भावनानी के भाव – खुशी की गरीबी भी अमीरी से नहीं है कम

लेखक, चिंतक, कवि – एडवोकेट किशन सनमुख़दास भावनानी गोंदिया महाराष्ट्र
आओ खुशी से जीने की आस कायम रखें हम
जिंदगी को खुशियों से जिए हम
हर हाल में खुश रहने की आदत डालें हम
खुशी की गरीबी भी अमीरी से नहीं है कम
जिस पल हमारी मृत्यु होती है
हमारी पहचान बॉडी बन जाती है
हमारे अपने भी बाडी लेकर आए क्या
ऐसे शब्दों में पुकारते हैं
जिन्हें प्रभावित करने हमने पूरी
जिंदगी खर्च कर दी होती है
वह भी हमें बॉडी के नाम से पुकारते हैं
बाडी कहां है घरवालों से पूछते हैं
इसलिए हम याद रखें हरदम खुश रहें
क्योंकि मृत्यु जिंदगी का सबसे बड़ा लॉस नहीं है
क्यों जिंदा होकर भी हमारे मन में
जीने की आस खत्म हो चुकी है
जो पल जिंदगी के हमें हैं उसमें खुशी
से जीने को जिंदगी कहते हैं
हर पल का इंजॉय कर ख़ुश रहें हम
मृत्यु के पल में बॉडी पहचान बन जाएंगे हम

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