योजनाओं से बढ़ी महंगाई और मुश्किल में फंसी कमाई…..

इस दशक में महंगाई की रफ़्तार नें सबको अचम्भे में डाल दिया है। एक तरफ महंगाई तेजी से दौड़ रही तो दूसरी तरफ सरकारी तनख्वाह भी छलांगे मार रहा । बस प्राइवेट कर्मियों की दिहाड़ी उतनी ही है जितना पच्चिस साल पहले थी । अब ऐसे में देखा जाय तो दोष केवल और केवल मोदी शासन का जहां महंगाई नियंत्रण की कोई योजना नहीं ला पाए। सब अपने मनमानी में बेकल है। मोदी के ही कारण कल तक ट्रंप के लिए नमस्ते और गरबा हुआ अब पुतिन के लिए वल्लक्क्म पुतिन, उनके लिए शुक्रवार को हवन का धुआँ आसमान छू रहा ।  तब मंत्र था  ओम ट्रंपाय चचा नमः, मुस्लिम-बैन, टेरिफ़ाय नमः ! आज वही धुआँ वाराणसी में पुतिन दादा की आरती के लिए उठ रहा है।भारत-रूस भाई-भाई, S-400 में मिले मलाई। कल ट्विटर वाले चिल्ला रहे थे, ट्रंप हमारा बेटा है , आज वही चिल्ला रहे हैं कि ट्रंप महालपेटा है , 50% टैरिफ़ लगाई ! ज़ब इस बाबत मोदी जी से पूछा गया तो वे  मुस्कुरा रहे थे । वे कह रहें थे हर योजना सफल है ! देश अब उस मुकाम पर पहुँच गया है जहाँ हर विदेशी मेहमान को पहले भगवान बना दो, फिर उनसे क़ाम लो, आंकड़े बनाओ फिर ज़ब ट्रम्प जैसा कोई विदेशी अकड़ दिखाए तो उसे रगड़ दो या फिर जब वो नखरे करे तो भूत बना दो । इससे विदेश नीति आसान हो जाती है, न कुछ करना पड़ता है, न कुछ कहना। बस थाली घुमाओ, घंटी बजाओ, धुआँ उड़ाओ, ट्रेंड  हो जाओ।
वैसे सूत्रों कि माने तो अगले साल शी जिनपिंग भारत आएँगे। उनके आते ही और हल्ला मचेगा। उनके लिए तो लगेगी  ओम जिंग पिंग शी नमो नमः की माला। आख़िर आत्मनिर्भर भारत का मतलब ही यही है न विदेशी नेताओं  का आयात, शून्य प्रतिशत टैरिफ़ पर हो।
सितंबर, 2013 में भारतीय रूपया डॉलर के मुकाबले गिरकर अपने सबसे निचले स्तर 68 रुपए पर पहुंच गया था। तब मनमोहन सिंह ने आरबीआई के साथ मिलकर अप्रवासी भारतीयों के लिए एफसीएनआर (बी ) नामक एक इन्वेस्टमेंट स्कीम लांच की थी, जिसके तहत एनआईआर को अमेरिकी बैंकों के मुकाबले तीन गुना ब्याज देने की गारंटी दी गयी थी। शुरू में इस स्कीम की बेहद आलोचना हुई पर सरदार जी की यह स्कीम गेमचेंजर साबित हुई। भारत के पास डॉलर के इन्वेस्टमेंट की झड़ी लगी गयी। कुछ ही दिनों में भारत को लगभग डेढ़ लाख करोड़ का फॉरेक्स रिज़र्व प्राप्त हुआ था और दो महीने के भीतर रुपया मजबूत होकर 60 तक आ गया था। यह मौनमोहन सरदार का मास्टर स्ट्रोक था, जिसके बारे में कम ही लोग जानते हैं।  वैसे ऐसा ही एक मिलता-जुलता मास्टर स्ट्रोक हमारे विपक्ष के बैगाक जाने वाले महात्मा जी के नाम भी दर्ज है। रुपए को मजबूत करने, विदेशी मुद्रा भंडार बढ़ाने और सोने का इम्पोर्ट कम करने के लिए महात्मान चुनाव बीच में छोड़ फॉरेन निकल जाने की बीमारी है।
सरकार ने 2015 में सॉवरेन गोल्ड बॉन्ड योजना शुरू की थी। अर्थात – अपना सोना सरकार को दो और गोल्ड बॉन्ड खरीद लो। 8 साल बाद ढाई परसेंट के ब्याज के साथ सोने की वर्तमान कीमत के हिसाब से रिटर्न ले लेना। निवेशकों ने धड़ाधड़ इस स्कीम में इन्वेस्ट किया। सरकार को सोने की कीमतें स्थिर रहने की उम्मीद थी। परंतु जो सोना 2015 में 26 हजार का था, उसने सब अनुमानों को धता बताते हुए ऐसी जंप मारी कि 2024-25 आते-आते लाख रुपए पार हो गया। परिणामस्वरूप आज सरकार ने अपने ऊपर सवा लाख करोड़ के आसपास की एक्सट्रा लायबिलिटी मोल ले रखी है, जो वह लोगों को चुका रही है। सरल शब्दों में – इस सोने के इन्वेस्टमेंट से जितना लाभ नहीं कमाया, उससे कहीं ज्यादा का बिल फट गया। झक मार कर अंततः इस साल इस स्कीम को बंद कर दिया गया। नोटबंदी और जीएसटी की तरह यह योजना भी मास्टर ब्लंडर साबित हुई। अंत में एक बार फिर से याद दिला दूँ कि पिछले 11 साल में जीडीपी 2 ट्रिलियन से 4 ट्रिलियन अर्थात दो गुनी हुई है। वहीं राष्ट्रीय कर्ज 55 लाख करोड़ से 200 लाख करोड़ पार हो चुका है, अर्थात कर्ज की वृद्धि चार गुना हुई है।

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