मैं जानती हूं
तुम सब जानते हो
फिर ये भ्रम की माया
क्यों नहीं पहचानते हो ?
जानते हो तुम मेरी
मुस्कुराहट की वजह
फिर मुस्कुरा औरो से
मेरे सीने को क्यों छली करते हो।
मैं जानती हूं
तुम मेरी फिक्र बहुत करते हो
छू न जाए हवा भी मुझे
इस बात से भी डरते हो।
सुना है तुम जीत लेते हो
सब का हृदय
फिर मेरी एक मुस्कुराहट के आगे
क्यों ख़ुद को हारे हुए बैठे हो ?
लिखते हो तुम
अपनी गजलों में मेरे बारे में
फिर मेरा नाम
सरेआम लेने से क्यों डरते हो।

डॉ.राजीव डोगरा
कांगड़ा हिमाचल प्रदेश (युवा कवि लेखक)
