पुराने साल के बीतने और नए साल के आने के दरम्यान मध्यप्रदेश से एक बुरी ख़बर आई की सवर्णों के मुखर आवाज़ एडवोकेट अनिल मिश्रा को एसीएसटी एक्ट में गिरफ्तार करवा दिया गया जिस पर मध्य प्रदेश भाजपा के विरुद्ध सवर्ण समाज लामबंद हो रहा। दूसरी बुरी खबर यह कि देश के स्वच्छतम शहरों में शुमार राज्य की आर्थिक राजधानी इंदौर मोहन यादव के नेतृत्व में तबाह हो रही। जहाँ प्रदुषण अपने उच्चतम स्तर के पार और सूत्रों के मुताबिक भागीरथपुरा क्षेत्र में दूषित पानी की वजह से फैले संक्रमण ने गंभीर रूप ले लिया है। सूत्रों के मुताबिक मुख्य जल आपूर्ति लाइन में लीकेज के कारण सीवरेज का पानी मिलने से सैकड़ों लोग उल्टी-दस्त के शिकार हो गए हैं। कम से कम 13 लोगों की तो जान ही जा चुकी है और कई अब भी अस्पताल में भर्ती हैं। मध्यप्रदेश में लगातार भाजपा का शासन बना हुआ है जो अब वहां के लोगो के लिए आफत बनता नजर आ रहा।
इंदौर के सभी 9 विधायक भाजपा से हैं, सांसद भी भाजपा के हैं, महापौर भी भाजपा के हैं और सबसे बढ़कर शहरी विकास मंत्री कैलाश विजयवर्गीय भी भाजपा से है और अब भाजपा के जनप्रतिनिधि, मीडिया को सवाल पूछने पर भड़क रहें। सवाल पूछने वाले पत्रकार से बदसलूकी कर कैलाश विजयवर्गीय घिरते दिखे। अब मध्य प्रदेश भाजपा की किरकिरी हो रही है। इन सबका दोष अब सीएम मोहन यादव के मत्थे है जिन पर ब्राह्मण विरोधी होने का आरोप लगता रहा है ऐसे में भाजपा अब पीडीए के चक्रव्यूह में घिरती नजर आ रही और यह चक्रव्यूह अखिलेश यादव वाले पीडीए का नहीं अपितु पी फॉर पत्रकार, डी फॉर देवता अर्थात ब्राह्मण और ए फॉर एडवोकेट अनिल मिश्रा का है ।
मामला यह है कि पहले यूपी के नव निर्मित प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी नें ब्राह्मण विधायकों को लेकर रायता फैलाया और अब कैलाश विजयवर्गीय नें एनडीटीवी के पत्रकार अनुराग द्वारी द्वारा दूषित जल प्रकरण पर किए गए सवाल पर झल्लाते हुए कहा कि ‘फोकट के प्रश्न मत पूछो। अनुराग इस पर भी नहीं रुके और उन्होंने प्रतिवाद किया, साथ ही कहा कि ‘मैं वहां होकर आया हूं’, तो विजयवर्गीय ने कहा कि ‘क्या घंटा होकर आये हो। इस निम्नस्तरीय भाषा पर अनुराग द्वारी ने कैलाश विजयवर्गीय को सीधे-सीधे भाषा की तमीज़ का पाठ पढ़ा दिया और कहा कि वो अपना काम कर रहे हैं। मोदी-शाह के युग की कई गैर सवर्ण भाजपा नेताओं को यह खुशफ़हमी है कि वो सवर्ण विरोध करेंगे और उनसे सवाल नहीं किया जा सकता, या उनकी सरकार की खामियों पर टोका नहीं जा सकता। इससे पहले पूर्व सांसद स्मृति ईरानी ने अमेठी में एक पत्रकार को डपटते हुए कहा था कि मैं आपके मालिक से बात करूंगी। ये सीधे-सीधे पत्रकार को धमकी ही थी और इसमें जितनी ग़लती नेता की है, उतनी ही ग़लती उन मीडिया मालिकान की भी है, जो सत्ता से नजदीकी बढ़ाकर अपने लिए वित्तीय, सियासी या अन्य किस्मों के लाभ लेते हैं और बदले में आदर्शों को गिरवी रख देते हैं।
प.बंगाल में केन्द्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने भी एक पत्रकार से कहा कि तुम बंगाल की चिंता करो, हमारी पार्टी की चिंता मत करो। जबकि उन पत्रकार ने केवल यही पूछा था कि 75 साल में मार्गदर्शक मंडल में भेजने का नियम अभी के नेताओं पर भी लागू होगा। उस पत्रकार ने इशारों में नरेन्द्र मोदी के रिटायरमेंट की बात छेड़ी थी, जिस पर अमित शाह बिफर पड़े। आजकल ब्राह्मणो का विरोध फेमस होने का एक मशहूर शगल बना हुआ है। पहली बात तो यह कि अपने ही शहर और क्षेत्र में काम ना करने और मोदी के नाम पर क़ाम गिनाने की बात सबको रट गई है। दूसरा यह कि कफ़ सिरप कांड में भी कई नेता फँसते दिख रहें जिनपर कार्यवाही नहीं हो रही। मासूमों की मौत हो गई और तब भी सरकार की तरफ से अफ़सोस और मुआवजे से आगे बात नहीं बढ़ पाती। मुखर बात यह कि भीम आर्मी, दलित आर्मी इत्यादि के नाम पर खुले आम वैमनस्य्ता फैलाई जा रही।
माहौल बिगाड़ने की लगातार कोशिस हो रही जिसपर न्याय तंत्र और भाजपा चुप है जबकि ग़लत शब्द निकलने भर से गोली चल जाना आजकल आम बात हो गई है। किसी प्रकरण पर खेद प्रकट करना सरल है पर उसका हल ढूढ़ निराकरण करना सरकार की प्राथमिकता नहीं। यह तो ठीक है कि कैलाश विजयवर्गीय या अमित शाह या अन्य भाजपा नेता इस बात की गारंटी दे सकते हैं कि आईंदा किसी पत्रकार के सवाल पर बदसलूकी नहीं होगी किसी ब्राह्मण के साथ अन्याय नहीं होगा, किसी सवर्ण का अधिकार नहीं छिना जायेगा पर धरातल पर विपक्ष इस मौके को लपक कर अपनी राजनीति कर लेगा और आने वाले समय में यही सब मुद्दा भाजपा के गले की हड्डी बनेगा।

पंकज सीबी मिश्रा, राजनीतिक विश्लेषक एवं पत्रकार जौनपुर, यूपी
