आज सुबह – सुबह बहुत दिन बाद एक नामी गिरामी ब्रांडेड अखबार उठाया जो लगभग सभी सरकारी ऑफिस और स्कूल कॉलेजों में आता है वो भी इसलिए कि घर के बुजुर्गो को आस पास के घटनाकर्मों की खबरे पढ़नी होती है। इनके ही डिमांड पर इसे मंगवाता हूं पर खुद इस हाईटेक युग में समयाभाव के कारण कभी नही पढ़ता। वैसे भी ऑनलाइन अच्छे कंटेंट और ब्रेकिंग न्यूज पढ़ लेने की आदत ने वैसे भी हम जैसे युवाओं की अखबार से या यूं कहे ब्रांडेड अखबारो से दूरी बना दी है और अब ब्रांडेड अखबारों के हार्डकॉपी को पढ़ने की जिज्ञासा सभी में लगभग खत्म सी होती जा रही। काफी हद तक इन ब्रांडेड अखबारों से दूरी का कारण इनमे छपने वाले बड़े – बड़े विज्ञापन, ब्रांड होर्डिंग, नेताओं के पोस्टर, और प्रचार सामग्री है जिन्हे देख के ही मन भन्ना जाता है। खबरों की जगह अखबार अब केवल विज्ञापन के साधन होते जा रहे। खोजी पत्रकारिता तो पूरी तरह खत्म है। अब केवल न्यूज एजेंसियों से पेड न्यूज खरीद कर लगाए जाने के चलन ने हम जैसे पत्रकारों को भी ब्रांडेड अखबारों से दूर करने में महती भूमिका निभाई है। लखनऊ सहित नजदीकी जिलों से छपने वाले हिंदी के कई नामी गिरामी अख़बार देखे। भारत की चर्चित भ्रष्टाचार की घटना और खबरे पूरी तरह इन हिंदी अख़बारों के मुख्य पृष्ठ से नदारद। जब समूची दुनिया सुनीता विलियम्स की अंतरिक्ष से नौ महीने बाद वापसी पर जश्न मना रही हो तो यह अखबार भी बस वही महिमा मंडन करने में व्यस्त या यूं कहूं खानापूर्ति कर रहे या पेड न्यूज से बस न्यूज छाप रहे। वही अंग्रेज़ी मीडिया में सुनीता विलियम्स की खबरें कम छाई रही। ऑन लाइन मीडिया में भी सुनीता विलियम्स की वापसी की कई कई खबरें रहीं पर कोई खास तवज्जो नहीं मिली। क्राइम खबरों को मजे से परोसने में कई हिंदी अख़बारों की कोई सानी नहीं। इनमें बेरोजगारी, राजनीति और सामाजिक खबरो का नदारद होना मुझे तो बहुत अखरता है। इस संदर्भ में स्वाभाविक है कि हर पत्रकार या हर संपादक के अपने विचार और आंकलन अलग-अलग हो सकते हैं। हिंदी पत्रकारों की सोच अलग हो सकती है, अंग्रेजी में काम करने वाले पत्रकारों की सोंच अलग हो सकती है और उसी हिसाब से सभी संपादकों ने एक ही खबर को मुख्य खबर के रूप में महत्व दिया होगा पर ये सभी अखबार विज्ञापन से ही क्यों पटे है ! आखिर क्या पाठक विज्ञापन पढ़ने के लिए पैसे देता है ! क्यों ! क्या आम जनता विज्ञापन पढ़ने के लिए पैसे दे रही है या प्रदर्शन के लिए ! अखबार को सोचना होगा .! आज यह पछतावा हो रहा है कि साइंस में पीजी करने के बाद मैने पैशन के रूप में पत्रकारिता का पथ क्यों चुना ? वह भी हिंदी पत्रकारिता का। शर्मसार कर दिये जाने वाली घटनाओं पर पर्दा और नेताओं की चापलूसी ऐसे ही कृत्य से मैंने कभी हिंदी अख़बार न पढ़ने का फ़ैसला लिया । ये ब्रांडेड अख़बार अपने पाठकों के साथ न्याय नहीं कर पा रहे। और हां ! ये या तो सरकार के साथ न्याय करते दिखते हैं या विपक्ष के साथ। किसी नेता विशेष के साथ झुके है तो कभी पैसों पर बिकी खबरे चला रहे। कुछ एक अखबार सच्चाई धडल्ले से लिख रहे। कुंभ में हमने हिंदी अख़बारों को यूपी की प्रशस्ति गाते देखा। कुंभ को महाकुंभ लिखे पढ़ा। पैंसठ छाछ्ठ करोड़ लोगों के स्नान पर गर्व करने वाला हिंदुस्तान देखा पर आम आदमी की लूटने वालों के खिलाफ मुहिम नही देखी इन अखबारों की। तब भी इतना दुख नहीं हुआ क्योंकि यह तो हम मीडिया में सदियों से करते आये हैं। पर आज जितना दुख पहले कभी किसी घटना पर नहीं हुआ कि एक जज के घर आग लगने पर करोड़ों का जमा धन मिला पर यह खबर मीडिया विमर्श से जल्दी गायब हो जायेगी। यही कह सकता हूँ- धन्य है ये ब्रांडेड हिंदी अखबार और इनके सही हिंदी तक न लिख पाने वाले तहसीलों और मंडलों के हिंदी पत्रकार, खुद को पराड़कर समझने वाले और नेता, डीएम, एसपी के यहां दोने चाटने वाले स्थानीय संपादक गण भी कम बधाई के पात्र नहीं। मेरे यहां आने वाले दो हिंदी अखबारों का प्रथम पृष्ठ देखकर मेरा ध्यान इस ओर गया था। इन दोनों अखबारों के सभी संस्करण में ट्रंप और मोदी की लगभग आधे पृष्ठ की खबर प्रकाशित हुई है, वहीं दूसरे अखबार में ट्रंप की कई काॅलम में लगभग आधे पृष्ठ की लीड खबर लगाई जाती है। इन दोनों खबरों को देखने के बाद एक पत्रकार के रूप में मुझे जो विचार आए, उसे मैं यहां प्रकट कर रहा हूं, क्योंकि सोशल मीडिया पर भी कुछ बुद्धजीवी वर्ग ने संदर्भ में यही मुद्दा उठाया है। तमाम खबरों को देखने के पश्चात मुझे लगा कि ट्रंप, मोदी , सुनीता विलियम्स की खबर पहले पृष्ठ पर तो होनी ही चाहिए परंतु यदि संतुलित रूप से देखा जाए तो लीड या सेकंड लीड के रूप में चार कॉलम की यदि नागपुर हिंसा पर, चार कॉलम पर रोजगार और युवाओं के लिए योजनाओं पर खबरे होती तो ज्यादा संतुलित होती। शायद उससे ज्यादा महत्व देना भी अन्य खबरों का महत्व दबा देना है, तथा उस से कम भी इस खबर को महत्व नहीं मिलना चाहिए।

पंकज सीबी मिश्रा/पत्रकार एवं राजनीतिक विश्लेषक जौनपुर यूपी
