पूरे सप्ताह की पड़ताल ; नोटबंदी, केरला स्टोरी, बागेश्वर धाम और पहलवानों की हड़ताल  ..!

पंकज कुमार मिश्रा मीडिया कॉलमिस्ट शिक्षक एवं पत्रकार केराकत जौनपुर
बीते एक सप्ताह में क्या कुछ घटा उसे जानने और समझने के लिए अब आप लगातार पड़ताल नामक मेरा ये कॉलम पढ़ सकते है । पहले ड्रामा  शुरू हुआ सुप्रीम कोर्ट के दिए उस फैसले से जिसमें दिल्ली के एलजी को प्रशासनिक अधिकारी के नियुक्ति और स्थानांतरण को एक तरह से अवैध कह कर गेंद केजरीवाल के पाले में डाल दी गई पर तुरंत बाद भाजपा ने नहले पर दहला मारते हुए अध्यादेश लगाकर निर्णय को उलट दिया । दूसरा पड़ताल  बिहार के इंट्रेस्टिंग लालू पुत्र तेजप्रताप यादव से जुड़ा है  जिनका दारू सप्लायर संघ के नाम से वायरल हो रहा डीएसएस ने बाबा बागेश्वर धाम को पटना आने से रोकने के लिए काफी स्टंट बाजी की पर बाबा आए ,छाए और बिहार में हुंकार भर निकल भी गए ।
तीसरा पड़ताल कर्नाटक चुनाव के बाद सीएम के कुर्सी को लेकर होने वाले उठापटक को लेकर थी जिसमे आखिर डीके शिवकुमार को अगला पायलट बनने पर मजबूर कर दिया गया । चौथी पड़ताल दिल्ली के जंतर मंतर पर पहलवानों के धरने को लेकर है जिसमे उनकी स्थिति अब आ बैल मुझे मार वाली हो गई है और अब लग रहा ये पहलवान किसी काम के नही बचेंगे और इनके साथ माया मिली न राम वाली स्थिति होगी और सप्ताह के अंत में आखिरी पड़ताल दो हजार के नोट को बैंको में तत्काल बदले जाने से मची खलबली को लेकर जहां बड़े धनाडय छटपटा रहे और छोटे मोटे लोग मजे से चटकारे ले रहे । लेकिन आप डरो नहीं ईमानदार केंद्र सरकार में अभी और अजूबे शामिल हैं जिससे बेईमान और भ्रष्टाचारी अभी और शोर मचाएंगे , दो हजार के नोट बंद करके सरकार ने एक बार फिर भ्रष्टाचार पर नकेल कसने की पहल की है , आतंकवाद की कमर तोड रही है, पाकिस्तान से आने वाले नकली नोटों को रोक रही है ।घबराओ नहीं अब इससे बड़ा नोट  जारी नही है हो  सकता है विपक्ष के पास हो जो वह सिर्फ उन लोगों को दे  जो पीएम केयर में दान नही  देंगे पर हिसाब लेंगे , उनके पार्टी फंड में आईएसआईएस के दिए  इतने नोट हो गये हैं कि रखने की जगह नहीं थी और अब यह नोटबंदी सुनकर झटपटा रहे ।
देश के अस्सी करोड़ लोगों को पिछली नोटबंदी के बाद सुकून मिला था और 40 करोड़ लोग एजेंडे के तहत फटी जेब दिखाकर रोते देखे गए । जब पिछली सरकारों ने उन्हें पांच किलो राशन के लायक बनाया गया था अब उसमें वृद्धि का समय आ गया है क्योंकि बिना गरीबी के राष्ट्रवाद नष्ट हो रहा है लोग दूसरे दलों को वोट देने लगें हैं। विश्वास रखो इससे बर्बाद होते विपक्ष में अनेक पब्लिक डिसीजन को बदनाम करने।  में मदद मिलेगी, जिन राज्यों में चुनाव बाकी है वहां भाजपा की सरकार नहीं है, वहां की गैर राष्ट्रवादी सरकारों ने दो हजार के नोटों का जखीरा इक्कठा कर लिया है उसे हमारे खिलाफ उपयोग से रोकने में मदद मिलेगी और आखिरी बात हमने पेट्रोल के बदले रुस को दो हजार के करोड़ों नोट दिए हैं अब वो बदलवाने कहां जाएगा, हमें चमका रहा था कि रुपये में पेट्रोल नहीं देगा, अब बता रुपया किसको देगा। फिर बता रहा हूं इस बार 127 दिन बाद यह फैसला गलत लगे तो किसी चौराहे पर नहीं आऊंगा, तुमको सड़क पर ला छोड़ा है अब भुगतो।
उधर एक मुख्य पड़ताल में  सुप्रीम कोर्ट ने तीन फैसले दिए और इन तीन फैसलों के कारण लेफ्ट लिब्रल, कांग्रेस और वामपंथियों के पिछवाड़े में बहुत जोर का दर्द हो रहा है। उनको लग रहा है कि ये तीनों फैसले सरकार के पक्ष में है। इन देशद्रोहियों का रोना गलत भी नहीं है क्योंकि यह हमेशा से मानते आए हैं कि सरकार भले ही किसी की भी हो लेकिन सिस्टम हमारा है।  अगर आप कोर्ट के इन फैसलों के बारे में गहराई से विचार विमर्श करेगें तो आप पाएंगे कि ये फैसले सरकार के बजाय हिंदुस्तान के पक्ष में हैं, देश की संस्कृति धरोहर के पक्ष में हैं और देश में जो भी अच्छा हो रहा है उसके पक्ष में है। आइए सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए इन फैसलों का सनातन की दृष्टि से विश्लेषण करते हैं ।
पहला फैसला आया है द केरल स्टोरी मूवी के बारे में,दरअसल पश्चिम बंगाल सरकार ने इस मूवी पर रोक लगा दी थी और तमिलनाडु सरकार ने अप्रत्यक्ष रूप से थिएटर मालिकों को इसे ना दिखाने को कहा था जिसके बाद इन दोनों राज्यों में यह फिल्म दिखानी बंद कर दी गई थी। फिल्म के निर्माता इस रोक के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में गए। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा है कि इस मूवी पर बैन गैर कानूनी है। कोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा कि पश्चिम बंगाल सरकार द्वारा लगाए गए बैन को हम स्थगित करते हैं और तमिलनाडु सरकार को आदेश देते हैं कि थिएटर मालिकों को सुरक्षा प्रदान करें ताकि लोग फिल्म को देख सकें। कोर्ट ने कहा कि अगर किसी राज्य सरकार को लगता है कि इस तरह की फिल्म से कानून व्यवस्था खराब हो सकती है तो यह राज्य सरकार की जिम्मेदारी है कि वह कानून व्यवस्था को बना कर रखे।सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश के बाद वामपंथी गैंग इसे अपने मुंह पर एक तमाचे की तरह देख रहा होगा। सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश के बहुत ही दूरगामी परिणाम होंगे और भविष्य में हिंदुओं के उत्पीड़न पर और भी ज्यादा मूवी बनाई जाएंगी। सुप्रीम कोर्ट के इस स्पष्ट आदेश के बाद भविष्य में वामपंथी गैंगों को इस तरह के मामलों में अदालतों से किसी भी तरह की राहत नहीं मिल पाएगी।
सुप्रीम कोर्ट का दूसरा फैसला आया है तमिलनाडु में होने वाले जलीकट्टू और महाराष्ट्र में होने वाली बैल गाड़ी की दौड़ पर। यह दोनों सनातनी परंपरा के त्यौहार हैं परंतु इन पर बार-बार बैन लगाने की कोशिश होती रही। 2011 में कांग्रेस सरकार के समय जयराम रमेश ने जलीकट्टू पर बैन लगा दिया। 2016 में नरेंद्र मोदी की सरकार ने इसको फिर से अनुमति दे दी परंतु सुप्रीम कोर्ट ने उस पर स्टे लगा दिया। सुप्रीम कोर्ट के सटे के बाद तमिलनाडु की एआईडीएमके सरकार पर केंद्र सरकार के दबाव डाला। इसके बाद तमिलनाडु की सरकार इस सटे के खिलाफ ऑर्डिनेंस लेकर आई लेकिन कोर्ट ने नही माना। जिस सुप्रीम कोर्ट ने जलीकट्टू पर बैन लगाया था और तमिलनाडु सरकार के ऑर्डिनेंस को भी नहीं माना था आज वही सुप्रीम कोर्ट कह रहा है कि जलीकट्टू देश की सांस्कृतिक धरोहर का मामला है इसलिए इस पर प्रतिबंध नहीं लगाया जा सकता।
यह फैसला सुप्रीम कोर्ट की 5 जजों की संविधान पीठ ने दिया है। इसी तरह महाराष्ट्र में होने वाले बैलगाड़ी खेल को भी संस्कृतिक धरोहर का मामला बताते हुए सुप्रीम कोर्ट ने किसी तरह का प्रतिबंध लगाने से इनकार कर दिया। क्या अब से पहले आपने सुप्रीम कोर्ट के किसी फैसले में यह देखा या सुना था या फिर सुप्रीम कोर्ट ने अपने किसी फैसले में सांस्कृतिक धरोहर को बचाने की बात कही हो, उसके संरक्षण की बात कही हो और फिर न्यायिक दखलअंदाजी की बात कही हो। सुप्रीम कोर्ट का तीसरा फैसला आया है बिहार सरकार की उस याचिका पर जिसमें पटना हाईकोर्ट ने बिहार में करवाई जा रही जातीय जनगणना पर रोक लगा दी थी। बिहार सरकार कोई काम करने की बजाए लोगों को जातियों में उलझाना चाहती है ताकि सरकार को वोट मिल सके।
इसलिए सरकार बिहार में जाति आधारित जनगणना करवा रही है। पहले बिहार सरकार ने बार-बार केंद्र सरकार से कहा कि जातीय जनगणना करवाई जाए लेकिन जब केंद्र सरकार ने इसमें कोई रुचि नहीं दिखाई तो खुद ही बिहार में जातीय जनगणना करवाने लगे।संविधान के अनुसार देश में जनगणना करवाने का अधिकार केंद्र सरकार के पास है और हर 10 वर्ष बाद गृह मंत्रालय के द्वारा जनगणना करवाई जाती है लेकिन बिहार सरकार ने अपने आप को सुप्रीम मानते हुए जाति आधारित जनगणना शुरू करवा दी जिस पर पटना हाईकोर्ट ने रोक लगा दी थी। अब बिहार सरकार इस रोक को हटवाने के लिए सुप्रीम कोर्ट में गई थी जिसे सुप्रीम कोर्ट ने हटाने से मना कर दिया।

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