हिंदुत्व बचाने का बोझ कब तक उठाएगा उच्च वर्ग..!

हिन्दू होने कि जिम्मेवारी सिर्फ ब्राह्मणों पर नहीं है, जैसे इस्लाम से खतरा का विचार भाजपा प्रस्तुत करती है। वैसा खतरा सभी हिंदुओं के लिए समान है, उन्हे भी उसकी चिंता करनी चाहिए। केवल ब्राह्मणों पर उसकी ठेकेदारी नहीं है। खतरा आएगा तो सबके लिए आएगा। जेएनयू में आजादी मांगने वाले लोगो से सरकार क्यों नहीं पूछती की वो किस धर्म जाति और वर्ग के है। यदि वो गैर हिंदू है तो फिर पाकिस्तान और बांग्लादेश को इसी धर्म के आधार पर आजदी हासिल हुई है जाए वहां और चैनो अमन से रहे  अगर वो वामपंथ समर्थक है तो पश्चिम बंगाल और केरला जाए वहां उनका भाईचारा मिल जायेगा और अगर वो निचले वर्ग के हिंदू है तो  पहले हिंदू होने का फ़र्ज निभाए वरना ऐसो पर देशद्रोह का मुकदमा दर्ज हो जो यूजीसी बिल के समर्थन में ब्राह्मणवाद मुर्दाबाद के नारे लगा रहे । ब्राह्मणो का खुले मंच से अपमान हो रहा और कोई नेता मंत्री सांसद विधायक ब्राह्मणों के पक्ष में नहीं उतरा तो क्या यह कहुँ मै कि हिंदुत्व बचाने की अकेली जिम्मेदारी धीरेन्द्र शास्त्री, अमिताभ अग्निहोत्री,  मनोज मुंतशीर, शुभांकर मिश्रा और पंकज सीबी मिश्रा के कंधो पर है..!
यह बात तो बहस का है ही, मगर फिर भी यूपी के उप मुख्यमंत्री पाठक के इस आप्टिक्स का मैं स्वागत करता हूँ जहां उन्होंने दबे स्वर में ही सही पर कहा तो कि कुछ तो गलत है । उन्हे पता होना  चाहिए कि पार्टी ने भले उन्हे पद और सरकार में जिम्मेवारी दी हो लेकिन दी ब्राह्मण वोटों के वजह से ही है। यूपी  में जो ब्राह्मण विधायक गाड़ी के आगे विधायक का पट्टी लगाए घूम रहे हैं ,और ऐसे नाजुक समय में जब राजधानी से लेकर इंटेलिजेसिया तक और एमपी से लेकर स्ट्रीट तक से ब्राह्मणों  के नरसंहार का आह्वान हो रहा है। उसपर चुप्पी साधे हुए हैं , उन्हें भी अब ऐसे टिप्पणियों पर कॉल आउट करना चाहिए। किसी भी काम के लिए देर नहीं होता है। ब्राह्मणवाद शब्द सीधे ब्राह्मण जाति से जुड़ा हुआ है, इसको लेकर जो विश्वविद्यालयों में निरंतर अकादमिक और राजनैतिक विष वमन हो रहा है उस पर अब सभी ब्राह्मण सांसदों विधायकों मंत्रियो नेताओं को खुलकर बोलना चाहिए। और सिर्फ बोलना ही नहीं एक ऐसा मंजर खड़ा करना चाहिए कि ब्राह्मणवाद के लिए अपशब्द कहने वालों की सात पुस्ते काँप जाए।
अगर आज आप चुप रहे तो कल हिंदुत्व बचाने के चक्कर में ब्राह्मणो के बच्चे अल्पसंख्यक होंगे और गुलामी करते सड़को पर दिखेंगे। अब जो सक्षम लोग है , उन्हें अदालत में इस ब्रह्मणवाद शब्द के गलत इस्तेमाल और उससे आम ब्राह्मणों पर हो रहे हमलों को डॉक्यूमेंट करके केस फाइल करना चाहिए।  इस शब्द के विषवमन के वजह से मध्यप्रदेश मे एक बुजुर्ग ब्राह्मण कि हत्या घटना अभी हाल में ही घटी है। एक असामाजिक तत्व जो ब्राह्मण था उसके एक आदिवासी पर शराब के नशे में  पेशाब करने के बाद तात्कालिक मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने उसे घर बुलाकर पाँव पखारा था। आरोपी के घर पर बुलडोजर चलवाया था। मगर वहीं बुजुर्ग पुजारी कि जाति देखकर हुई हत्या पर एमपी सरकार का एक बयान तक नहीं आया। आखिर यह चुप्पी भाजपा की है या एक जातिवादी मुख्यमंत्री की..! समय आ गया है कि आप अब संसद  सदन में प्रश्न पूछे कि गरीब ब्राह्मणो के उत्थान और ब्राह्मणवाद को गाली देने वालों के लिए सरकार ने क्या कदम उठाया..! सवर्ण आयोग का गठन क्यों नहीं हो सकता..!
यूपी में कुछ तो गंभीर जरूर है जो बीजेपी के दिग्गज संगठन नेताओं के बजाय खुद संघ प्रमुख को आना मैदान में आना  पड़ा है । गंभीर न होता तो यूपी में दो उप मुख्यमंत्री भी न बनाने पड़ते तब । अब चुनाव के पूर्व वर्ष में जिस प्रकार ब्राह्मणों और राजपूत विधायकों की अलग अलग बैठकें हो रही हैं , वह चिंता का विषय है । पिछले लोकसभा चुनाव में अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी ने यूपी में बीजेपी से ज्यादा सीट लेकर मोदी के विजय रथ को रोका और एनडीए के सहयोगी दलों का मोहताज बना दिया । तब से उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य अजीबो गरीब तेवर दिखा रहे हैं उनके तेवर क्यों नहीं कुचले जा रहे..! लगातार ओबीसी प्रदेश अध्यक्ष देना क्या आपको नहीं चुभता..! बेशक केशव का कद उतना बड़ा नहीं है , जितना वे प्रदर्शित करते हैं । बड़ा होता तो पिछली बार वे खुद अपना चुनाव न हार जाते । हां उन्हें यह मलाल जरूर है कि यूपी के सीएम तो वे ही बनते , 2017 में योगी ने खंभा ठोक कर उनका खेल बिगाड़ दिया था। पंकज चौधरी जैसों को लाने से पहले भूपेंद्र चौधरी का हाल चाल लें लेते आप पहले पर अब देर हो चुकी  है अमित शाह क्यूंकि इस बार आपकी आईटी सेल कमजोर है और ब्राह्मण अब आर – पार के मूड में है।
यूपी और बिहार ऐसे राज्य हैं जिन्हें मुलायम , मायावती और लालू की राजनीति ने बीमारू राज्य बना दिया था । यूपी में योगी और बिहार में नीतीश ने क्रमशः दोनों राज्यों की दशा सुधारी । दरअसल मोदी ने विराट हिन्दुत्व का कार्ड खेलकर जातपात की ऐसी हवा निकाली कि मायावती और लालू खत्म हो गए , कांग्रेस गले तक डूब गई और खुद को पिछड़े समाज का नेता समझने वाले केशव प्रसाद मौर्य और स्वामी प्रसाद मौर्य जैसे जातिवादी नेता बिलबिलाने लगे । जहाँ तक दूसरे उप मुख्यमंत्री बृजेश पाठक का सवाल है वे ब्राह्मणों की राजनीति जरूर करते हैं परन्तु उनका कद योगी को मात देने वाला कभी नहीं रहा । उनकी कहानी दूसरी है । उन्हें यह भी पता है कि उनके मुख्यमंत्री बनने का नंबर केशव प्रसाद के रहते तो नहीं आएगा । लेकिन बड़े प्रदेश में ब्राह्मण राजनीति के अगुआ वे बने रहना चाहते हैं । एक और खेमा यूपी के बीजेपी अध्यक्ष चला रहे हैं । यही वजह है कि भाजपा में जातीय राजनीति को फैलने से रोकने के लिए अब सर्वोच्च दिग्गज मोहन भागवत को स्वयं उतरना पड़ा है। यूपी में अगले साल चुनाव हैं जिन्हें न भागवत खोना चाहते हैं और न मोदी । वैसे बताते चलें कि मोदी ने जिस दिन नजरें घुमाई , किसी की जरूरत नहीं पड़ेगी।
भागवत की भी नहीं । मोदी की पहली पसंद योगी हैं , यह बात मौर्य ही नहीं , अमित शाह भी जानते हैं । यूपी की राजनीति देश पर प्रभाव डालती है, प्रधानमंत्री कुर्सी का रास्ता भी यूपी से होकर गुजरता है । 2029 में यदि संघ मोदी को चौथी बार पीएम बनाना चाहता हैं तो बीजेपी को यूपी जीतना ही होगा और बिना ब्राह्मणवाद  यह संभव नहीं । यूपी के लिए इसीलिए जरूरी हैं इस बार ब्राह्मणो के साथ मजबूती से आना । पक्ष-विपक्ष कहीं भी कोई ब्राह्मण नेता हो , जिसे अपनी पहचान कि समझ हो और अपने पुरुषार्थ से नेता बना हो । उसे अपने-अपने  पार्टी फोरम मे ऐसे  घटनाओं को उठाना चाहिए जो ब्राह्मणवाद पर प्रहार करता हो,  चूंकि अभी ब्राह्मणों का मत सर्वाधिक भाजपा और नरेंद्र मोदी के साथ है , इसलिए यह अपेक्षा भाजपा नेताओं से अधिक है। धर्मेन्द्र प्रधान ने यूजीसी बिल की धूर्तता में अनचाहे ही ब्राह्मण समाज में  लुप्त हो रही जातिगत भावना को झकझोर दिया है, तो भाजपा के ब्राह्मण नेताओं को समझना होगा कि समाज अब सिर्फ मोदी का नाम देखकर वोट नहीं देगा। उसकी अपेक्षा जो है उसकी पूर्ति होनी चाहिए। बाकी उपमुख्यमंत्री का धन्यवाद कि देर से ही सही उन्होंने अपनी चुप्पी तोड़ी और बतलाई कि शंकराचार्य के साथ हुए अन्याय में उनकी सहमति नहीं थी।
पंकज सीबी मिश्रा / राजनीतिक विश्लेषक एवं पत्रकार जौनपुर यूपी 

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