लोकतान्त्रिक मूल्यों की रक्षा के लिए आगे खड़ा है समाज

जिस सॉफ्ट जिहाद स्टाइल नैरेटिव के सहारे दशकों से हमारा सीने जगत कुछ पाकिस्तान हिमायती तत्वों के साथ मिलकर कश्मीर, सेना और राष्ट्रवाद को बदनाम करता आया, वह अब टिक नहीं पाएगा क्योंकि दर्शक को वैकल्पिक, तथ्यपरक और आक्रामक भारतीय दृष्टिकोण मिल चुका है। विक्रम, आदित्य‑यामी जैसे क्रिएटर्स ने साबित कर दिया कि बॉक्स ऑफिस पर सफलता पाने के लिए बॉलीवुड की इश्लामिक प्रेम की कॉपी नहीं, राष्ट्रवाद साहस और साफ‑साफ राष्ट्रवादी स्टैंड चाहिए; आर्टिकल 370 और कश्मीर फ़ाइल 2024 की बड़ी हिट साबित हुई और आगे की फिल्मों के लिए मिसाल बन गयी। अब लड़ाई केवल टिकट खिड़की की नहीं, भारत की वैचारिक स्वतंत्रता की है – और इस मोर्चे पर उर्दुवुड को वैचारिक दिवालिया घोषित करनें पर आमादा राष्ट्रवाद मैदान में है। आदित्य धार ने जो मूवी बनाई है उस पर फलस्तीन प्रेमी,  पाकिस्तान और गल्फ कंट्रीज ने बैन लगा दिया और पाकिस्तान परस्त बॉलीवुड के डाउड गैंग के पेट में मरोड़ें उठ रही हैं पर धुरंदर नें आतंकवाद और पोल खोल के रख दिया । ऋतिक और शबाना को धुरंधर में पाकिस्तान भारत राजनीति पसंद नहीं, जैसे सारी फिल्में इन जैसों की पसंद की मोहताज नहीं हैं यह दर्शकों नें साबित किया । आदित्य धार और यामी गौतम ने 370, हक़ और उरी द सर्जिकल जैसी फिल्में कर जो गदर मचाया वह उर्दू वालों को कतई रास नहीं आया।
पाकिस्तान ने पहले भी जम्मू‑कश्मीर से जुड़ी कड़ी नीतियों के बाद भारतीय फिल्मों पर बैन लगाकर अपना असली चेहरा दिखाया है, जबकि भारतीय फिल्म जगत का एक बड़ा वर्ग तब भी कारोबार के नुकसान पर विलाप करता दिखा। यह वही लॉबी है जो भारतीय सेना पर बनी फ़िल्मों को “प्रोपेगेंडा” कहती है लेकिन पकिस्तान के नैरेटिव को सपोर्ट करने वाली फिल्मों को प्रोग्रेसिव सिनेमा बताती है।आश्चर्य की बात है कि बॉलीवुड से आई एक फिल्म धुरंधर ने दुनिया को हिला दिया है । पाकिस्तान इस कदर हिल गया कि उसके बुद्धिजीवी वर्ग ने तो पीएम नरेंद्र मोदी को धुरंधर फिल्म का स्क्रिप्ट रायटर , कहानीकार और यहाँ तक कि डायरेक्टर बता दिया । पाकिस्तान द्वारा फैलाई इस्लामिक ब्रदरहुड के चलते सभी छह अरब देशों ने फिल्म को बैन कर दिया ? जिन अन्य इस्लामिक देशों में फिल्में देखी जाती हैं उनसे भी पाकिस्तान ने धुरंधर का प्रदर्शन न करने की अपील की है । भारत , यूरोप और अमेरिका में धुरंधर धुंआधार चल रही है । देखना होगा कि पाकिस्तान की तड़फ का असर भारत के कुछ खास इलाकों पर कितना पड़ता है ? फिलहाल इंडियन थिएटर्स में धुरंधर ब्लॉकबस्टर फ़िल्म साबित हो रही है। इसमें कोई शक नहीं कि पाकिस्तान विश्वभर में फैलाए गए इस्लामिक आतंकवाद की जननी बन गया है ।  पाकिस्तान के नापाक इरादों को उसके नाम से बेपर्दा करने वाली यह पहली फिल्म है जिसने 100% सच्चाई बयान कर पाकिस्तान को पूर्णतः नंगा कर दिया है । धुरंधर फिल्म में आईएसआई की सच्चाई देख लोग हमेशा ही इस्लामिक विचार से भागते दिखे हैं । याद कीजिए कुछ समय पहले दी कश्मीर फाइल्स और दी केरला स्टोरीज नाम से दो सच्ची फिल्में आई थी ।
इन फिल्मों ने चूंकि इस्लाम के नाम पर की जा रही अत्याचार की सच्चाई को बेनकाब किया अतः अरब देशों ने इस्लामिक ब्रदरहुड के नाम पर उन्हें भी प्रतिबंधित किया । उरी फिल्म पर भी प्रतिबंध लगा । खुद हमारे देश में ही इंडी शासित राज्यों में बंगाल की हकीकत दिखाने वाली बंगाल फाइल्स पर प्रतिबंध लगा । अन्य फिल्में भी कुछ राज्यों ने राजनीतिक कारणों से प्रदर्शित नहीं की । इंदिरा गांधी के जीवन से साम्य रखने वाली प्रसिद्ध फिल्म आंधी का प्रदर्शन इंदिरा सरकार ने रुकवा दिया । प्रख्यात शायर साहिर की प्यासा फिल्म में आई प्रसिद्ध नज़्म ” वो सुबह कभी तो आएगी ” आकाशवाणी पर नहीं बजने दी गई । संजय गांधी के कार्यक्रम में गाने से मना किया तो विख्यात गायक किशोर कुमार के गीत बरसों आकाशवाणी पर नहीं  बज पाए ? आज वन्देमातरम ना गाने को लेकर विपक्ष लामबंद  है , ऐसा भी होता है । सत्ताएं भले कितनी ताकतवर दिखाई दें , सच्चाई के प्रदर्शन से वे कायरों की तरह डरती हैं । आश्चर्य की बात है पिछले कार्यकाल में आधिकारिक मंच से  पहली बार इस्लामिक आतंकवाद  शब्दों को उच्चारित करने वाले राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प अब खुद आतंकवाद को गले लगा रहे हैं । भारत के बजाय आसिम मुनीर और शाहबाज उन्हें ज्यादा प्रिय लगने लगे पर ऑस्ट्रेलिया में दो पाकिस्तानीयों द्वारा भीषण गोलिबारी नें आतंकवाद के चेहरे से फिर नकाब हटा दिया है। इस मामले में पुतिन लाज़वाब हैं । तुर्केमेनिस्तान में मिलने आए शाहबाज शरीफ को पुतिन ने 40 मिनट बैठाए रखा और फिर भी मिले नहीं । आतंकवाद का सच्चा और लगातार दर्द जिन्होंने झेला है वे भारत और इजरायल ही हैं ।
आज आर्टिकल 370 और उरी जैसी फ़िल्में उनकी वैचारिक दुकान पर सीधा ताला लगा रही हैं, इसलिए ट्रोल आर्टिकल, बहिष्कार की कॉल और व्हाट्सऐप यूनिवर्सिटी वाले आरोपों की बौछार शुरू हो चुकी है। यह वही दंपति है जिन्होंने उर्दूवुड की पूरी “कहानी” निगल ली है और अब उसी के भीतर से उसकी सड़ी हुई बदबू बाहर निकाल रहे हैं। पाकिस्तान-परस्त नैरेटिव पर पलने‑वाले फिल्मी भाँडों को पहली बार असली वैचारिक चुनौती मिली है, इसलिए उनकी भीतरी डकारें घबराहट में बाहर आ रही हैं। आदित्य धार का असली अपराध यह है कि उन्होंने सेना, राष्ट्रवाद और प्रतिरोध को ग्लैमराइज़ नहीं, बल्कि ईमानदारी से दिखा दिया। 2019 की फिल्म “उरी : द सर्जिकल स्ट्राइक” ने आतंकवाद के अड्डों पर भारतीय सेना की सर्जिकल स्ट्राइक को ऐसे तेवर के साथ परदे पर उतारा कि पूरी “अमन की आशा” लॉबी की नींद हराम हो गयी। आज वही व्यक्ति “आर्टिकल 370” जैसे राजनीतिक एक्शन थ्रिलर का लेखक‑निर्माता बनता है, जो जम्मू‑कश्मीर से अलगाववादी विशेष दर्ज़े की विदाई को राष्ट्रहित की निर्णायक विजय के रूप में स्थापित करता है। उर्दुवुड गैंग को सबसे बड़ा डर यही है कि आम दर्शक अब उनके धुले‑धुलाए “दोनों देशों के बीच मोहब्बत” वाले एजेंडे के पार जाकर भारत के फैसलों को समझने लगे हैं।  यह वही बॉलीवुड है जहाँ आज तक कश्मीर की कहानी में आतंकी “भटके हुए नौजवान”, सेनाएँ “दमनकारी” और पाकिस्तान “बेचारा पड़ोसी” दिखाया जाता रहा; वहाँ यामी का किरदार सीधे‑सीधे आतंक‑समर्थन की जड़ पर वार करता है। यामी‑आदित्य की जोड़ी ने “उरी”, “आर्टिकल 370” और आने वाली परियोजनाओं के जरिए यह साफ संदेश दिया है कि वे करियर की कीमत पर भी राष्ट्रहित के पक्ष में खड़े रहेंगे।
पंकज सीबी मिश्रा, राजनीतिक विश्लेषक एवं पत्रकार
जौनपुर, यूपी 

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