वोट अधिकार यात्रा : चोर मचाए शोर वाली कहावत..!

लोग अक्सर कहते थे कि, यह आदमी लाल किले की प्राचीर से बोलने लायक नहीं है ! इसमें वह करेंट नहीं जो इनके बाप में थी और गंभीरता तो बिल्कुल नहीं है,  जिसकी अपेक्षा की जाती है  ! इनकी  भाषा चुनावी टोन से आगे नहीं जा पाती  ! कोसना , कलपना चारित्रिक गुणों की तरह व्यक्तित्व में समाये हुए है। मै उन भाग्यशाली लोगों में शामिल हु जिसने इनका एक भी भाषण लाईव नहीं सुना , न ही कभी बकवास सुनने में समय जाया करने की इक्षा है । सोशल मीडिया पर चर्चा है कि इन्होने आज देश को वोट चोरी के खुलासे  की यंत्रणा दी , काफी उबाऊ , थकाऊ टाइप का अभियान भी चलाएंगे पैदल यात्रा के रूप में , जिसका अंडर  करंट दिमाग में चल रही चुनावी खब्त ( बिहार और फिर यूपी  ) को दर्शा रहा । देश इनसे कांग्रेस का  नाम सुनना चाहता , चाइना का नाम सुनना चाहता है  , वोट चोरी पर स्पस्टीकरण चाहता था लेकिन ये मियां मोदी से आगे नहीं निकल पाए। शिक्षा , रोजगार , स्वास्थ पर सरकार को कोसना वैसे भी कभी इनकी प्राथमिकता में नहीं रहे, बिहार में भी नदारद !
हाँ बासी कड़ी में उबाल देने के लिए संघ को कोसना और तिरंगे का सम्मान ना करना ये  इनडायरेक्टली बताते है कि इनके पूर्वज मुस्लिम भी थे। इल्जाम  बेअसर हो रहे है ! फेक्ट चेकर इनका मुंह खुलते ही सक्रिय हो रहे है , लगभग हर दांव उल्टा पड़ रहा है -शास्त्रों में इसे सम्पूर्ण अंत की शुरुआत भी कहा जाता है ! सूत्रों से खबर है कि यही  प्रतिपक्ष नेता राहुल गांधी अपने इंडिया के साथियों के साथ सासाराम जिले के रोहतास से पटना तक सोलह दिनों में लगभग 1300 किमी की पदयात्रा के माध्यम से वोटर के वोट चोरी के ख़िलाफ़ 17अगस्त से शुरू आत करने जा रहे हैं। यह प्रयास अपने आपको दूध का धुला बताने का है ।  एनडीए अपने उपराष्ट्रपति पद के उम्मीदवार महाराष्ट्र के राज्यपाल सी पी राधाकृष्णन की घोषणा कर चुकि है । इसकी गंभीरता हम समझ सकते हैं। वोटर अधिकार यात्रा को बिहार में समर्थन के नाम पर वही पुरानी चापलूसी  मिला है वह इंगित कर रहा है कि बिहार एक बार फिर जनक्रांति के नाम पर ठगे जाने वाला है। विदित हो यह 16 दिवसीय पदयात्रा तकरीबन 23 जिलों से गुजरेगी तथा एक सितम्बर को पटना के गांधी मैदान में समाप्त होगी।
बिहार में सूत्रों कि माने तो कहा जा रहा है चुनाव आयोग ने जिस तरह नकेल कस दी है उसमें प्रतिपक्ष नेता बौखला गए है और आम जनता के बीच  पहुंच वोट चोरी की झूठी शिकायतों और  झूठा प्रचार,  बेबुनियादी राजनीति को केवल चुनावी स्टंट बताया गया। चोरी और सीनाजोरी वाले इस रवैए ने विपक्ष में चुनाव आयोग की कटु आलोचना को बढ़ावा दिया है। सबसे बड़ा मज़ाक तो यह किया गया कि देश की बहू, बेटियों, मां-बहनों के सीसीटीवी फुटेज दिखाने की मांग की गई  है।  अखबारों में और टीवी में वे दिखाया जा रहा है जो सच है लेकिन साथ हुए लोकतंत्र की हत्या और वोट चोरी के फर्जी इल्जाम आप यू नहीं देख सकते। अजी कब तक पर्दे में रहस्य रखोगे। पीएम मोदी को अनाप शनाप  भाषा बोलोगो। शर्म करो,यह सफाई नहीं अपने देश की  सरकार की तौहीन है। सुप्रीम कोर्ट को क्या 65लाख लोगों की सूची भेज उसे सार्वजनिक भी तो कर दिया। कब तक झूठ का दामन पकड़े रहोगे। देश जाग रहा है संभावना है कहीं आप और गर्त में ना चलें जाए। यह पहली बार हुआ है जब चुनाव आयोग जनता के आरोप वोट चोरी की जांच को  उठाते हुए प्रेस कॉन्फ्रेंस को अपने सीधे सच्चे आचरण के बारे में बता राहुल की पोल खोल गया।
जबकि यह भली-भांति ज़ाहिर है कि राहुल  पूर्व वित्तमंत्री पी चीदंबराम की खोज है। जब आप चुनाव आयोग पर आरोप लगते हैं तो आपकी राजनीति दो टके की हो जाती है। आपके वे साथी टूट पड़ते झूठे आरोप लगाने। यह तो वे ही करते हैं जिन्हें पोल खुलने का ख़तरा रहता है। उसकी निष्पक्षता के क्या कहने जो मोदी के भाषणों की समाप्ति के बाद जनता को गाली बकना शुरू कर दें। लोकतंत्र ही चुनाव की घोषणा करता है। चुनाव आयोग और सरकार मिलकर चुनाव प्रक्रिया पूर्ण करते है । हमारे वोट के अधिकार की चोरी और उसको  छुपाने का प्रयास कभी कोई नहीं कर सकता है फिर इल्जाम क्या !  लेकिन अब कांग्रेस के ख़िलाफ़ जन्मा आंदोलन रुकने वाला नहीं। जनता जनार्दन को चाहिए सबसे पहले वह ईवीएम का  विरोध करने वालों को हर उस स्टेट से हटवाए जहाँ वो देश विरोधी गतिविधि कर रहे। दूसरा चुनाव आयोग के कार्यों में नेताओ के हस्तक्षेप को बंद कराये।  जागो,वरना लोकतंत्र के हत्यारे आपसे यात्रा करवाकर आपका लोकप्रिय नेता चुनने का अधिकार भी धीरे-धीरे ज़मींदोज़ कर देंगे। जनता की शक्ति बनी रहे। इसलिए न्याय पाने लड़ें बिना लड़े कुछ हासिल नहीं होगा। खासकर जब क्रूर और असंवेदनशील विपक्ष  के साए में हम सब हों।
दरअसल ये शब्द हाल ही में नया चलन में आया है। मामला कुछ यूँ समझिये कि विपक्ष को जब ये महसूस हुआ कि चुनाव में हार रहे है तो उन्होंने चुनाव आयोग से कुछ दस्तावेज मुहैया करवाने का अनुरोध किया जो लोकतंत्र की अवमानना है। उधर चुनाव आयोग जिसे कुछ लोग चूना आयोग तो कुछ लोग केंचुआ भी कहते हुए नजर आते हैं, ये वो लोग है जो संविधान की लाल किताब लहराते है। और अंततः विपक्ष की ओर से नेता प्रतिपक्ष राहुल गाँधी और आते ही पहली ही गेंद को लंबा बाउंसर वो भी वाइड बॉल फ़ेंकी,  इस ताबड़तोड़ बौलिंग को देखकर जनता सकते में आ गई, उसे उम्मीद नहीं थी कि विपक्ष इतनी जल्दी ऐसा बॉउंसर ले आएगा। जब विपक्ष ने उन कागजों को नहीं दिखाया जो चुनाव आयोग ने दिए थे लोग सवाल पूछने लगे कि कही चोर मचाए शोर वाली बात तो नहीं।
फिर शुरू हुआ फर्जी हवा चलाने कि कोशिस कि कोई आदित्य श्रीवास्तव चार राज्यों में वोट डाल रहा है तो कहीं एक मकान में 80 लोग रह रहे हैं, तो कहीं एक  लाख से अधिक फर्जी वोट पाए गए, तो कहीं ऐसे मकान और एड्रेस थे जो वास्तव में कहीं थे ही नहीं।  विपक्ष ने मांग की कि उन्हें डिजिटल डेटा दिया जाए, मगर चुनाव आयोग जानता था कि ऐसा करने पर पारदर्शिता ख़त्म हो जाएगी। लिहाजा डिजिटल डेटा देने के बजाय जो उपलब्ध था वो भी वेबसाइट से हटा दिया गया। और राहुल गाँधी को ही कह दिया कि आप शपथ पत्र दीजिये। अब राहुल सकते में है। संविधान ने भारत में भारतीय नागरिकों को व्यस्क मताधिकार का अधिकार दिया है। जिसकी उम्र 18 वर्ष या अधिक है उसे बिना जाति, धर्म, लिंग का भेद किए, चुनाव का अधिकार होगा। लेकिन वही अधिकार अब सड़को पर नीलाम  होने लगे तो लोकतंत्र और संविधान के क्या मायने रह जाएंगे। हालांकि इस गंभीर मुद्दे पर मीडिया को राहुल  से सफाई मांगनी चाहिए थी, लेकिन मीडिया का कहना है कि वे राहुल को गंभीरता से नहीं लेते और  सवाल करने का कार्य फिलहाल  छोड़ चुके हैं अब एक बार छोड़ा गया कार्य वापस पकड़ना मुश्किल है।
पंकज सीबी मिश्रा/राजनीतिक विश्लेषक एवं पत्रकार, जौनपुर यूपी 

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