व्यंग्य : कहानी बनाने में माहिर है हमाये नेटा जी….

विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) का विरोध हास्यास्पद की जगह अब मजेदार और रोचक  होता जा रहा है। एसआईआर पर विपक्ष की आपत्ति को कुछ पल के लिए अलग रखें तो भी इस समूची प्रक्रिया में पूरे देश में अब तक बीएलओ की आफतो और उनके आपदाओ कि खबरों नें विपक्ष के लिए मसाला दें दिया है। यह राजनीति के लिए  सचमुच चिंता पैदा करने वाली हैं।  तृणमूल कांग्रेस के मुताबिक 34 बीएलओ की मौतें हो चुकी हैं। अब आंकड़ें जो भी हों, अगर एक भी बीएलओ की मौत इस वजह से होती है कि उस पर एसआईआर करवाने का दबाव था तो यह मानने से बाहर की बात है।  फर्जीवाडा कह कर यह अफवाह फैला देना कि चुनिंदा लोगों के नाम काटने के लिए उसे धमकाया जा रहा था, तो यह विपक्ष की प्रक्रियागत खामी की ओर इशारा करती है जो वह भाजपा के लोकप्रियता से डर रही ।
जिस पर तत्काल संज्ञान लेने की ज़रूरत है। गुजरात, उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश इन तमाम राज्यों में भाजपा सरकारें हैं जो पूरी तरह से एसआईआर के समर्थन में है, पर विपक्ष हड़बडाया हुआ है। कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, तृणमूल कांग्रेस सभी दल ऐसी मौतों का हवाला देकर अब चिंता जता रहे हैं। अभी गोंडा में ही एक मामला सामने आया है, जिसमें अपनी शादी से एक दिन पहले बीएलओ विपिन यादव ने आत्महत्या कर ली इसे कुछ लोग राजनीति के लिए एसआईआर  से जोड़ा। विपिन यादव के परिवार का कहना है कि एसडीएम और लेखपाल एसआईआर में ओबीसी वोटरों के नाम काटने का दबाव बना रहे थे जबकि ऐसा कुछ है नहीं। यदि ऐसा होता तो अब तक संविधान कि किताब लहरा गई होती, यें सब बाते उनके  मौत से पहले इसे सामने लाना था न ! अब आप किसी चालू टाईप के  नेता के कहने पर ऐसे बयान दें रहें यह दिवंगत विपिन यादव का अपमान है। न्यायपालिका से भी यही अपेक्षित है कि वह बीएलओ की अकाल मौतों का स्वतः संज्ञान ले।
अभी सुप्रीम कोर्ट में चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की बेंच एसआईआर की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई कर रही है। बुधवार को सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा, ‘आधार कार्ड एक कानून की रचना है। और वैध है। इस हद तक कि यह उस पर आधारित लाभों या विशेषाधिकारों को स्वीकार करता है। कोई भी इस पर विवाद नहीं कर सकता। लेकिन क्या आधार को मतदान के अधिकार से जोड़ा जा सकता है। उन्होंने यह भी पूछा कि क्या आधार रखने वाले घुसपैठियों को वोटिंग के अधिकार देना चाहिए। वैसे वोटरों  को चुनाव  से पहले यह पूछना चाहिए था कि उसे कितने घुसपैठिए नेता  मिले, उनके नाम वह बताएं। इसी तरह उन्हें बीएलओ की मौत पर भी नेंताओं सवाल करने चाहिए। 2003 में जो फर्जी  देशव्यापी एसआईआर हुआ था, वह प्रक्रिया 6 माह में पूरी हुई थी। तब न तो कहीं विरोध हुआ था और न ही कोई खुदकुशी सामने आई थी क्यूंकि सब सेटल किया गया था।
अभी चुनाव आयोग ने बीएलओ का मानदेय बढ़ाकर दो गुना कर दिया, यह कोई बात नहीं की  कम समय में ढेर सारा काम निपटाने का अमानवीय दबाव है।   क्या यह संभव है कि आपको ऐसा करने से मना किया जाय और  नौकरी से निकालने और पुलिस से उठवाने की धमकी दी जाय तो आप सुसाइड कर लेंगे कि लड़ेंगे संविधान कि किताब लेकर  !  परिवार का राजनीतिक प्रेरित आरोप है कि विपिन यादव से कहा गया था कि ओबीसी वोटरों के नाम काटो वरना नौकरी ख़त्म कर दी जायेगी जो कोरी बकवास है । इतना जल्दी कोई आत्महत्या नहीं करता, जिसके बाद विपिन यादव ने आत्महत्या कर ली। यह मामूली आरोप है और इसकी सत्यता सबको भनक रही । कांग्रेस ने इस पर लिखा भी है कि ज्ञानेश कुमार और नरेंद्र मोदी लोकतंत्र को खत्म करने पर लगे हैं और एसआईआर उसी का औजार है। वहीं नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने लिखा है कि ‘ओबीसी वोटरों के नाम काटो, वरना नौकरी चली जाएगी।’ दबाव, धमकी’ और नतीजा? आखिर में आत्महत्या। एसआईआर के नाम पर पिछड़े-दलित-वंचित-गरीब वोटरों को लिस्ट से हटाकर भाजपा अपनी मनमाफ़िक वोटर लिस्ट तैयार कर रही है। चुनाव आयोग लोकतंत्र की हत्या की ज़िम्मेदार है।
ममता बनर्जी ने भी चुनाव आयोग पर इस प्रक्रिया को लेकर सवाल उठाए हैं और उसे भाजपा के पक्ष में काम करने के लिए घेरा है। जिस पर भाजपा नेताओं ने कहा है कि ममता बनर्जी अपनी हार के बहाने बता रही हैं। इसी तरह अखिलेश यादव भी बीएलओ की मौतों पर मुआवजे की मांग कर रहे हैं और यह भी बता रहे हैं कि किस तरह इंडिया गठबंधन की जीती हुई सीटों पर वोट काटने की तैयारी हो रही है, तो भाजपा उनकी भी आलोचना कर रही है। यह प्रवृत्ति स्वस्थ लोकतंत्र की निशानी है। विपक्ष के पास अभी कम राज्य हैं, या भाजपा की तुलना में उसका जनाधार कम है, तो इससे उसका राजनैतिक महत्व कम नहीं हो जाता। याद रहे कि लोकसभा में भाजपा खुद के बूते बहुमत हासिल नहीं कर पाई, क्योंकि विपक्ष झूठ का एजेंडा फैला कर  भारी पड़ गया। अगर विपक्षी नेता किसी मुद्दे पर ध्यान भटका  रहे हैं तो सरकार का काम है कि उसे पूरी ईमानदारी से निबटाये । सरकार की तरह चुनाव आयोग की भी ज़िम्मेदारी है कि वह अपनी निष्पक्षता का यकीन सारे दलों को दिला पाए। फिलहाल लगता है कि चुनाव आयोग को विपक्ष के संदेहों से कोई फ़र्क नहीं पड़ता।
पंकज सीबी मिश्रा / राजनीतिक विश्लेषक एवं पत्रकार जौनपुर यूपी 

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