वैश्विक उथल पुथल और विश्व युद्ध की स्थिति के बीच शांत भारत – लोगो नें कहा मोदी है ना..!

पहले रूस युक्रेन फिर ईरान इजरायल, तब  फलस्तीन गाजा अन्त में श्रीलंका व बांग्लादेश और अब अमेरिका वेनेज़ुएला। यह सब अस्थिर देश है जो एक दूसरे पर नियंत्रण की कोशिश में लगे है। इसके बाद अब अगला नंबर पाकिस्तान और चीन का है। बांग्लादेश भी उबाल मार रहा है, वहां देशव्यामी प्रदर्शन हो रहे हैं यह सही समय है लोकतंत्र के उदय का। इजरायल की तैयारी पूरी है बस डोनाल्ड ट्रम्प के ग्रीन सिग्नल का इंतजार है बस फिर इजरायल गाजा फूँकना शुरू कर देगा। भारत निश्चिन्त बैठा हुआ है और लोग कह रहें मोदी है ना…! सब सम्हाल लेगा। वैसे भी सन तिहत्तर के बाद से जब जब पाकिस्तान भारत को अस्थिर करने की कोशिश करता है, भारत का एयर डिफेन्स सिस्टम एक्टिवेट हो जाता है और एयर फोर्स घर में घुसकर सर्जिकल स्ट्राइक करके वापिस आ जाती है। ज़ब तक पाकिस्तान की इकोनॉमी थोड़ी सुधरती उससे पहले ही बिगाड़ दी जाती है।
इसलिए भारत को विश्व युद्ध में बहुत चिंतित होने की जरुरत नहीं और रूस, फ़्रांस तथा जापान जैसे मित्र राष्ट्रो के बलबूते हम अमेरिका तक के छाती पर मूंग मल रहें। ईरान के माहौल का नियंत्रण अब खामनेई से बाहर हो चुका है शाय़द वह भी अब मार दिया जाए या फिर असद की तरह रूस भाग जाए। चीन का एयर डिफेंस सिस्टम और मिसाइल सिस्टम फिर एक बार वेनेजुएला के लिए फुलझड़ी साबित हुआ है । लेकिन यह तो तय है कि अमेरिका का भी नुकसान होगा। अमेरिका ने ग्रीनलैंड को भी धमकाया है वहीं साऊथ अमेरिकन देशों को भी डोनाल्ड ट्रम्प ने हड़का रखा है। कहीं ना कहीं तो बवाल और तबाही होगी और बहुत जल्दी होगी। मैं तो कहता हूं लड़ो खूब लड़ो और लड़ मरो आपस में। हमारा क्या है हमारे पास तो मोदी है सब संभाल लेंगे। तेल के खेल में तीसरा विश्व युद्ध आ धमका है। विश्व का सबसे बड़ा तेल ‘रिज़र्व’ वेनेजुएला है, जहाँ विश्व में सबसे अधिक ‘इन्फ्लेशन’ (मुद्रा स्फिति) थी । यह आखिर कैसे मुमकिन हुआ कि अमीरों से धन लेकर गरीबों में बांटने का मॉडल असफल रहा ? या महत्वपूर्ण  संसाधन तेल पर निर्भर रहने के बाद भी आज उनके राष्ट्रपति का अपहरण हो जाता है ?
जब वेनेजुएला में ह्यूगो चावेज़ अपने टशन में थे तो जॉर्ज बुश के अगले दिन यू.एन. में भाषण देने गए तो वहां मिडिया के हवाले से कहा गया , डेविल केम और सबने तालियाँ बजाई। तब तेल की धार में दम था। सावेज  गरीबों के मसीहा थे। मुफ्त घर और भोजन देते थे। अस्पताल सुविधा और खाद्य सेवाएँ देते थे। वेनेजुएला समृद्ध और सफल देश था। पर एक दिन वो मरे, तेल के दाम भी गिरे, और वेनेजुएला कंगाल होता गया। ठीक वैसे ही जैसे एक समय कतर पूरे मध्य-एशिया का सबसे गरीब देश था। जब तेल की खोज हुई, यह दुनिया का सबसे अमीर देश बन बैठा। लोग यह भी कहते हैं कि यह इश्लामिक पूंजीवादी देश है। विदेशी निवेश और विदेशी लोग इस हद तक है कि कतर में बस बीस प्रतिशत ही मूल लोग हैं, बाकी सब विदेशी हैं। ‘अल जज़ीरा’ और ‘कतार एयरवेज़’ सरीखी कंपनियों का मालिक, ‘ट्रंप टावर’ में ऑफ़ीस, वोल्क्सवैगन गाड़ियों का बड़ा शेयर मालिक था कतर । क्या नहीं है कतार के पास ? फिल्मी अंदाज में कहें तो, “कतर के पास सब कुछ था बस मोदी नहीं था ”
कतर सहित अन्य इश्लामिक देशो में विश्व की सबसे अधिक यौन-विषमता है। यहाँ पुरूष की जनसंख्या महिलाओं से लगभग दोगुनी है। यानी, दो पुरूष पर एक स्त्री। यहाँ की शिक्षा का ये हाल है कि बस पंद्रह प्रतिशत लोग उच्च शिक्षा पा रहें थे।  कतर में कृषि और भोजन उत्पादन शून्य है। फिर कतर मोदी और भारत से भीड़ बैठा तभी बाकी के अरब देशों ने मौका पाकर कतर से अपने संबंध तोड़ लिए, तो कतर के लिए सब्जियाँ मंगानी कठिन हो गयी । संबंध इसलिए तोड़ा, क्योंकि कतर ‘इस्लामिक स्टेट’ और ‘अल कायदा’ को धन देता रहा है। ‘अल जज़ीरा’ की इस देश के राजनीतिक संगठनों में खूब पैठ रही है। और अब कतर से सभी इश्लामिक देश कतरा रहें। जब डॉलर के मुकाबले वेनेजुएला की मुद्रा बोलीवर घटी, तो भी सरकार ने घर में कीमत नहीं घटाई। लोग दो बोलीवर का डॉलर बोलीविया में खरीदते, और अमरीका से पांच बोलीवर कमा कर लाते।
सोचिए अगर भारत सरकार बीस रूपया में डॉलर देने लगे, तो हम वहीं डॉलर ले जाकर अमरीका से चौसठ रूपए न ले आएँ ? एक समय  वेनेजुएला में मुद्रा की कोई कीमत नहीं थी,  पांच सौ बोलीवर में एक किलो टमाटर मिलता था पिछले साल। अब दस हजार बोलीवर में पीने का साफ पानी । इकोनॉमी और परिणाम यह रहा कि सैन्य शक्ति कमजोर होती गईं और आज अमरीकी सैनिक आये और राष्ट्रपति मोदूरे को ही उठा ले गए। दरअसल इस समाजवादी देश ने उदारवादी और कल्याणकारी नीतियाँ तो अपनाई, पर विदेशी निवेश नहीं होने दिया (अमरीका द्वारा बाधाएँ भी लगी) और तेल के अतिरिक्त कुछ खास इन्वेस्ट नहीं किया। नॉर्वे भी अब आक्रमण के जद में है। यहां का तेल वेनेजुएला की तरह राष्ट्रीयकृत है। लगभग सभी कमाई की चीजें सरकार के अंदर हैं, या सरकार का शेयर है। लॉटरी से घुड़सवारी तक। नॉर्वे में विदेशी निवेश उस हद तक ही है कि देश का उद्योग बचा रहे। नौकरीयों में प्राथमिकता स्थानीय लोगों को सबसे पहले है। और इनके सरकारी फ़ंड ने विश्व भर में तमाम उद्योगों में पैसा लगा रखा है।
विदेशी निवेश तो छोड़िए, प्राईवेट कंपनियों से तेल का अधिकार छीन सरकारीकरण कर लिया। तेल डूब गया, ये भी डूब गए। यहाँ के लोग आज भी तेल के दाम बढ़ने की दुआ कर रहे हैं। पर समस्या तेल के दाम नहीं, कुछ और भी है। विश्व के कई  धनी देश है , जहाँ ऐशो-आराम चरम पर है। दोमंजिले इमारत में भी लिफ़्ट, एक गिलास पानी के लिए भी नौकर, लक्ज़री गाड़ियाँ, और पानी से भी सस्ता पेट्रोल। गर आधुनिक स्वर्ग कहीं है, तो वह इन्हीं देशो में है पर अब सब लड़ कट मर रहें। धनी देशो में बड़ा मजदूर और नौकर वर्ग धर्म विशेष से, भारत पाकिस्तान और बांग्लादेश से हैं, जिन्हें गुलामों की तरह रखा जाता है। उनके मानवाधिकार की स्थिति खराब है। अब तेल के दाम भी घट गए, तो जिस जोश खरोस  से युद्ध होनेवाला था, उसका उत्साह  घट कर आधा हो गया। ‘अल जज़ीरा’ लश्कर ए तैयबा और हिजबूल मुजाहिदीन पर पाबंदी की मांग हो रही है, और शायद बंद भी हो जाए। तो सबसे अमीर देश होने के बावजूद भी कुछ धनी देश विकास के इंडेक्स में पिछड़े नंबर पर है। इसलिए मात्र धन, पूंजीवाद और धर्म के राज से शायद देश सारी खुशियाँ नहीं पा सकता। तेल और विश्व युद्ध के इस दौर में भारत देश में न कतर सी अय्याशी है, न वेनेजुएला सी गरीबी, यहाँ साधारण संघर्षशील जीवन है।
यहाँ तेल पानी से सस्ता नहीं, बल्कि महंगी है। यहाँ कोई इतना अमीर नहीं कि बीस लक्ज़री गाड़ी या हेलिकॉप्टर लेकर घूमे। यहाँ कई पार्टियों को मिला कर मिला-जुला गठबंधन बन जाता है। यहाँ सनातन ही राज करता रहा है, जिसमें दक्षिणपंथी और वामपंथी मिश्रित नेतागिरी भी नहीं हिला पाई है। हमारे यहाँ सामान्य वर्ग के करदाताओं पर भारी बोझ है। और जनकल्याणकारी कार्यक्रमों में स्वास्थ्य-शिक्षा मुफ्त, और गर्भवती -बीमार-वृद्ध सेवाएँ सरकारी हैं।  इसलिए मै कहता हूँ सनातन धर्म की शिक्षा अनिवार्य है, पर भारत के विपक्ष का भेजा खाली हैं । विदेशों में  राजतंत्र है, पर राजा का अधिकार नहीं यहाँ लोकतंत्र है पर मोदी को सारे अधिकार है । हमारे यहाँ अब  यौन विषमता नहीं। आर्थिक विषमता नहीं केवल जातिय विषमता और आरक्षण का जहर है । सब औसत ही कमाते हैं, औसत ही जीते हैं। पर यह औसत जीवन का देश आज अधिकतर इन्डेक्स में सर्वोच्च जरूर  है लेकिन स्थिर है।
पंकज सीबी मिश्रा, राजनीतिक विश्लेषक एवं पत्रकार जौनपुर यूपी 

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