आरक्षण और धरना प्रधान भारत में मोदी का हर तीर आज निशाने पड़ रहा है। धर्मेंद्र भैया जी ने स्तिफा दिया तो सुदूर देश में बैठा ध्रुव राठी गदागद हो उठा । किर्गिस्तान से बेहद उत्साहित होकर इंस्टाग्राम पर पहली तिमाही में विकास दर 7.8 होने की घोषणा की। अपनी ओर से उन्होंने खुशी की लहर पूरे भारत में दौड़ा दी मगर वह लौटकर मोदी को ही डुबाने लगी। और तो और इनके काल में वित्त सचिव रहे सुभाष चन्द्र गर्ग ने इनके इस दावे को मुस्कुराते हुए इतना पंक्चर कर दिया कि फिर इनके अपनों से भी इसमें हवा नहीं भरी गई। गर्ग ने कहा कि महाराज सच तो यह है कि यह दर मात्र 2.6 है और मुद्रास्फीति को देखते हुए तो यह शून्य प्रतिशत है। मोदी जी अब आप गुजराती आंकड़ों का खेल न खेलें। आप इधर के आंकड़े उधर एडजस्ट न करें कृपया। इसके बाद मोदी जी की विकास दर की जय- जय की बजाय फू- फू होने लगी। लोग कहने लगे कि मोदी जी नाराज फूफा हो गए। उधर विपक्ष ने कहा अडानी -अंबानी की विकास दर को देश की विकास दर न मानें। तभी किसी ने कांग्रेस की चुटकी लेते हुए कहा कि राहुल की मानसिक विकास दर तो इससे भी और ऊंची है तब से राष्ट्रीय माता जी और उनकी मित्रमंडली की बोलती बंद सी है। बड़ी हुई टोटकेबाजी अब कांग्रेस का विकास धूल फाक रही है।दिमागी नक्सल के बाद एक और शब्द आजकल बड़ा वायरल है – नाराज फूफा । अब क्या कहें , शब्द यह भी मोदी ने ही दिया है । वैसे भारत में गाँव गाँव प्रचलित है , की विवाह के समय कोई ना कोई फूफा नाराज हो जाते है तो यह बड़ा पुराना शब्द है । भारत में गाँव शहर फूफाओं को लेकर कईं कहानियां हैं । दरअसल फूफा पिता का बहनोई होता है और बेटी का पति बेटे का दामाद । बस नाराज फूफाओं की कहानी यहीं जन्म लेती है । राजनीति हो या पारिवारिक फंक्शन, नाराज फूफा सभी जगह हैं । आज से नहीं , बड़े पुराने जमाने से हैं । हर घर के अपने किस्से हैं । ब्याह शादियों में फूफा की नाराजगी के लाखों किस्से हैं , जिन पर हम बात नहीं कर रहे।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विकास कार्यों पर हर बात में सवाल उठाने वालों को ‘नाराज़ फूफा’ कहा था। अब सोशल मीडिया पर उनके इस तंज के संदर्भ में कुछ चर्चित उदाहरण भी शेयर किए जा रहे हैं। पहले नाराज फूफा कॉकरोचो के ध्रुव राठी है जिनके अनुसार हर किसी के पास कार नहीं है, तो हमें हाईवे की क्या ज़रूरत है ? दूसरे नाराज फूफा जेएनयू लेफ्ट विंग के कन्हैया कुमार जिनके अनुसार पानी चुराने के लिए सड़कें बनाई जा रही हैं। तीसरे नाराज फूफा दलितों के फर्जी हितैषी रवीश कुमार जिनके अनुसार मेरठ से प्रयागराज 6 घंटे में ? गंगा एक्सप्रेसवे से 5 घंटे बचते हैं। जल्दी पहुंचकर हम क्या करेंगे ? चौथे नाराज फूफा लेफ्ट के रघुराम राजन जिनके अनुसार भारत सुपरपावर क्यों बनना चाहता है ? पांचवे और आखिरी नाराज फूफा कांग्रेस के पी चिदंबरम जिन्हें ब्रिक्स से नाराजगी है। यह जो लोग है यह कौन हैं किस समाज का प्रतिनिधित्व करते हैं क्या इन लोगों को किसी ने चुन कर भेजा है | तो यह कैसे कह सकते हैं कि हमे यह सुविधा चाहिए या नहीं 140 करोड़ के देश मे चंद लोग नहीं तय कर सकते | हमे क्या चाहिए क्या नहीं चाहिए। लेकिन पीएम मोदी ने नाम बेशक नाराज फूफा का लिया हो लेकिन उनका मतलब घरेलू फूफाओं से नहीं , राजनीति के उन फूफाओं से है जो हर समय नाराज रहते हैं , मुँह फुलाए रहते हैं । यह नाराज फूफा टर्म जिनके लिए इस्तेमाल की गई है वे राजनीति में बिखरे पड़े हैं । हाल ही की बात है जम्मू कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला , फारूख अब्दुल्ला , राज्यपाल आदि की मौजूदगी में वन्देमातरम गाया गया ।
कश्मीर फिल्म फेस्टिवल में वन्दे मातरम पूरे 6 छन्दों वाला गाया गया तो कर्नाटक के मुख्यमंत्री डीके बॉस नाराज फूफा हो उठे । बताइए दिल्ली में बैठे कांग्रेसीयों के इंटरनेशनल फूफा उमर पर नाराज हो गए । चूंकि सरकार में शामिल हैं तो कहा कि 2 छंदों वाला गाते । अब उमर तो आखिर ठहरे उमर ! बोले भैया ! मुख्यमंत्री मैं हूँ या तुम ? जो संसद ने पास किया है वही गाया जाएगा कश्मीर में । यह कोई कांग्रेस मुख्यालय नहीं एक स्टेट है । बेचारे दिल्ली वाले फूफा पैंतरे बदलते रह गए । अगर भाजपा की बात माने तो नाराज फूफा ढेर सारे हैं । मजेदार बात यह है कि हर राज्य में हैं । एक और खास बात है ! फूफाओं के जलवे गजब हैं । अधिकांश राजनैतिक फूफा दिमागी नक्सल भी हैं और राहुल गाँधी इन नाराज फूफाओ के लीडर है । तो जलवे देखिए साहब ! 12 साल में एक भी दिन नहीं आया जिस दिन ये नाराज न होते हों । हां , 2014 से पहले 10 साल तक ये सब फूफा बड़े खुश थे । वैसे राजनीति के नाराज फूफा देश की उपलब्धियों से जलते हैं । उन्हें राम का तो नाम ही पसंद नहीं । अब उन्हें जेन जी से पीएम का बात करना सख्त नापसंद है । मथुरा काशी का नाम सुनते ही उनका दम घुटने लगता है । बेचारे नाराज फूफा ! कुछ न कर पाने के गम में बस मचल रहे हैं , उबल रहे हैं । इधर पंद्रह साल की जिस आंदोलनकारी लड़की रुचिका के माता-पिता पर दबाव डालकर तथा बलात्कार और हत्या की धमकियां दिलाकर उससे माफी मंगवाई थी, उसने शेरनी की तरह दहाड़ना शुरू कर दिया है। उसने साफ़ कहा है कि मोदी जी आप कायर हो।अब मैं पीछे हटनेवाली नहीं हूं।मेरे पास अब खोने के लिये कुछ नहीं बचा है! उस बच्ची को डराने का दांव भी अंततः खाली गया। यहां भी टांय-टांय फिस्स हो गई।
इसके साथ ही मोदी जी ने एक बार फिर से यह कहा कि अभी आप एक साल तक विदेश यात्रा न करें और सोना भी न खरीदें तो लोगों ने पूछा कि माननीय जब विकास दर इतनी कठिनाइयों के बीच भी इतनी ऊंची -ऊंची छलांगें मारी रही है तो इस अपील की आवश्यकता क्यों?तब से उनकी सिट्टी और पिट्टी दोनों गुम है! न सिट्टी मिल रही है, न पिट्टी। उधर कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे की सभा के बाद हल्द्वानी के दशहरा मैदान को यज्ञ- मंत्रादि से ‘पवित्र’ किया गया ,यह झूठ फैलाया गया क्यूंकि खड़गे जी दलित जो ठहरे और उत्तराखंड है देवभूमि ! वहां एक दलित जाए और एजेंडा ना फैलाये ! वह भी कांग्रेसी माहौल अपवित्र न करे, यह गाँधी परिवार सहन नहीं कर सकता!कांग्रेस ने इस पवित्रीकरण की शिकायत की तो एफआईआर तक दर्ज नहीं हुई मगर एक हिंदूवादी की ओर से राहुल गांधी के विरुद्ध हो गई क्योंकि उन्होंने एक संवाददाता सम्मेलन में इस ‘पवित्रीकरण ‘ का विरोध किया था। गुरुवार को सुना गया कि उत्तराखंड की पुलिस दिल्ली आ रही है- राहुल गांधी को गिरफ्तार करने मगर अंत में यह मामला भी डब्बे में हो गया क्यूंकि क़ानून आम जनता के लिए है । पुलिस वहीं की वहीं फ्रिज हो गई ! मोदी के मंत्री जे पी नड्डा ने काक्रोच जनता पार्टी के आंदोलन के दौरान उनके नेताओं को आश्वासन दिया था कि उन सभी आंदोलनकारियों के खिलाफ एफआईआर वापस की जाएगी, जिन पर आपराधिक मामले नहीं हैं। पुरानी अकड़ चूंकि अभी बाकी है, गई नहीं है तो चालीस दिन बीत जाने पर भी सरकार ने कुछ नहीं किया।सोचा कि इन्हें जो करना हो , करके देख लें।हम तो पहले भी अपने वायदों से मुकरते आए हैं, अब भी मुकरेंगे।तब काक्रोच जनता पार्टी की ओर से पांच सितंबर को फिर से आंदोलन की चेतावनी दी गई, तो इनकी नाड़ी खिसक गई।एकदम से रास्ते पर आ गए। सारी अकड़ धूल में मिल गई। सरकार तुरंत सुप्रीम कोर्ट गई एफआईआर वापस करवाने। इस तरह यह मामला भी टांय-टांय फिस्स हुआ !
राहुल गांधी इकतीसवें दिन एफ आई आर करवाने पार्लियामेंट थाने पहुंचे और धरना देकर बैठ गए कि जब तक पुलिस रिपोर्ट दर्ज नहीं होगी,हम यहीं रहेंगे।तो फिर से इनकी नाड़ी खिसकी। इन्हें अंदाज नहीं था कि राहुल गांधी इस मामले में इस तरह कूद पड़ेंगे। प्रधानमंत्री और गृहमंत्री ने खूब सिर खपाया कि राहुल गांधी से हार मानें या न मानें।सात घंटे बाद एफ आई आर दर्ज करनी पड़ी। यहां भी टांय-टांय फिस्स हो गई। दावों के अनुसार एक पूर्व वरिष्ठ अधिकारी आशीष जोशी को दिल्ली पुलिस ने रास्ते से उठा लिया क्योंकि उन्होंने गृहमंत्री और गृह सचिव के बीच मतभेद की बात अपनी एक सोशल मीडिया पोस्ट में कही थी, जो सरकार की नजर में एक टाप सीक्रेट थी।उन्हें पकड़ कर दिल्ली पुलिस की विशेष शाखा में ले जाया गया। परिजनों को कुछ नहीं बताया गया।उनसे नौ घंटे तक पूछताछ की गई, निकला कुछ नहीं। मजबूरन उन्हें छोड़ना पड़ा। उन्होंने अगले दिन फै़ैज़ अहमद फ़ैज़ की नज्म़ ‘हम देखेंगे ‘ पोस्ट करके अपने विदेशी एजेंट होने का एहसास फिर से दे दिया। इस मामले में पुलिस कि टांय-टांय फिस्स हो गई ! इधर एक सवर्ण निर्दोष स्वतंत्र भारद्वाज ने जंतर-मंतर आंदोलन में शामिल लड़की नीशू आजाद के पिता संजय कुमार को अनजाने में धक्का दें दिया था तो विक्टिम कार्ड खेल उन पर मार डालने के इरादे से आजाद का सिर फोड़ा ऐसा कहकर मामला दर्ज करा दिया। इसका टीवी पर गौरव गान भी किया गया कि विपक्ष जीत गया, अरे निर्दोष सवर्ण कभी हारता नहीं ! नरेन्द्र मोदी सेना में से अठावले से लेकर केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान तक आरक्षण रिफार्म पर उल्टा पुल्टा बोले है और सवर्ण अब नाराज फूफा है। काक्रोच जनता पार्टी के संसद मार्ग पुलिस थाने पर प्रदर्शन के बाद पूरे सरकार को दबाए रखा है। दिल्ली पुलिस ने कार्रवाई करने का भरोसा दिया मगर सुप्रीम कोर्ट को अराजकता पसंद है शायद इसलिए दिमागी नक्सलीयों पर एफआईआर दर्ज ना करने का निर्देश दें दिया।
उधर सौरव दास के नेपाल भागने के मंसूबों को विफल करते हुए कुछ ही घंटों के अंदर उसके बाप का नाम पूछकर उसे भी नाराज फूफा बना दिया गया। उस भगोड़े को दबोच लिया गया जो कॉकरोच आंदोलन में मुफ्त का खाना बाँट रहा था। अभिजीत दीपके के गुर्गो द्वारा गुंडागर्दी से सवर्ण आंदोलनकारियों को डराने का दांव भी खाली गया। टांय-टांय फिस्स हो गया। इधर कॉकरोचो की इतनी बार इतनी तरह से और इतनी तेजी से टांय-टांय फिस्स हुई है कि जिधर भी देखो, इनकी टांय-टांय फिस्स ही दिखाई और सुनाई देती है। अब लोगों ने इनसे और इनके गुंडों से डरना बंद कर दिया है।जब लोगों ने देख लिया कि इनके पास देने के लिए धमकियां और पकड़ाने के लिए और भारत को विकसित बनाने के झुनझुने के अलावा कुछ नहीं है तो कोई क्यों इनसे डरे! किसी दिन आंदोलन के जरिए चुनाव जीतने का इनका ताश का महल भी इसी तरह ढह जाएगा, हवा हो जाएगा तो फिर बचेगा क्या? अंबानी और अडाणी? इस टाइप के प्राणी किसी के नहीं होते।जिधर बम, उधर हम इनकी बुनियादी आइडियोलॉजी है! इस आइडियोलॉजी पर ये फिर से सफलतापूर्वक चलने लगेंगे।दिशा ही तो बदलना है।इनकी जगह उनकी ही तो जय-जयकार करना है! इन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता। ये हवा के साथ बहनेवाले लोग हैं। ये सबसे जल्दी बदलते हैं। जिसे सिर पर बैठा रखा है, उसे नीचे फेंकने में ये ज़रा देरी नहीं करते। उसे कितनी ही चोट लग जाए,उसकी ओर देखते तक नहीं। आईसीयू में वह पड़ा हो तो उसे देखने भी नहीं जाते। उसका आदमी फोन करे तो उठाते नहीं! इधर आपने देखा होगा कि राहुल गाँधी बारह साल से कैसी ‘बहकी- बहकी’ बातें करने लगे है!

पंकज सीबी मिश्रा, राजनीतिक विश्लेषक – जौनपुर यूपी
