मुद्दा : राजनीति में हर जगह चरस बोते नेता, अब जातियों को आपस में लड़वाएंगे

लोकतंत्र का खेल पहले वोट पर चलता था औऱ अब जाति पर चलता है।  बात ताज़ा राजनीति पर तो 2027 से पहले भाजपा के सॉलिड वोट को चट करने की विपक्ष ने तमाम रणनीति बनाई। जैसे करनी सेना बनाम ब्राह्मण -यादव किया, राजपूत वोट को हिट किया।  काफ़ी सफलता भी मिली, पर दिक्क़त ये कि 2027 में ये नहीं चलेगा। योगी आदित्यनाथ का चेहरा सामने होगा तो राजपूत वोट खुद ब खुद एकजुट हो पड़ेगा। सो जो ठाकुर साब लोग जय समाजवाद किये थे वो जल्द ही पार्टी के पत्र द्वारा दुत्कार दिए गए। अब नेता जी नें जाल डाला दलित वोट पर औऱ पीडीए कह कर उन्हें लुभाने के लिए सवर्ण समाज की बलि दी गई। ख़ास कर जाटव पर मेहरबान हुए औऱ उन्हें फ़साने को जाल फेंका गया। अब वहाँ भी दिक्क़त जाटव वोट अभी चार हिस्से में है, एक बड़ा हिस्सा मायावती के पास, एक हिस्सा रावण के पास  एक हिस्सा भाजपा के पास  सो बड़ा छोटा भाग हाथ लगेगा। अब लखनऊ की गद्दी पाना हो तो आपको एक बड़ा जातिय वोट बैंक तो और चाहिए यादव मुस्लिम के अलावा। उत्तर प्रदेश में ब्राह्मण बड़े लम्बे समय से सत्ता पलटने वाला वोट रहा है। ये ब्राह्मण ही थे जो सतीशचंद्र मिश्रा के बहकावे में आकर मायावती की बहुमत की सरकार बनवायी, औऱ मनोज पाण्डेय, पवन पाण्डेय जैसो के कुचक्र में फंस कर अखिलेश को बहुमत देने में बड़ी भूमिका निभाई थी, वर्तमान भाजपा सरकार से अब तक ब्राह्मण वोट जुड़ा हुआ है। ऐसे में अखिलेश बेचैन है, अब नेता जी को ऐसा क्या कीड़ा काटा जो यादव बनाम ब्राह्मण की राजनीति करने उतर पड़े ! जबकि पूर्वांचल में 2027 में उन्हें काफ़ी फायदा भी दे सकता था ये वोट। अच्छा यादव वोट को भी ध्रुवीकृत करने की दरकार नहीं।

काहे के मुलायम को जहाँ जीवन में कभी 66-67% से ऊपर यादव वोट न मिला अखिलेश को 2022 और 2024 के चुनाव में 85% तक यादव वोट मिला है भईया इससे आगे कोई उम्मीद दिखती नहीं। तो यादव वोट बढ़ने का भी फायदा नहीं,  ब्राह्मण वोट जो मिल सकता था उसे भी खुद मना करना है तो अखिलेश चाहते क्या हैं आखिर ? क्या ये मूर्खता कर डाली उन्होंने !  नहीं ! बेहद कैलकुलेटेड राजनीतिक चाल है। अखिलेश यादवों को भावनात्मक मुद्दों में उलझा रहे हैं। अभी ऐसे और भी कांड करतूत होंगे  बात का बतंगड़ बनेगा औऱ  इसका फायदा क्या होगा ? इसका फायदा अखिलेश 2027 में टिकट वितरण में जातिय गणित बैठा लेंगे।  लोकसभा की ही तर्ज़ पर यादवों को या तो टिकट मिलेंगे नही या बेहद कम क्यूंकि ये प्रयोग सफल रहा था। यानी यादव वोट तो सपा को दे,  कंडीडेट अन्य जाति से हो जिससे कैंडिडेट का सजातीय वोट जुड़ जीत का फार्मूला बने । 120+ सीट ऐसी हैं जहाँ यादव टिकट के दावेदार होते हैं सीधे। मेरा अनुमान है अखिलेश 20 टिकट भी नहीं देने वाले।  उनमें भी कुनबे वाले और रिश्तेदार होंगे ज्यादातर या गगन यादव जैसे नमूने। इटावा में जो कुछ भी हुआ उसका शुरू से लेकर अब तक कोई समर्थन नहीं करता मै किन्तु एक जाति को दूसरे जाति के खिलाफ खड़ा करने वालों को बख्शा भी नहीं जाना चाहिए।

कुछ साथियों नें मेरा मत जानना चाहा इटावा कांड के बारे में तो बता दूँ  चोटी काटना, सर मुंडवाना  गलत है क़ानून हाथ में नहीं लेना चाहिए। चार सौ बीस लोगो को पकड़ पुलिस में रिपोर्ट करते, जो कि बाद में गिरफ्तारी भी हुई। उसके बाद अब जो हो रहा है वो भी सर्वथा गलत है क्यूंकि कुछ गुंडे नेता बनने के चक्कर में यादवों को ब्राह्मणो से लड़वाने के मंसूबे से इटावा में घुसे, पुलिस तक पर हमला किए। यह कल की घटना एक साजिश है। हजारों की संख्या में गांव पर चढ़ाई करना ये क़ानून को चुनौती है। सरासर गुंडागर्दी है। अरे संवैधानिक रूप से अपना पक्ष कोर्ट में रखें। वेवजह राजनीति का शिकार होकर मामले को ब्राह्मण बनाम यादव बनाकर राजनीतिक गोटियां सेंकने से क्या होगा ? एक पार्टी के हारे राष्ट्रीय अध्यक्ष जी मेराआपसे यही कहना है कि आप तो ब्राह्मणों को जोड़ने की बातें विगत दिनों से कर रहे हैं फिर जो कल लोग दादागिरी पर उतरे उनका विरोध किया क्या आपने ? कभी कभी होता ये है कि  ‘ न खुदा ही मिला न बिसाले सनम न इधर के रहे न उधर के रहे ‘। नेता जी सनातन कि जाति तोड़ने पर हम फिर गुलाम होंगे आपके इस करतूत से। वैसे भी चन्द लोगों के दोष को आप पूरे समाज पर नहीं मढ़ सकते। मेरी दृष्टि में अब कानून को अपना काम करने देना चाहिए वेवजह मामले को तूल देना गलत है। अब भारत जैसे देश में आप काम और वादों पर वोट नहीं ले सकते । वजह वोटर लालची तो नेता झूंठे सो साहब तरीक़ा राजनेता अपनाते हैं भावनात्मक मुद्दों को आगे कर ध्रुविकरण करने का वोटों के। सारे राजनितिक दल ये प्रयोग सत्ता के चक्कर में किये। कामयाब रहें।

पंकज सीबी मिश्रा/राजनीतिक विश्लेषक़ एवं पत्रकार जौनपुर यूपी 

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