जहाँ शिव हैं वहाँ नन्दी भी हैं,और जहाँ नन्दी हैं वहाँ शिवजी भी हैं। नन्दी धर्म का प्रतीक और शिव का अर्थ कल्याण है अतः इसका सीधा सा अर्थ यही हुआ कि जहाँ धर्म है वहाँ शिव (कल्याण) भी हैं अथवा जहाँ शिव हैं वहीं धर्म भी है। शिवजी का वाहन वृषभ है वृषभ को धर्म का स्वरूप कहा जाता है अर्थात् शिवजी धर्म की सवारी करते हैं, जीवन के उत्थान एवं मंगल के लिए हमारे जीवन में धर्म की अत्यधिक आवश्यकता है। पशु तब तक ही सही दिशा में चलता है जब तक उसके ऊपर लगाम होती है। पशु को लगाम से एवं मनुष्य को धर्म से ही नियंत्रित किया जा सकता है। जबतक मनुष्य के ऊपर धर्म की लगाम नहीं लगती तब तक मनुष्य का कल्याण नहीं हो सकता।
अपनी जीवन ऊर्जा का कब, कहाँ और किस रुप में उपयोग करना है यह धर्म हमें सिखाता है, ज्ञानी व्यक्ति अनासक्त भाव से कर्म करने के कारण कर्म के बन्धन में नहीं फँसता। भगवान भोलेनाथ का जीवन हमें बताता है कि जो भी करो धर्म का अवलम्बन लेकर ही करो जिससे हमको कर्मबंधनों से मुक्ति मिल सके तथा यह मानव जीवन सफल हो सके। उक्त बातें श्री बज्रांग आश्रम देवली प्रतापपुर के संचालक एवं विहिप जिला गंगापार के वेद एवं संस्कृत प्रमुख आचार्य धीरज “याज्ञिक” ने प्रतापपुर के वारी बरियांवा गांव में श्रावण मास की महत्ता के अंतर्गत एक धार्मिक गोष्ठी में कही।
इस अवसर पर आचार्य बरमदीन तिवारी, पंडित त्रिवेणी तिवारी, विजय पाण्डेय, केंद्रीय विद्यालय के अवकाश प्राप्त प्रवक्ता लोलारख नाथ उपाध्याय, चंद्रकांत तिवारी, पिन्टू, आचार्य सूर्यकांत तिवारी, मुकेश, आचार्य चंद्रभूषण तिवारी, जीतनारायण शुक्ल, शिवांग तिवारी, कान्हा तिवारी, अभिनव शुक्ल आदि लोग उपस्थित रहे।
