राज्यों के सोशल मीडिया प्रतिबंध और उनके संभावित परिणाम

16 वर्ष से कम उम्र के बालकों के सोशल मीडिया प्रयोग पर कर्नाटक राज्य के मुख्यमंत्री ने प्रतिबंध लगाने की बात कही है और इसी प्रकार की बात का समर्थन आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री  चंद्रबाबू नायडू ने किया है। अगर विदेश की बात की जाय तो आस्ट्रेलिया, फ्रांस, ब्रिटेन आदि के जो प्रमुख हैं इस योजना पर कार्य करने की योजना बना रहे हैं। सोशल मीडिया पर प्रतिबंध लगाने वाले तर्क का समर्थन करने वालों का तर्क है कि बालकों का मस्तिष्क कोमल होता है और उन्हें इसकी लत लग जाती है और ज्यादा उपयोग के कारण वह अवसाद और चिंता में चले जाते हैं। जिस कारण उनका पढ़ाई में मन नहीं लगता है और वह चिड़चिड़े हो जाते हैं। जिससे आने वाली पीढ़ी का ठीक प्रकार से विकास नहीं हो पता है।
दूसरा कारण यह बताते हैं कि सोशल मीडिया में आपराधिक गिरोह छद्म नाम से कार्य करते हैं और वह इन युवाओं को आसानी से शिकार बना लेते हैं और ड्रग्स  तस्करी तथा अन्य गतिविधियों को संपादित करने में सहयोग लेते हैं। लव जिहाद, प्रेम जाल में फसाने की घटनाओं में भी सोशल मीडिया का भी उपयोग हो रहा है। जिसकी खबरें आए दिन आती रहती हैं इसके अतिरिक्त प्रॉस्टिट्यूशन गैंग भी  सोशल मीडिया में सक्रिय हैं। आतंकवादी  संगठन भी सोशल मीडिया का उपयोग करके नवयुवकों का ब्रेन वास करके अपना रिक्रूटमेंट करते हैं। अभी पिछले दिनों केरल से आईएसआईएस जैसे आतंकी संगठनों ने बहुत सारे नवयुवकों को अपने संगठन में भर्ती करने का कार्य किया था।
इसके अलावा सीमा पार से संचालित अनेक आतंकी संगठनों द्वारा सोशल मीडिया का उपयोग करके अनेक घटनाओं को अंजाम दिया जाता है 16 वर्ष से कम उम्र के बालकों द्वारा सोशल मीडिया उपयोग पर प्रतिबंध लगाने से इन सब घटनाओं को कम करने में मदद मिल सकती है। हालांकि कुछ एक्टिविस्टों का मानना है कि यह कदम अभिव्यक्त की आजादी पर प्रतिबंध लगाने की सोची समझी रणनीति है। वहीं उनका यह कहना है कि छद्म नाम तथा पहचान से यदि कोई व्यक्ति अपनी प्रोफाइल बनता है। तो इन कंपनियों द्वारा उन्हें किस प्रकार रोका जायेगा। उनकी कैसे पहचान की जायेगी और यदि अगर सोशल मीडिया कंपनियां इन सब पर रोक नहीं लगा पाती है तो इनको  किस प्रकार से दंडित किया जाएगा।
वहीं सोशल मीडिया कंपनियों का कहना है कि इन सब कार्यों से उनको बदनाम किया जा रहा है तथा इससे उनके रेवेन्यू में भी फर्क पड़ सकता है और उनके द्वारा प्रदान किए गए रोजगार पर भी फर्क पड़ सकता है। हालांकि यह कदम समाज पर कितना प्रभाव डालेगा यह तो आने वाला समय ही बताएगा। लेकिन इससे युवाओं को फ्री डाटा देकर जो सोशल मीडिया की लत लगाई गई है उसे अवश्य बचाव होगा।
बाल गोविन्द साहू (लेखक) – कानपुर

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