‘अयं निजः परोवेत्ति’ से कही आगे’ वसुधैव कुटुंबकम्’ का भाव जगा गया महाकुंभ 

अब उदास है प्रयागराज का वह भीड़ भाड़ वाला दस किमी का क्षेत्र, वहां के लोगो से अब कोई रास्ता नहीं पूछता ना ही अब कोई यह कहता है कि भईया आगे तक ले चलोगे क्या ! प्रयागराज पुनः अपने अलसाए रंग में लौट रहा। उन दिनों मीडिया में खूब चला साधु संतों और करोड़ों भक्तों के आस्था का हाल – चाल । सबसे बड़ा आयोजन , हम जैसे पत्रकार दो से दस बार स्नान किए होंगे इस दिव्य महाकुंभ के पुनीत आयोजन में , खुद मैंने दो बार किया पावन स्नान । क्या साधु क्या सन्यासी क्या व्यवसाई क्या नेता और क्या अभिनेता ! सबने अपनी आस्था के अनुसार कुंभ को महाकुंभ बनाने में योगदान दिया । जिसका जैसा भाव था उसे वैसा दृश्य दिखा सुअर दृष्टि को गंदगी दिखी और गिद्धों को लाशे दिखी , नफरतियों को घृणा दिखी, जातिवादी नेताओं को डर दिखा , संतों, समर्थकों और भक्तों को मां गंगा का प्यार दुलार दिखा । तो इस तरह समापन हुआ 144 साल बाद आयोजित हुआ विशेष, भव्य, दिव्य महाकुंभ का ! हिंदू आत्मा में बसा यह महापर्व और यहां मिला सर्व समावेशी हिंदू संस्कृति जो सबसे सहिष्णु और उदार हैं का लोहा पूरी दुनिया ने माना । इसे भविष्य में  विचारधाराओं की कुंठा में न बांधा जायें। इसे श्रेष्ठता बोध की कुंठा में न बांधा जायें। न बांधा जायें इसे जाति, समाज, संप्रदाय और ‘मैं’ की लिप्सा में। बंधन मुक्त हिंदुत्व बाल लीलाओं में कान्हा के विराट मुख जितना ही विराट रहा यह दिव्य महाकुंभ। मैं पत्रकार और कॉल्मिस्ट पंकज सीबी मिश्रा जनपद जौनपुर के तहसील केराकत से चलकर इस महाकुंभ तक स्वयं गया और पाया कि यहां ‘अयं निजः परोवेत्ति’ से आगे बढ़ कर  ‘वसुधैव कुटुंबकम’ का लक्ष्य प्राप्त हुआ, अंत्योदय (समाज के अंतिम व्यक्ति के आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक उत्थान) के साथ कुंठा मुक्त और प्रेम युक्त भाव ही इस विश्व को हिंदुत्व के रंग में रंग सकता है।
मैने पाया कि विश्व बंधुत्व को गंगा सी उन्मुक्त स्वतंत्रता दी जाये जिससे यह अपनी सभी धाराओं को समेट कर हिमालय के दुर्जन वनों से निकल कर विशाल गंगासागर और एकाकी जाति वाला महाकुंभ बन जायें । कुंभ से आयी महामहिम द्रौपदी मुर्मू की तस्वीर हिंदुत्व की उसी दिशा में जाती सोच का खंडन है जहां जाति दमन का झूठा डर दिखा कर वोट लूटे जाते है । जिस प्रकार उड़ीसा के सूदूर एक गांव की एक आदिवासी समुदाय की एक महिला भारत जैसे संघ की राष्ट्राध्यक्षा बन सकतीं हैं उसी प्रकार अंत्योदय की भावना से पूरे विश्व के हिंदू समाज का कल्याण हो सकता हैं। यह कुंभ हिंदुत्व के सांस्कृतिक उत्थान में बेहद विशेष टर्निंग प्वाइंट सिद्ध होगा। वैसे महाशिवरात्रि को समाप्त हुए इस दिव्य महाकुंभ में बने कई महारिकॉर्ड जिसे सराह रही दुनिया! आइए आपको ले चलते है रिकॉर्ड की ओर ही:- महारिकॉर्ड-1 श्रद्धालु के लिए, अमेरिका की आबादी से दोगुने 66करोड़ 30 लाख लोग महाकुंभ पहुंचे।  महारिकॉर्ड-2 इन्फ्रास्ट्रक्चर के लिए 4 हजार हेक्टेयर का महाकुंभ क्षेत्र दुनिया के सबसे बड़े स्टेडियम से 160 गुना बड़ा।  महारिकॉर्ड-3  कुंभ सिटी के लिए 4 लाख से ज्यादा तंबू और 1.5 लाख टॉयलेट बने।  महारिकॉर्ड-4 ट्रांसपोर्टेशन के लिए 13,830 ट्रेनों से पहुंचे 30.2 करोड़ श्रद्धालु इस दौरान 2,800 से ज्यादा फ्लाइट्स प्रयागराज पहुंचीं, जिसमें 4.5 लाख श्रद्धालुओं ने यात्रा की। महारिकॉर्ड-5 सिक्योरिटी के लिए 50 हजार सुरक्षाकर्मी और 2700 कैमरों से महाकुंभ की सुरक्षा ।महारिकॉर्ड-6 हेल्थ के लिए मेला क्षेत्र में 43 हॉस्पिटल बने 6 लाख लोगों का इलाज किया गया।  महारिकॉर्ड-7 स्वच्छता के लिए 4 लाख डस्टबिन लगे, 11 हजार कर्मियों ने सफाई की, हर 25 मीटर पर एक डस्टबिन।  महारिकॉर्ड-8  कारोबार के लिए मेला क्षेत्र में 3 लाख करोड़ के लेन-देन का अनुमान। 
             
सौ बात की एक बात, यह ब्यवस्था जातिगत भावना पर जबाब है।मनुस्मृति को मानने वालों की है।
सनातन की जय जयकार हो। अमृत कैसे पाना है?  डुबकी लगाना ही अमृत पाना नहीं होता है ! और भी तरीके हैं अमृत पाने के, गंगा जी जाते हुए लोगों को भोजन पानी दवा के लिए जिन जिन ने पूछा वो अमृत के योग्य हो गए, लोगो के लिए अच्छी व्यवस्था जिन्होंने कर दी वे अमृत के भागी निश्चित रूप से बन गए। गंगा जी जाने में जो अक्षम है उसे नहला दिया , अमृत वर्षा आपके ऊपर हो गई। गंगा जी के आस पास रहकर लोगों की सेवा कर दिया , अमृतपान यही है। संयम और व्यवस्था के लिए खुद को पीछे कर लिया , साधन और संपन्न होने के बावजूद उसे आधार नहीं बनाए, आप अमृतवान हो गए । धैर्य, विनम्रता और दृढ़ता के साथ किसी भी समस्या का समाधान हो सकता है, किसी को कोसने की बजाय जितना हो सके समाधान के लिए प्रयास करना अमृत की ओर पग बढ़ाना है। यदि कोई किसी कारण गंगा जी नहीं जा पाया तो वह यह न सोचे कि वह अमृत से वंचित रह गया। मां बाप और गुरु और परिवार की सेवा कर ली , त्रिवेणी स्नान से अधिक पुण्य कमाया।
जिनके लिए भीड़ भी सनातन है, जाम भी सनातन है, भगदड़ भी सनातन है, मृत्यु भी सनातन है, डुबकी भी सनातन है, व्यवस्था भी सनातन है और अव्यवस्था भी सनातन है, दिव्य दृष्टि वाले लोगों की भरमार है, लेकिन जिसमें डुबकी लगाई जा रही है उस गंगा की अविरल धारा में भी सनातन है या नहीं है इस पर भी विचार करने की आवश्यकता है। गंगा की धारा में डुबकी से अमृत तो प्राप्त हो रहा है, लेकिन वह धारा अपने अमृतत्व के लिए तड़प रही है। काश! यह पुण्य की डुबकी लगाने के लिए उमड़ा हुआ विशाल जनसमूह एक बार सिंहनाद कर दे की गंगोत्री से गंगासागर तक गंगा की धारा बिना किसी अवरोध के अविरल और निर्मल प्रवाहित हो, तब किसी में शक्ति नहीं है कि वह गंगा की धारा को रोक सके, लेकिन  उमड़ते और घुमड़ते हुए लोगों का सनातन केवल लेना सीखा है देना अभी तक नहीं सीख पाया है, इसलिए यह पुण्य लूटने की भीड़ लगी अर्जित करने की भीड़ नहीं है। हम जिस पुण्य के भागी बनना चाह रहे थे उसकी भागी आगे आने वाली पीढ़ियाँ भी बने, यह धारा सतत् चलती रहे इस दृष्टिकोण का नाम ही सनातन है। जिस दिन यह दृष्टि खड़ी हो जाएगी तब वास्तव में सनातन की शाश्वत दृष्टि धर्म के रूप में खड़ी हो जाएगी। जो धारा हमारे पहले से बहती आ रही है वह हमारे बाद भी बहती रहे, जीवन में इस दृष्टिकोण का नाम ही सनातन है वरना जो सनातन है वह अदृश्य, अलौकिक और जगत का आधार है। दिव्य महाकुंभ के औपचारिक समापन का उद्घोष हुआ और अब मन सदैव केवल सनातन के उत्थान के लिए व्यग्र रहेगा ।
पंकज सीबी मिश्रा, राजनीतिक विश्लेषक एवं पत्रकार जौनपुर यूपी 

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