बिहार भाजपा में नेतृत्व आभाव से चुनावी हवा ठप…..

बिहार को विकास के रास्ते से हटाने के लिए पप्पू यादव, कन्हैया कुमार जैसे तेजश्वी लोग सक्रिय है ऐसे में बीजेपी के लिए जातिवाद के आगे टीके रहने की भारी चुनौती है। भाजपा जदयू गठबंधन में भर्तिया तो हुई है, लोगो को रोजगार भी मिला है, राजस्व भी बढ़ा है पर जातिवादी वोटर कहाँ यह सब समझने और मानने को तैयार है उन्हें तेजी से आगे ले जाने के लिए यहाँ शिक्षा व्यवस्था को बहुत बेहतर बनाने की जरूरत है जो यहाँ के ज्यादातर लोगों की मानसिकता में सकारात्मक सुधार कर सके पर यह पप्पू यादव जैसों के चुनाव में चुनौती देते रहने से कहां संभव ! बाकी पूर्व आईपीएस शिवदीप लांडे हों या आनंद मिश्रा, या पीके सब यहाँ कुछ न कर पाएंगे सिवाय खुद फ्रस्टरेट होने के ! अच्छी-भली वर्दी सर्दी और खुदगर्जी  वाली नौकरी कर रहे थे, तब तक जनसेवा के कीड़े ने काट लिया।

उधर राजद ने तेज प्रताप प्रकरण में अपनी छवि बेहतर दिखाने के लिए अपने बड़े बेटे की बलि दे दी। बिहार की निरीह जनता लालू राज के आतंक को भूल सहानुभूति में बह जाए तो अतिश्योक्ति नहीं होगी। 90 के दशक की घटनाएं जिनमें  अभिषेक मिश्रा शिल्पा जैन इत्यादि के किरदार थे  को प्रचारित करने की, तो उससे लालू समर्थकों मुश्लिम – यादव गठबंधन  को तिनका बराबर भी फर्क नहीं पड़ना है, लाख भाजपा हाथ-पाँव मार ले उसे आसानी से इस बार सत्ता नहीं मिलने जा रही ! ज्यादातर बिहारी पहले भी लालटेन के साथ थे, अभी भी हैं और आगे भी रहेंगे उन्हें अत्याचार और पिछड़ेपन से घंटा फर्क नहीं पड़ता। पीएम के जबरदस्ती के रोड शो (युद्ध का जोश ठंडा पड़ चुका है, ऑपरेशन सिंदूर भुनाने से कोई फायदा नहीं होने वाला) से ज्यादा बढ़िया होता कि बिहार भाजपा में लालू-नीतीश के कद का कोई दमदार नेतृत्व खड़ा करे, जो कि फिलहाल जातिवादी व पिछड़े बिहार में बिहार भाजपा के पास दूर-दूर तक नहीं दिख रहा।

सही समय था सम्राट चौधरी को गिरिराज सिंह के साथ फ्रंट पर लाकर चुनाव में बूथ लेवल की तगड़ी तैयारी करती। स्थिति यह है कि पता सभी को है कि नीतीश बाबू की मानसिक स्थिति ठीक नहीं, हालिया एसीएस सिद्धार्थ-गमला प्रकरण सबने देखा, फिर भी बिहार भाजपा को उनको ढोना मजबूरी है क्योंकि मानसिक रुप से अस्वस्थ नीतीश अभी भी बिहार भाजपा पर अकेले भारी हैं। पर जिस हिसाब से यहाँ लाखों की संख्या में “अप्रतिम व अति प्रचण्ड योग्य” बीपीएससी शिक्षकों की बहाली हुई है आनन-फानन में, अगले 20-30 साल फिर कोई सम्भावना नहीं दिखती। तिस पर जब अत्यंत विद्वान वरिष्ठ आईएएस अधिकारी एसीएस सिद्धार्थ बाबू कहते हैं कि सरकारी शिक्षक “परीक्षा” पास करके आएं हैं, इसलिए निजी शिक्षकों से बेहतर हैं, तो हँसी आती है। खैर, तत्पश्चात् बिहार में कृषि आधारित उद्योग में सम्भावनाओं को तलाशने की जरूरत है।  हाँ एक चीज जो सकारात्मक रही है वह मुख्य्मंत्री नीतीश कुमार द्वारा सवर्ण आयोग गठन की बात करना जिसके कारण कांग्रेस के वोटर जदयू के तरफ आकर्षित हो सकते है।

पंकज सीबी मिश्रा /राजनीतिक विश्लेषक एवं पत्रकार जौनपुर यूपी 

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Breaking News
PM Modi की West Bengal में बड़ी चेतावनी, 4 May के बाद TMC के हर पाप का होगा हिसाब | Congress आई तो जेल जाने को रहें तैयार, Rahul Gandhi का Assam CM को अल्टीमेटम | Himanta Biswa Sarma का Congress पर बड़ा पलटवार, Pawan Khera को दी जेल भेजने की चेतावनी | अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बार फिर अपना गुस्सा जाहिर करते हुए कहा, "उस जलडमरूमध्य को खोलो, तुम पागल कमीनों!"
Advertisement ×