ना धन से जाइए, ना धर्म से जाइए….

पंकज सीबी मिश्रा /राजनीतिक विशलेषक एवं पत्रकार जौनपुर यूपी
पिछला वर्ष खत्म होते- होते देश की राजनीति में भूचाल की उम्मीद पाले बैठे दिग्गजों के माथे पर बल पड़ना लाजमी है । जिस बिहार ने  प्रथम राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद और जयप्रकाश नारायण से लेकर आज तक कई अच्छे और अव्वल दर्जे के ताकतवर नेता दिए उसी बिहार में लालू युग से भ्रष्ट राजनीति की शुरुआत हुई और बिना लालू बिहार की राजनीति बेस्वाद ही मानी जाएगी । यूपी की भांति बिहार से भी कांग्रेस के संपूर्ण पतन के बाद एक लम्बे अरसे से लालू और नीतीश बिहार राजनीति की धुरी बने हुए हैं । और अब नीतीश बाबू तो बाकायदा पलटू चाचा का टाइटल हासिल किए बैठे है सोशल मीडिया पर। तो अब तक के छोटे बड़े बदलावों से गुजर रहे बिहार को जंगलराज से मुक्त करने के लिए धन और धर्म दोनों बचाने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगाना होगा और इसके लिए बड़ा पासा फेंका गया जिसमें धन जाए ना धर्म जाए।
बात नहीं समझ आयी तो ये बयान पढ़िए ..
               
बिहार में एनडीए से अगला  मुख्यमंत्री कौन होगा यह चुनाव के बाद तय करेंगे – अमित शाह
नीतीश कुमार के दिल में प्रधानमंत्री बनने की ललक तो है पर एनडीए का मोह भी है । इसी उहाफोह में वो अब भी खुद को बेरुखी की तरफ तेजी से नहीं मोड़ पा रहे। कभी ममता बनर्जी भी इसी संगठन की एक मजबूत स्तम्भ हुआ करती थी पर उनकी ललक पीएम बनने की नहीं सीएम बनने की हवस थी जो स्वाभाविक भी है । इतनी लम्बी राजनीति करने के बाद ऐसा होता ही है । इसी लालसा में उन्होंने विरोधी दलों को एक मंच पर लाने का सफल बीड़ा उठाया था । वह तो राहुल गाँधी को प्रधानमंत्री बनने की हवस में खड़गे इंडी गठबंधन के स्वयंभू अध्यक्ष बन बैठे । अन्यथा नीतीश  फिर से एनडीए में नहीं जाते । खैर ! बात आज की करें तो नीतीश की नाराजगी समझ आती है । यदि उन्हें लगेगा कि बीजेपी उन्हें फिर से सीएम बनाने में साथ नहीं देगी तो निश्चय ही वे साथ छोड़ सकते हैं ।
अब ये बयान पढ़िए…
नीतीश यदि राजद के साथ आएं तो उनका स्वागत करेंगे – लालू
राजद और इंडी गठबंधन के लिए  नीतीश के दरवाजे बंद – तेजस्वी
जानते हैं कि बीजेपी आसानी से नीतीश को नहीं जाने देंगे देगी और गठबन्धन उन्हें पीएम बनने दे ऐसा करेगी नहीं । आखिर उन्हें भी तो चलानी है केन्द्र सरकार ? बिहार में फिर से लालू का जंगलराज न आए इसके लिए नीतीश को सीएम बनाए रखना बीजेपी की मजबूरी है । बीजेपी को मलाल है कि वह बिहार में कभी अकेले दम पर सरकार नहीं बन पाई । यह सच है कि अगली बार भी नहीं बना पाएगी । अतः सब खत्म हो जाए , उससे पहले साफ साफ कहिए कि नीतीश ही बिहार के अगले मुख्यमंत्री होंगे ।भ्रष्टाचार के कूप में तलहटी तक डूबे लालू यादव यदि आज प्रासंगिक हैं तो सुशासन बाबू के नाम से नीतीश कुमार की ईमानदारी भी कम प्रासंगिक नहीं है । बस नीतीश में एक कमी है । उन की राजनीति बड़ा चंचल और चलायमान है ।सत्ता में बने रहने के लिए उन्हें पाला बदलने में कोई संकोच नहीं । तभी तो दस वर्षों में वे पांच बार यूपीए और एनडीए में आते जाते रहते हैं । नीतीश कुमार लम्बे अरसे से अटलजी के भक्त रहे , उनकी सरकार में प्रमुख मंत्री पद भी संभाले हैं , लेकिन मन की चंचलता और कुर्सी की ललक कभी उनका पीछा नहीं छोड़ती । तभी तो आज फिर गर्मागर्म चर्चाओं में हैं ।
पर ये बयान कुछ और कह रहा..
हम एनडीए में हैं और इसी गठबंधन में रहेंगे – लल्लन सिंह
इस नए साल 2025 में दो विधानसभाओं के चुनाव होने हैं । दिल्ली के चुनाव आरंभिक महीनों में हैं और बिहार के चुनाव वर्षान्त में । दिल्ली चुनाव का घमासान शुरू हो चुका है , अधिसूचना कभी भी जारी हो सकती है । दिल्ली छोटा राज्य है , आधा अधूरा राज्य है । लेकिन बिहार बड़ा राज्य है , अनेक मामलों में संवेदनशील भी है । बिहार सदा ही राष्ट्रीय राजनीति के केन्द्र में रहा है । सच कहें तो आजादी से पहले भी और बाद में भी राजनीति का तमाम ग्लैमर यूपी बिहार से ही आया है । हिन्दी भाषी सशक्त राजनैतिक बैल्ट की रीढ़ है बिहार । यूपी बिहार की राजनीति में ऐसे नेताओं का वर्चस्व रहा है जो दलित और पिछड़े वर्ग की राजनीति ईमानदारी से करते है और सवर्णों का भी सम्मान करते है ।

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