व्यंगिस्तान में बाप बदलने की प्रथा के मूलनायक…..

मुझे और मेरे लिखें लेख पढ़ने से पूर्व सोशल मिडिया से प्राप्त एक आइडिया से प्रेरित यह दोहा पढ़िए :- अच्छा लगे तो मुझे जरुर एक इमोजी और शॉल टाईप का कुछ देकर सम्मानित करियेगा क्यूंकि आजकल मुझ जैसे यंगिस्तान के व्यंग्य लेखको को आइडियाबाज कम पत्रकार ज्यादा मान कर सम्मान कम लोग ही दे पाते है। तो आप पहले ये पंक्तिया पढ़िए :-
         हतो वा प्राप्स्यसि एक्सपिरियंस एक्सेप्टवा वा  प्राप्स्यसि हिंदू राष्ट्रम ।
         तस्मादुत्तिष्ठ भारतम्य राहु – राहुल  कृतनिश्चय: जपत्वाम ।।
अर्थात मोदी जी द्वारा ठुकराए जाने पर अथवा राहुल गाँधी के एक्सपिरियंस  एक्सेप्ट होने पर ही तुम्हे हिंदू राष्ट्र मिलेगा , इसलिए हे भारतवासी उठो और दृढ़ निश्चय के साथ राहु- राहु जपो। वैसे भी प्राचीन काल में एक अध्यापक ने अपने सरनेम के साथ एक गरीब के बच्चे को संपूर्ण शोषित वर्ग का राजा बना दिया था। आज उसी राजा को गुरू समाज सुधारक मानने वाले अधिनियम समाज के असंवैधानिक लोग एक ऐसी शेरनी का दूध पी रहे जो उन्हें अशिक्षित बना रही। वहीं कबीर दास ने भी कभी गुरु की महिमा में लिखा भी था :-
” गुरु गोबिंद दोऊ खड़े ,काके लागू पाव
बलिहारी गुरु आप ने गोबिंद दियो बताय “
लेकिन ये न्यू इंडिया हैं यहां साक्षरता और शिक्षित दर तो बढ़ी पर कुछ लोगों का मानसिक विकास नहीं हो पाया और ब्राह्मण सहित क्षत्रिय समाज को भला बुरा बोलकर अपने राजनीतिक चोचलो का प्रयोग कर एजेंडा बना रहें ताकि लाइम्ब्रीगिनी में घूम फिर सकें । एक गुरु जो लड़को से पैसे लेकर उन्हें दबे कुचले समाज का किंग बनाता है  उसको इस समाज ने एक मामूली सांसद तो बना डाला पर उसे पीएम नहीं बनने दिया जा रहा यह शोषण नहीं तो और क्या है !  मुझे आजतक नहीं समझ आया लोग ओशो और बौद्ध दोनों को क्यों सुनते हैं ? जबकि ओशो और बौद्ध से अच्छे और ओरिजिनल विचार इंटरनेट पर उपलब्ध हैं। किसी ने लिखा कि दोनों ही कबीर दास जी की बेहद सस्ती कॉपी हैं, इन्हे सुनकर आपका ज्ञानवर्धन तो कुछ होगा नहीं बल्कि ये आपको कन्फ्यूज जरूर कर देंगे। उधर  यूजीसी समर्थन में प्रोटेस्ट कर रहे पांच हजार साल से प्यासे लोगो के बीच पहुँचे एक पत्रकार का इंटरव्यू वायरल हों गया।
पत्रकार – आप यहां संविधान की प्रति के साथ प्रदर्शन कर रहे है, आपके आदर्श कौन है…?
वामपंथी – हमारे आदर्श पेरियार और अंबेडकर है, हम संविधान को बचाने आए हैं ।
पत्रकार – पेरियार ने 26 नवंबर 1957 को संविधान की प्रति जलाई थी, ये कहकर कि ये संविधान दलित विरोधी है….? क्या आप इसके बाद भी पेरियार के साथ है ?
वामपंथी – नहीं आप समझे नहीं, ये वह मामला नहीं है, ये सवाल ही हमारा शोषण है, हमे चाहिए आजादी  ! तभी से वह पत्रकार सदमे में है और तभी बैंक ग्राउंड में एक म्यूजिक गूँजता है कि :- छोड़ा राजा दुबई सम्भारा मोर जवानी” और इसके बाद ही फेमस मोनुवादी बिरहा गायक रूचि यादव गिरफ्तार हो गई। अब अर्द्धजनरल वाले ओबीसी का कागज बना के विधायक तक बन जा रहे हैं। जी हाँ यह तो मियां का रिवाज़ हैं तो इसको लेकर हम बवाल नहीं काटेंगे। गलती से तिवारी, शुक्ला,राजपूत टाइटिल वाला यह कर रहा होता तो कल तड़के लछुमन टाईप पेरियार समर्थक तमाम बहुजन चिंतको के साथ गोष्ठी आयोजित कर देते। एक और मिशाल पेशे खिदमत है कि  एक नॉन ब्राह्मण प्रोफेसर पर एक सज्जन और डिसेंट समाज के छात्र ने हाइड्रोसिल एक्ट लगवा दिया।
पुलिस ने विवेचना की और पाया कि उसको जाति सूचक की जगह नीच शब्द बोला गया था।राजस्थान हाई कोर्ट ने बड़ी मजम्मत के साथ खड़े – खड़े शब्दों में निंदा करते हुए हाइड्रोसिल एक्ट लगवाने वाले छात्र को चेतावनी दी और कहा नीच जाति सूचक शब्द नहीं होता और मैंने भी कहा सुनने की आदत डाल लें बेटवा काहें से अब तुझे आगे संसद में डकैत बनना है । उधर एक अन्य मामला जिसमें एचडीएफसी बैंक के आस्था सिंह बवाल में पहले पुरुष ने पुरुष होने का धौंस दिखाया। फिर स्त्री अपना आपा खो बैठी और उसने अपनी जाति का नाम लेकर ही सही उस पुरुष को हड़काया तो सही। इसमें गलत क्या हैं ? हम लोग या भारत रत्न बाबा साहब अंबेडकर भी तो यही चाहते थे कि स्त्रियां सशक्त बने। आज इसने आवाज उठाई तो बकलोल मूर्ख इसको ट्रोल कर रहे हैं। क्या गलत कहा इसने ? अपनी जाति का नाम लेना कब से गलत हो गया ..? तुम लोग भी तो गर्व से अपनी जाति का नाम लेते हो। आजकल एक अजीब ट्रेंड चल पड़ा है समाज में… कुछ लोग अभी भी मान बैठे हैं कि अगर अमीर दलित के घर उसका बेटा पैदा हुआ तो वह जन्म से शोषित और वंचित माना जायेगा भले वो चंद्रशेखर रावन का लईका हों पर ब्राह्मण का बेटा पैदा हुआ तो वह जन्म से ही पूजनीय घोषित ना होने पाए।
अब सवाल यह उठता है कि जन्म से ही अमीर दलित  का बेटा शोषित और वंचित कैसे होता है ? क्या गरीब ब्राह्मण धरती पर सिर्फ मजदूरी करने, आदेश सुनने और अपमान झेलने के लिए पैदा हुआ है ? खेसारी ने ब्राह्मण बच्चे के पैर छू लिए तो क्या पहाड़ टूट पड़ा ! जनता अब सिर्फ गाना नहीं सुनती, बातें भी सुनती है और समझती भी है । राजनीति और समाज दोनों जगह एक बात याद रखिए, जनता तालियाँ तो बजा देती है, लेकिन अपमान याद रखती है। शायद यही वजह रही कि जिस जनता ने दलित राजनीति के नेताओं को सिर पर बैठाया, उसी जनता ने फटका भी जड़ा और जमीन भी दिखा दी। लोकतंत्र का यही मज़ा है… यहाँ स्टेज पर स्टार होना और जनता के दिल में जगह होना दो अलग बातें हैं। हमारा समाज बड़ा अजीब है। यहाँ कुछ बच्चों के पैर छूने में लोग पुण्य खोज लेते हैं, लेकिन उसी समाज में मजदूर के बच्चे से दिनभर काम करवाकर उसका पैसा देने में हाथ काँप जाता है।
मंदिरों में बराबरी की बातें होती हैं, संविधान की शपथ ली जाती है, लेकिन व्यवहार में जाति का चश्मा अभी भी आँखों पर चढ़ा रहता है। विडंबना देखिए… जो लोग अंधविश्वास और पाखंड को संस्कृति का नाम देकर बेच रहे हैं, उनके बच्चे सम्मान की कुर्सी पर बैठाए जा रहे हैं। और जो बच्चे अपनी मेहनत से जिंदगी बनाना चाहते हैं, उन्हें समाज बार-बार याद दिलाता रहता है कि उनकी औकात क्या है।लेकिन इतिहास गवाह है  जब-जब समाज ने किसी वर्ग को दबाने की कोशिश की है, तब-तब वही वर्ग बदलाव का कारण बना है। अब वक्त बदल रहा है। नई पीढ़ी जाति से ज्यादा काबिलियत की बात कर रही है। सम्मान अब वंश से नहीं, व्यक्तित्व से तय हो रहा है। सच कड़वा होता है पर सच यही है कि समाज अब जाग रहा है। लोग अब यह समझने लगे हैं कि पूजा जन्म की भी और  कर्म की भी होनी चाहिए। क्योंकि अगर समाज ने बराबरी नहीं सीखी, तो वह खुद अपनी जड़ों को कमजोर करता रहेगा।याद रखिए  जनता कलाकार को स्टार बना सकती है, नेता को सिंहासन दे सकती है, लेकिन अगर वही जनता ठान ले तो स्टार को स्टेज से और नेता को कुर्सी से उतारने में देर नहीं लगती।
उधर रुचि यादव को गिरफ्तार कर लिया गया है जबकि दुर्भाग्य हैं कि नेहा सिंह राठौर गिरफ्तार नहीं हुई । सपा प्रवक्ता मनोज यादव को दलित महिला उत्पीड़न में एसटीएफ उठा लें जाती है पर रोहणी घावरी आरोपों का रावन के सेहत पर कोई असर नहीं।  इस तरह के गिरफ्तारी पर किसी भी अभिव्यक्ति के रखवालों की तरफ से कोई टिप्पणी नहीं हुई हैं वैसे होगी भी नहीं। अगर मुझे बोलने का हक चाहिए तो सामने वाले को भी उतना ही हक चाहिए। बीते दिनों यूजीसी एक्ट के मसले पर मेरे फेसबुक पर तमाम संविधान को मानने वाले गण यूजीसी एक्ट का विरोध करने पर मुझको गालिया और ट्रोल कर रहे थे। किसी ने उस एक्ट के दुरुपयोग होने पर उस लूप हॉल पर कोई बात नहीं की। ये भी चाहते हैं सवर्णों के बच्चे झूठे आरोपों में जेल जाये।
लेकिन हम हमने ना लाल टोपी पहनी हैं ना ही नीली । किसी के भी साथ अन्याय होगा या किसी पूर्वाग्रह के आधार पर किसी बेगुनाह को फसाया जाएगा तो हम उसके लिए आवाज जरूर बनेंगे। अगर किसी नेता की आलोचना मात्र से जेल होने लग जाए तो फिर जनता का काम मात्र वोटर भर बनकर रह जाएगा। मेरे गांव की सड़क अखिलेश यादव के राज में भी नहीं बनी ना योगी जी के दस वर्ष के शासन में बन पाई। क्या मेरे पास इतना भी अधिकार नहीं जो इस हील हवाली को लेकर इन दोनों की आलोचना कर सकू ? व्यंगिस्तान में आपका स्वागत है।
पंकज सीबी मिश्रा, राजनीतिक व्यंग्यकार और पत्रकार जौनपुर, यूपी

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