नेतागिरी की दुकान चलानी है, इसलिए गंगा ना नहाने की ठानी है …! 

महाकुंभ में एक से एक बयानबाजी और नेताओं के बड़बोलेपन ने मान अपमान का एक नया शिगूफा छोड़ रखा है । इनको चुप रहने की नसीहत देना किसी भी दल द्वारा मुश्किल काम लग रहा है, लेकिन आज के  समय में जब हर व्यक्ति के हाथ में फोन है , कैमरा है और हर व्यक्ति के पास अभिव्यक्ति की आजादी का दोहरा प्लेटफॉर्म उपलब्ध है, तो किसी को भी चुप रहने के लिए कहना और भी मुश्किल काम हो गया है। आज जब हर व्यक्ति ही अपने को दलितों का नेता दिखा रहा और किसी न किसी रूप में खुद को पीडीए का हिमायती अभिव्यक्त कर रहा है तो जातिवादी नेता तो इसे अपना परम पुनीत कर्तव्य मानते हुए गंगा मैया को तरजीह देने से रहे और गंगा ना नहाकर खुद को असली पीडीए नेता साबित करने की होड़ लगाए बैठे है । फिर भी कुछ बातों पर नेताओं को या सार्वजनिक जीवन में जो भी लोग हैं उनको चुप रहना चाहिए। महाकुंभ के मामले में नेताओं को मुंह बंद रखने की नसीहत मैं भी देता हूं और यही नसीहत देते हुए पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने अपनी  किताब ‘संसद में तीन दशक’ में कुछ जरूरी सलाह लिखी थी । कई बार चुप रहना नेता को ज्यादा समझदार दिखाता है और बोलना या तो उसकी मूर्खता को जाहिर करता है जिसके प्रत्यक्ष उदाहरण वर्तमान के नेता / नेतृ पुत्र है जिन्हे यह तक नहीं पता कि पिता जी की मूर्ति लगा भर देने से उनकी पूजा नहीं होगी और यह उनकी आत्मघाती नेतागिरी को प्रकट करता है। महाकुंभ का मामला भी ऐसा ही कुछ है। इस पर नेताओं को कुछ भी बोलने से पहले सौ बार सोचना चाहिए। चाहे चंद्रशेखर आजाद हों या शीला मंडल हो या अखिलेश यादव हो , उनके कहने का एक मतलब यह भी है कि उन्होंने कोई पाप नहीं किया है
इसलिए उनको गंगा नहाने जाने की जरूरत नहीं है। ऐसा मानने वाले बहुत से और लोग भी होंगे। गंगा पापनाशिनी और मुक्तिदायिनी मानी जाती हैं। कहा जाता है कि गंगा नहाने से पाप धुल जाते हैं। पाकिस्तान के मशहूर गायक अताउल्ला खान के गाने की एक लाइन है, ‘पारस बन रहे हैं वो ऐसे, जैसे गंगा नहाए हुए हैं’। सोचें, पाकिस्तान के पूर्वी पंजाब के छोटे से सेराएकी इलाके से आने वाला एक गायक कह रहा है कि कोई पाक साफ होने का दावा ऐसे कर रहा है, जैसे गंगा नहाया हुआ हो।लेकिन ऐसे तमाम लोग हिंदू धर्म में गंगा स्नान के सूक्ष्म विचार को ही नहीं समझ रहे हैं। वे यह भी नहीं समझ रहे हैं कि यह विचार हर धर्म में किसी न किसी रूप में मौजूद है कि अगर किसी ने मनसा, वाचा या कर्मणा कुछ गलत किया है तो उसे स्वीकार करे और उससे मुक्ति के प्रयास करे। ईसाई धर्म में तो हर गिरिजाघर में अपराध स्वीकारोक्ति का कमरा बना होता है। जैन धर्म के लोग जाने अनजाने में हुई गलतियों के लिए क्षमा मांगते ‘मिच्छामी दुक्कडम’ बोलते हैं। उसी तरह से हिंदू लोग गंगा स्नान करते समय हे गंगा मैया मेरे सारे पाप हर लें बोलते हैं। उनका गंगा स्नान मनसा, वाचा कर्मणा जाने अनजाने में हुई गलतियों के प्रायश्चित के लिए है। इसका सूक्ष्म अर्थ मन की शुद्धि से जुड़ा है। यह भी ध्यान रखने की जरूरत है हिंदू धर्म में कर्म फल से मुक्ति का कोई मार्ग नहीं है। बहरहाल, मामला महाकुंभ का हो या उर्स और जियारत का वह विशुद्ध रूप से लोगों की आस्था से जुड़ा होता है और इसलिए उस पर अनर्गल बयान देना कोई समझदारी की बात नहीं होती है। आज नेता के पास सिर्फ वाणी है, जिसका इस्तेमाल वे कुछ भी बोलने के लिए करते हैं। आज यह कहने की जरेरत इसलिए पड़ रही है क्योंकि महाकुंभ और गंगा में डुबकी लगाने को लेकर तीन नेताओं के ऐसे बयान नजर के सामने से गुजरे हैं, जो पूरी तरह से गैरजरूरी थे और अगर वो बयान नहीं दिए जाते तो देश और समाज की स्थिति में रत्ती भर भी फर्क नहीं आने वाला था। सबसे पहले आजाद समाज पार्टी के नेता चंद्रशेखर आजाद ने कहा कि पाप धोने के लिए लोग संगम में डुबकी लगाने जाते हैं। यह भी कोई नई या अनोखी बात नहीं है ? लेकिन जिस अंदाज में यह बात कही गई वह अपमानजनक है।  यानी गंगा नहाना पाक साफ होना है। कहने की जरूरत नहीं है कि चंद्रशेखर आजाद के हजारों समर्थक भी हो सकता है कि संगम पर डुबकी लगाने गए होंगे। लेकिन अपनी क्रांतिकारिता दिखाने के लिए उन्होंने यह लाइन बोली कि पाप धोने लोग महाकुंभ में जाते हैं। वे महाकुंभ को कमतर करके दिखाने का दयनीय प्रयास कर रहे थे। लगभग ऐसा ही कुछ बयान बिहार सरकार की मंत्री शीला मंडल ने दिया है। पिछले दिनों प्रशांत किशोर ने अपना आमरण अनशन खत्म करने से पहले गंगा में डुबकी लगाई और हवन करने के बाद अनशन समाप्त करके सत्याग्रह शुरू किया तब शीला मंडल ने कहा कि जो लोग पाप करते हैं वे ही गंगा में डुबकी लगाते हैं। प्रशांत किशोर को निशाना बनाने के और भी कई तरीके हो सकते थे। उनके कई काम हैं, जिनको लेकर उनके खिलाफ वस्तुनिष्ठ तरीके से आरोप लगाए जा सकते हैं। लेकिन उनके गंगा में डुबकी लगाने को लेकर उन पर हमला करना राजनीतिक रूप से नुकसानदेह साबित हो सकता है और सामाजिक रूप से भी एक बड़े तबके की भावना को आहत करने वाला है। ध्यान रहे हर हिंदू मानता है कि गंगा में नहाने से पाप धुलते हैं लेकिन इसका मजाक बनाया जाना या इस आधार पर किसी को अपमानित करना उसको पसंद नहीं आएगा।

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