सुप्रीम कोर्ट को साधुवाद जिसने विश्वविद्यालयों और उच्च शिक्षा संस्थानों को झुलसने से बचा लिया । अमेरिका में 1980 तक गोरों और कालों के लिए अलग अलग शिक्षा संस्थानों की व्यवस्था थी । तो क्या भारत में भी ऐसा करना चाहता था कोई ? कौन था वह ? समाज तोड़ने के पीछे कौन सा चेहरा या चेहरे हैं , पता लगाइए ? यह जरूरी है । दिग्विजय सिंह क्या बीजेपी के सत्ता में रहते हुए भी इतने बलवान हैं जो वो ये कर सकें अकेले ? यह जानना बहुत जरूरी है कि यह सरकार के मानव संसाधन मंत्रालय की भारी चूक है अथवा इसके पीछे उस लॉबी का षड़यंत्र था जो 12 सालों से सरकार गिराने में हर तरह से नाकामयाब रही है ? देश को 89 – 90 के मंडल दावानल में कौन झोंकना चाहता था ? किसकी मंशा थी कि जाति जाति खेलने की ? अब जबकि सुप्रीम कोर्ट ने यूजीसी न्यू रेगुलेशन पर रोक लगा दी तो ये मान लें कि क्या न्यायपालिका सच में चाहती है कि सबको समान अवसर मिले और 80 सालों से चला आ रहा सवर्ण अधिकारों के शोषण पर लगाम लगे।
जो लोग यूजीसी रेगुलेशन का समर्थन कर रहे थे वो स्टे के बाद संविधान पर सवाल उठा रहे जबकि रेगुलेशन के विरुद्ध आंदोलन कर रहे लोग क्या मांग रहे हैं ? क्या कोई अधिकार या आरक्षण ? कोई सुविधा या कानून ? नहीं ना । वे चाह रहे हैं कि उन्हें पहले ही अपराधी न मान लिया जाय और उनके विरुद्ध होने वाले अपराध को भी अपराध माना जाय। क्या यह बिल्कुल ही अनैतिक मांग है ? अपनी इस मांग को लेकर मुखर हुआ वर्ग किस दल का पारंपरिक वोटर है ? इनमें से अधिकतर लोग वर्तमान सत्ता पक्ष के समर्थक हैं और चुनावों के समय सक्रिय भूमिका भी निभाते हैं, तो क्या अपनी ही सरकार से स्वयं को अपराधी घोषित नहीं किए जाने की उम्मीद करना अनैतिक है, जवाब सवाल गलत है ? आप सोशल मीडिया पर कंचना यादव, राजकुमार भाटी इत्यादि के हैंडल देख लीजिये , आज इस आंदोलन के बहाने सवर्णों को गाली देने वाले, उन्हें फसाने की खुली धमकी देने वाले, और हिंदुत्व के खंडित होने की बातें करने वालो पर कोई कानूनी कार्यवाही नहीं हो पाती।
कौन लोग हैं जो समाज को बाँट रहे ? ये अधिकांश वे है जो विरोधी दल के समर्थक हैं और सदैव ही सत्ता को जातिवाद से , सवर्णों के सनातन होने के कारण और हिंदुत्व की विचारधारा को गाली देते आ रहे हैं। क्या वे इस रेगुलेशन के लागू हो जाने से सत्ता के समर्थक हो जाते ? नहीं न ! फिर आप उनसे सहमत कैसे हो पा रहे थे ? आजादी के 78 साल बाद भी हम देश को जातियों से मुक्त न कर सके ? सुप्रीमकोर्ट चीफ जस्टिस की यह चिंता भारतीय राजनेताओं की गाल पर मारा गया करारा तमाचा है । क्या हम भारत को गोरे और काले के बीच बंटा अमेरिका बनाना चाहते हैं ? सुप्रीमकोर्ट का यह दूसरा बहुत बड़ा तमाचा था । यूजीसी का नया नियम भारतीय समाज और लोकतंत्र के लिए कितना बड़ा खतरा है , यह सोचा किसी ने ? सीजेआई का यह तीसरा सवाल था ।
सवर्णो की वर्तमान स्थिति को ध्यान में रखकर सुप्रीम अदालत ने सरकार और यूजीसी दोनों को नोटिस जारी किए हैं । करीब डेढ़ महीने बाद सुप्रीमकोर्ट इस मामले को सुनेगा । यह तय हुआ कि 2026 लगते ही आनन फानन में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने नियम बनाए , देश ने दुःख भोगा , सरकार को जवाब देते न बना , टीवी पर्दे से बीजेपी प्रवक्ता गायब हो गए । निश्चित रूप से इसके लिए चेयरमैन विनीत जोशी तथा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान सीधे सीधे जिम्मेदार हैं । सीजेआई न्यायपालिका ने दिखा दिया कि वह सचमुच सबसे चिंतनशील है । विष्णु शंकर जैन तथा अन्य वकीलों का प्रयास सराहनीय है । नेता अपनी नाकामयाबी का बदला क्या इस तरह लिया जाएगा ? गौर से ढूंढिए , कोई जयचंद देश के भीतर छिपा है अथवा राजनीति के भीतर ! हर तरह से हताश हो चुके विपक्ष भी सवर्णो के साथ खड़ा मिला, अखिलेश यादव, मायावती बर्क ओवैसी इत्यादि ने यूजीसी के रेगुलेशन को गलत ठहराया। तो किसने इस रेगुलेशन के माध्यम से यह खेल खेला है ? जो भी हो पता तो चल ही जाएगा ।
कोई तो है जो सरकार की लगातार लोकप्रियता से घबराया हुआ है, पर्दा उठाइए , यह बेहद जरूरी है ? सवर्णो और मुख्य न्यायधीश सूर्यकान्त पर कुछ अभद्र टिप्पणियों के स्क्रीनशॉट घूम रहे हैं। कहा जा रहा है कि एक झटके में ही हिंदू हृदय सम्राट को उनकी जाति से बुलाया जाने लगा। तो क्या सवर्णों के लिए अभद्र टिप्पणियों की शुरुआत आज ही हुई है ? क्या इस देश में पिछले पंद्रह बीस सालों से सवर्णों के लिए भद्दी से भद्दी भाषा प्रयोग करने का चलन नहीं बन गया है ? मनु के लिए ही आज तक क्या क्या कहा गया है और किसने किसने कहा है, क्या यह बताने की आवश्कता है ? छह महीने पूर्व तक जो लोग तुलसीदास तक को गाली दे और दिलवा रहे थे, वे अब एक फर्जी स्क्रीनशॉट पर नैतिकता ढूंढने लगे ? अभी भी जो चार स्क्रीन शॉट घूम रहे हैं उनमें सब फर्जी आईडी के हैं।
प्रधानमंत्री को सबसे अधिक सम्मान सवर्ण ही देते आए हैं, और इसके कारण गालियां भी सुनते रहे हैं। आप आज भी सोशल मीडिया में देखिए, सवर्णों का एक बहुत बड़ा वर्ग अपने समाज के विरुद्ध जा कर उनके साथ खड़ा है, उनके ऊपर पूरा भरोसा बनाए हुए है। यह छोटी बात है क्या ! आप कह रहे हैं कि हिन्दू एकता की बात कहां चली गई। मतलब आप चाहते हैं कि ओबीसी के रास्ते घुस कर मुस्लिम, बौद्ध, ईसाई भी सवर्णों को ब्लैकमेल करें, उन्हें परेशान करें और सवर्ण इसे सर झुका कर स्वीकार करें तो हिन्दू एकता आयेगी ? मतलब आप अत्याचार और आरक्षण के लिए सवर्णों की बलि चाहते हैं और बात हिंदू एकता की करेंगे ।

पंकज सीबी मिश्रा, राजनीतिक विश्लेषण एवं पत्रकार जौनपुर, यूपी
