भावनानी के भाव – परिवार से बड़ा सृष्टि में कोई लोक नहीं

लेखक – चिंतक कवि एडवोकेट किशन सनमुख़दास भावनानी गोंदिया महाराष्ट्र
परिवार से बड़ा सृष्टि में कोई लोक नहीं
बहन से बड़ा कोई शुभचिंतक नहीं
माता पिता से बड़ा सृष्टि में कोई अपना नहीं
प्रथम गुरु हैं माता पिता से बड़ा कोई नहीं
बड़े बुजुर्गों से बड़ा कोई धन नहीं
पिता से बड़ा कोई सलाहकार नहीं
मां के आंचल से बड़ी कोई दुनिया नहीं
भाई से बड़ा कोई भागीदार नहीं
करो दिल से सजदा इबादत बनेगी
बड़े बुजुर्गों की सेवा अमानत बनेगी
खुलेगा जब तुम्हारे गुनाहों का खाता
बड़े बुजुर्गों की सेवा जमानत बनेगी
कहने को परिवार घर दीवार छत है परंतु
यह खुशियों का अनमोल खजाना बताते हैं
बड़े बुजुर्गों वृक्ष हम शाखाएं हैं यह बताते हैं
यह सब को सुख सुविधा आरािवार है फूलों की माला
परिवार है फूलों की माला यह सिखाते हैं
इस माला के हम सब फूल यह बताते हैं
प्रेम सद्भाव से रहना सिखाते हैं
भारतीय संस्कृति की यही पहचान बताते हैं
जिस परिवार में माता-पिता हंसते हैं
उनके आंगन में भगवान बसते हैं
प्रथम गुरु माता-पिता होते हैं
अच्छी सीख परिवार में देते हैं

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