शिक्षा का महत्व 

विनोद कुमार यादव स०अ० (व्यायाम शिक्षक) राजकीय इंटर कॉलेज चुन्नीगंज कनपुर नगर
शिक्षा समाजकीआधारशिला है। जिस देश के नागरिक शिक्षित होते है वह देश मजबूत होता है। प्राचीन शिक्षा प्रणाली नैतिक मूल्यों से ओत-प्रोत थी। आज देखने में शिक्षा के स्तरों में बहुत बडी प्रगति हुयी है। लेकिन क्या वास्तव में शिक्षा का स्तर बढा है मेरे विचार से शिक्षा के वैज्ञानिक स्तर में सो वृद्धि हुयी है। लेकिन शिक्षा के नैतिक स्तर में गिरावट आयी है। शिक्षा का सही स्तर चरित्र निर्माण है, लेकिन क्या हमारे देश में नौनिहालों में चरित्र निर्माण हो रहा है? बल्कि चरित्र निर्माण में दिन प्रतिदिन गिरावट आती जा रही है क्या शिक्षा का अर्थ यही है कि पढ़ लिखकर हम रोजगार हासिल करें और अधिक से अधिक धन के नैतिक मूल्य भूल जायें। आज हमारे देश में न जाने कितने नव युवक अच्छी शिक्षा ग्रहण करके उच्च पदों पर आसीन होकर भ्रष्टाचार की सारी हदो को पार करते देखे गए हैं कितना अवैध धन एकत्र कर लेते हैं और अपने नैतिक कर्तव्य भूल जाते है। इसी प्रकार राजनीति के पुरोधा जब राजनीति में प्रवेश करते हैं तो अत्यधिक ईमानदारी का परिचय देते हुए महानता का बखान करते हुए नहीं थकते हैं, लेकिन राजनीति के क्षेत्र मे उपलब्धि हासिल होते ही नैतिकता को ताक पर रखकर समाज के प्रति अपने को भूल जाते हैं और राजनीति रूपी पवित्र नदी को एक भ्रष्टाचार रूपी गन्द देते तथा उसी में गोता लगाने लगते हैं।आज इन्जीनियर, वैज्ञानिक डाक्टर अर्थशास्त्री, व्यापारी ठेकेदार या राजनेता बनने हमारी युवा पीढ़ी सारी ताकत झोक देती है। लेकिन यह ओहदे हासिल करने के बाद भी क्या अपना दायित्व को निभाते इन पदों का सदुपयोग किया जाता है क्या हमने कभी सोचा है कि. इसके पीछे क्या कारण है? कारण स्पष्ट है अच्छे संस्कारों की कमी अच्छे संस्कारों का संत माता पिता समाज और शिक्षा है अच्छे संस्कार जीवन रूपी मिशन को लाने के लिये गेल का कार्य करते हैं अच्छे संस्कारों से नैतिक मूल्यों का निर्माण होता है और नैतिक मूल्यों से अच्छे समाज का निर्माण होता है।नैतिक मूल्य एक दिन में प्राप्त होने वाली वस्तु नहीं है।  हम विद्यालयों सडकों, मुहल्लों या अन्य स्थानों को अपनी सम्पति समझते हैं आज एक विचारिणी प्रश्न है कि यदि हम अपनी उपलब्धि हासिल कर लेते है तो हमें जीवन की इन भौतिक आवश्यकताओ शिक्षा स्वास्थ्य मकान एवं अन्य आवश्यकताओं को पूरा करने के लिये शायद पर्याप्त धन मिल जाता। लेकिन इसके बाद भी ये काफी नहीं होता है और हम अत्यधिक धन एकत्र करने लगते है अर्थशास्त्र मे हम पढ़ते हैं कि धन का एक जगहकेन्द्रीकरण हो जाता है तो विकास अवरुथ हो जाता है तथा जब धन विकेन्द्रीकरण हो जाता है तो विकास होने लगता है।आज ज्वलन्त प्रश्न है कि आखिर सुधार कैसे होगा, उत्तर स्पष्ट है किनैतिकता के गिरते हुए स्तर एवं भ्रष्टाचार के बढ़ते हुए स्तर को रोकना होगा आज हर व्यक्तिउपदेश दे रहा है कि चारो ओर भ्रष्टाचार व्याप्त है लेकिन स्वयं सुधार का कोई प्रयास ही नहीं के है। अपने पूर्वजों पर बलिदान होने वाले शहीदों से शिक्षा लेनी होगी।हमारी युवा पीढ़ी को यह भी सोचना होगा कि सरदार भगत सिंह सरदार वल्लभ भाई पटेल, सन्त रविदास आदि व्यक्ति महान थे. पर धनवान नहीं थे.  विचार , चिन्तन मनन करना होगा कि हमे नैतिकता से विमुख नही होना चाहिए। यदि हम अतीत में जायें तो हमारी परतन्त्रता का कारण हमारे नैतिक मूल्यों की गिरावट थी। जब किसी समाज में नैतिक मूल्यों का पतन हो जाता है तो वह समाज कमजोर हो जाता है, और समाज कमजोर होने से देश कमजोर हो जाता है। तब विदेशी ताकते उस देश के समाज और संस्कृति पर कब्जा कर लेती हैविनोद कुमार सहायक अध्यापक व्याम राज्यकीय इंटरकालेज कानपुर नगर के रहने वाले ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि हमें इस बात का ध्यान रखना होगा, कि जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में आगे बढ़ते हुए नैतिकता रूपी पवित्र हथियार हमें साथ रखना होगा नेतिकता रूपी अस्त्र, जीवन रूपी पथ पर आगे बढ़ने में हमारी रक्षा करेगा।

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