस दौरान सीजीआई सूर्यकांत की एक टिप्पणी ने एक नई बहस को जन्म दे दिया। उन्होंने कहा समय के साथ जब परिस्थितियां बदलती हैं तो फिर मां की जाति के आधार पर जाति प्रमाण पत्र क्यों नहीं जारी किया जा सकता।

कैसे एक गेम चेंजर फैसला

आरक्षण सिर्फ रिजिड लीनिएज रूल्स को फॉलो करने के लिए नहीं बनाया गया था। यहां पर सुप्रीम कोर्ट ने अपने निर्णय को देते समय ध्यान रखा है 1960 के दशक का वीवी गिरी का मामला और साथ ही साथ रमेश भाई का मामला जो कि 2012 का है। इसको नजीर की तरह रेफर किया गया और सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले के द्वारा यह साबित किया कि कानून अंधा नहीं है। महत्वपूर्ण रूप से यह सिर्फ एक केस नहीं है। यह फैसला एक गेम चेंजर फैसला है। यह भारतीय न्यायपालिका का एक नया अध्याय बनने जा रहा है।

प्रक्रिया में कमजोरी आएगी?

सबसे पहली चीज यह है कि इसके माध्यम से रिजर्वेशन कैटेगरी स्विचिंग और मिसयूज शुरू हो जाएगा। मिसयूज की संभावना बहुत ज्यादा लोग बता रहे हैं। लोगों को लगता है कि अब धीरे-धीरे रिजर्वेशन की कैटेगरी स्विच करने का नया रास्ता खुल जाएगा। नॉन एससी पिता जानकर अपने बच्चों की अपने बच्चों को मां के पास एससी कम्युनिटी में भेज देंगे और वहां से उन्हें आरक्षण का लाभ दिलाएंगे। इसके साथ-साथ कम्युनिटी वेरिफिकेशन भी कमजोर होगा क्योंकि समुदाय आधारित सत्यापन जो किया जाता है जो कम्युनिटी बेस्ड सत्यापन किया जाता है उस प्रक्रिया में कमजोरी आएगी।

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