
पंकज सीबी मिश्रा, राजनीतिक विश्लेषक एवं पत्रकार जौनपुर
हाँ ! तो अब गिरोह की क्रोनोलॉजी समझिए और बांट दीजिए समाज को मोटे तौर पर। हिन्दुओं को आरक्षण के नाम पर, मुश्लिमों को आरएसएस के नाम पर और आदिवासियों को पिछड़े के नाम पर फिर उनका नेता बन वोट की राजनीति कीजिये। मतलब कुछ दलित चाहे बड़ी बड़ी कोठियां बंगले बना ले , लाखों करोड़ों के कारोबार कर ले , पढ़ लिखकर मोटे मोटे पैकेज ले ले , वह दलित बने रहेंगे , उनके बच्चे अखिलेश यादव की तरह विदेश में पढ़े पर आरक्षण के दायरे में ही रहेंगे ? तो ऐसे आएगी समानता और समरसता ? क्रीमी लेयर का मुद्दा तीन दशकों से उठता आ रहा है । अब सर्वोच्च अदालत के आदेश के बाद रास्ता खुला तो राजनीति आड़े आ गई । वोट सबको चाहिएं , बीजेपी को भी तो वो क्यों पीछे हटेगी राजनीति से । चुनाव लड़ने के लिए आरक्षण, नौकरी के लिए आरक्षण, पढ़ने के लिए आरक्षण, योजना का लाभ लेने के लिए आरक्षण हर चीज में आरक्षण घुस चुका है और इतने पर भी यादि सामाजिक स्थिति में सुधार नही हो रहा तो बिल्कुल कृमीलेयर मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट सही है कि मलाई खा चुके आरक्षणधारी लोगो को अपने समाज के गरीब लोगो के लिए आरक्षण का त्याग कर देना चाहिए पर विडंबना देखिए कि जिनके हित के लिए कोर्ट नें फैसला दिया उन्ही को बड़े चालाकी से सड़को पर उतार कर भारत बंद के लिए उकसवा दिया गया। गजब का गिरोह है ! जब समाज गिरोहों में बटा होता है तब योग्यता नकार दी जाती है। आज यह यथार्थ है कि समाज नहीं बचा हुआ है गिरोह बचे हुए हैं। कोई गिरोह जाति का है, कोई गिरोह क्षेत्र का है तो कोई गिरोह विचारधारा के नाम पर है, जबकि यथार्थ यह है कि उसमें अधिकांश लोगों में न कोई विचार है और न ही कोई धारा है। कहीं जातियों के नाम पर भयादोहन हो रहा है, तो कहीं क्षेत्र के नाम पर और कहीं विचारधारा, दल और संगठन के नाम पर। राहुल गांधी , लालू यादव , मायावती और अखिलेश कि अपनी थ्योरी ! बांग्लादेश में बर्बर हिन्दू उत्पीड़न के खिलाफ एससी एसटी , ओबीसी या मुस्लिम कोई संगठन प्रदर्शन करने नहीं आया । अब सुप्रीमकोर्ट के क्रीमी लेयर को अलग करने के आदेश के खिलाफ सभी राजनैतिक दलों के दलित एक साथ बाहर निकल आए ? कहते हैं कि 77 सालों में जो दलित करोड़पति हो गए हैं , उन्हें भी आरक्षण का लाभ पूर्व की भांति मिलता रहे । मतलब वे कह रहे हैं कि आरक्षण उनका जन्मसिद्ध अधिकार है । क्रीमी लेयर को किसी भी सूरत में दलित कोटे से अलग नहीं किया जा सकता । दलितों के कईं संगठनों ने बंद का आयोजन किया जो बहुत सफल नहीं रहा । अनुसूचित जातियों के तमाम सांसद और विधायक मोदी सरकार से मांग कर रहे हैं कि सुप्रीमकोर्ट के आदेश के खिलाफ अध्यादेश लाया जाए और संसद में लाकर क्रीमी लेयर को भी पूर्व की भांति आरक्षण यथावत जारी रखा जाए । याद रहे कि ऐसा ही एक अध्यादेश तब भी लाया गया था जब सुप्रीमकोर्ट ने एससी एसटी कानून के अंतर्गत गिरफ्तारी से पूर्व पुलिस जांच का आदेश दिया था । वैसे संविधान सभा के अध्यक्ष डाक्टर राजेंद्र प्रसाद ने भी कहा था कि आरक्षण कब तक रहेगा उसकी अवधि नियत की जानी चाहिए । लेकिन पहले नेहरू और फिर उनकी बेटी इंदिरा ने इसे जारी रखा । उससे भी बढ़कर मंडल आयोग का गठन कर दिया , जिसकी राय कभी नहीं मानी । मंडल आखिर वीपी सिंह के काम आया जिन्होंने पूरे का पूरा बेड़ा ही ग़र्क कर दिया । तो चलने दीजिए आरक्षण का यह खेल । अभी जातियों को और तोड़िए राहुल गांधी ? एक दिन ये 17.5% अनुसूचित जातियां और 27% ओबीसी ही तुम्हें भी बताएंगे कि संख्या भारी हिस्सेदारी का असली तमाशा क्या है । राहुल गांधी के सिर सेहरा बंधेगा कि उन्होंने आर्यसमाज और संघ के सरनेम विहीन समाज के सिद्धांतों को कैसे ध्वस्त किया । ठीक है , सुप्रीमकोर्ट के क्रीमी लेयर हटाने संबंधी आदेश की धज्जियां उड़ाइए , आदेश को शौक से पलीता लगाइए । बांटिए समाज , बनाइए जातियां , दीजिए आरक्षण पर आरक्षण , आरक्षण में भी आरक्षण ? प्रतीक्षा कीजिए उस दिन की जब जाति जाति करने वालों को जनता ही सही तरीके से बताएगी कि उसकी हैसियत क्या है ? कोई कह रहा है अल्पसंख्यकों की चिन्ता होनी चाहिए, कोई कह रहा है जातियों की चिन्ता होनी चाहिए, तो कोई कह रहा है हमारे संगठन के कार्यकर्ताओं की चिन्ता होनी चाहिए और इस हर चिन्ता से एक अनियमितता उत्पन्न हो रही है, क्योंकि मनुष्य और उसकी योग्यता की चिन्ता पर ये सभी चिन्ताएं भारी पड़ रही हैं। ऐसी स्थिति मे योग्यता तो निरीह होकर केवल मूक है।
