इंडियन एक्सप्रेस की किसी महिला पत्रकार ने विपक्ष के लिए काफ़ी मेहनत करके एक रिपोर्ट बनाई, और उसमें खुलासा किया है कि चुनाव आयोग के दो अधिकारियों ने बहुत बार अपनी नाखुशी ज़ाहिर की थी मुख्य चुनाव अधिकारी को और लिखित में अपना प्रतिरोध ज़ाहिर किया था और ज्ञानेश कुमार ने अपनी मनमर्जी चलाई। फॉर्म 6 बदल दिया और चुनावों में धांधली हुई। उधर फील्डिंग सेट थी, कॉकरोच के अभिजीत दीपके और लेफ्टिस्ट नेहा बोरा को पहले से सूचना दे दी गईं थी की ज्ञानेश कुमार को घेरा जायेगा क्यूंकि चुनाव से पहले ही यदि चुनाव आयोग को खा लिया जाए तो जनता कंन्फ्यूज हो जाएगी और सत्ता मिल सकती है। ऐसे में राहुल की गट फीलिंग कह रही की वोट चोरी हुई है, उधर वादे का रकम तथाकथित पत्रकारनी महोदया तक पहुंचा भी दी गईं होगी पर अब एजेंडा सेट है, अफवाह फैलाना था कि एसआईआर में किस प्रकार जान बूझ कर लोगों को वोट देने से मना किया गया ताकि बीजेपी को फ़ायदा मिले और जनता सोचे की भाजपा टेम्परिंग कर रही । पूरा विपक्षी गैंग बधाई की पात्र हैं। लेकिन मेरा सवाल ये है कि टिंन्नू यादव की चोरी और इंडियन एक्सप्रेस की बरजोरी की खबर सबसे पहले विपक्ष को ही कैसे मिला ?
क्या टिंन्नू और टिन्नी विपक्ष द्वारा प्लांट की गईं ! दोनों को बलि का बकरा क्यों स्वीकार हुआ और विपक्ष से कितने रूपये में डील हुई होगी ? कैसे दे दी कि इसे छापा जाए। पिछले बारह वर्षों में हमने प्रेस को रेंगते देखा है फिर अचानक से तो ये बहादुर नहीं हो जाएँगे ना ! राहुल गांधी इस मुद्दे को कई महीनों से उठा रहे थे। और राहुल गांधी हवा में तीर नहीं चलाते, पहले अपने तीर पर झूठ का पुलन्दा सेट करते है कुछ दिन हवा बनाते है फिर कोर्ट की डांट सुनते है और माफ़ी मांग लेते है। इतना तो मुझे समझ आ गया है। मैं उनके कई नीतियों और उनकी पार्टी की कई नीतियों से सहमत नहीं होता लेकिन राहुल गांधी एक अच्छे नेता हैं, ये मैं नहीं मानता हूँ। निर्वाचन आयोग और भाजपा पर इल्जाम के तर्क इतने खोखले और बचकाने हैं कि दस साल का बच्चा भी इन्हें सुनकर हंस देगा ! इससे ज्यादा तर्कसंगत बातें तो आजकल बच्चे करने लगे हैं । आखिर तीन सदस्य वाली टीम में किसी भी निर्णय और पेपर वर्क में तीनों का सिग्नेचर होता है फिर अकेले ज्ञानेश कुमार ही क्यों निशाने पर ? क्यूंकि सैम पितरोदा की फील्डिंग कभी परफेक्ट प्लान से सेट नहीं होता और राहुल पप्पुगिरी के लिए बदनाम है ऊपर से नाकारे कॉकरोच रूपी आपिये भी इस बार जोश में है तो विपक्ष को लगा होगा मौका अच्छा है पर मुझे पता है इस बार राहुल दीपके गैंग को लें डूबेंगे।
एक वायरल नोटिस के अनुसार आयोग ने माना है कि दस महीने में 14 बार दो चुनाव आयुक्तों ने अपनी असहमतियां दर्ज करवाई हैं मगर उसका कहना है कि असहमतियां तो निर्णय प्रक्रिया का अंग हैं। फिर इसे धांधली से जोड़ने की क्या मंशा ! उधर भाजपा के प्रवक्ता संबित पात्रा और सुधांशु त्रिवेदी ने जो बयानों से धागे खोले है विपक्ष के उसपर विपक्ष कारहता नजर आ रहा। सरकार से असहमति का होना तो जीवंत लोकतंत्र का प्रमाण है लेकिन चुनाव आयोग से असहमत होना केवल लगातार हार की खीज है। इनसे पूछिए कि पिछले बारह सालों में असहमति का सम्मान होते कब देखा है ?उल्टे असहमति प्रकट करने वालों का चरित्र हनन किया गया है। उन्हें भद्दी भद्दी गालियां दी गई हैं। गोदी मिडिया कहना क्यों शुरू किया ! और अब मिडिया का अहम जाग गया तो फिर मिडिया के ही कंधे पर बन्दुक रख विपक्ष चुनाव आयोग पर फायर कर रहा। संसद में तो छोड़िए विपक्ष के अंदर असहमति है। अपने सीनियर नेता के सम्मान का कोई एक उदाहरण है ? क्या एक भी ऐसा नेता है,जो युवराज के फिलिंग से असहमति जताकर एक दिन भी पार्टी में रह सकता है ? असहमति जीवंत लोकतंत्र का प्रतीक तब होती है,जब उसका सम्मान हो? यहां तो असहमति को कुचल कर ही बाहर विदेशों से निर्णय लिए गए हैं। ज्ञानेश कुमार पर आप भी इसी तरह की सड़ी बहानेबाजी कर रहे हैं राहुल गाँधी ? जब आप अपने कार्यकर्ताओ की सुन नहीं रहे हैं और निर्णय स्वयं ले रहे हैं तो चुनाव आयोग पर इल्जाम जैसे निर्णय सर्वमान्य प्रक्रिया का हिस्सा कैसे कहा जा सकता है ? इस असहमति के बीच से सहमति का रास्ता निकला होता तो आज इतना बड़ा मसला नहीं बना होता!यही तो मसला है कि आप ऊपर के इशारे और भरोसे पर किसी की भी नहीं सुनते हैं ? बतौर कांग्रेस किसी ने गोवा की एक रिपोर्ट की टीप दी है कि वहां मतदाता सूची जारी करने से चार दिन पहले तक वहां के मुख्य चुनाव अधिकारी ने सात दिन में आठ ईमेल भेजे कि 97 मतदाता एस आई आर में मतदान के पात्र पाये गए हैं, इन्हें मतदान का अधिकार दिया जाना चाहिए मगर मुख्य चुनाव आयुक्त ने इस पर गौर करना जरूरी नहीं समझा।
उन्हें नाम हटाने और झूठ बोलने की जिम्मेदारी दी गई है, जबकि सब डिजिटल और सॉफ्टवेयर ओरिएण्टेड है। कॉकरोचो और विपक्षी नेताओं न तो ज्ञानेश कुमार आपके कहने से इस्तीफा देने वाले हैं और न कोई उन्हें गिरफ्तार करने वाला है। सुप्रीम कोर्ट भी हो सकता है अभी आए उबाल को शांत करने के लिए शाब्दिक बहादुरी दिखाए और इस पूरे मामले को ठंडे बस्ते में डाल दे और आगामी विधानसभा चुनाव इसी मुद्दे पर भाजपा फिर जीत जाए क्यूंकि राहुल गाँधी का हर एजेंडा बैक फायर करता ही है। जब तक ये नेता खुद नहीं उठेंगे, खुद बलिदान देने की हद तक नहीं जाएंगे अहिंसक आंदोलन खड़ा करके झूठ और बेईमानी के इस किले को ध्वस्त नहीं करेंगे, कुछ नहीं होगा। आज विपक्ष के तमाम नेताओं के जो वक्तव्य आए हैं, उनमें कही गई सारी बातें हवा- हवाई हैं। क्या आपने गौर किया है कि पिछले एक-दो महीने से राहुल गांधी सोशल मीडिया पे छाए हुए हैं। ये जो चुनाव आयोग की ख़बर बाहर आई है , बिना किसी ब्यूरोक्रेट के बताये तो बाहर निकलती नहीं। राहुल गांधी ने भी हमेशा कहा है कि उनको अंदर की ख़बर मिलते रहती है। तो सवाल ये उठता है कि क्या भारत का शासक वर्ग ( पूंजीपति वर्ग + ब्यूरोक्रेसी + उच्च सवर्ण जातियां) अब सत्ता परिवर्तन चाहती हैं। वैसे भी मोदी जी सिर्फ दो लोगों के लिए काम कर रहे थे। बाकी पूंजीपति वर्ग तो नाराज था ही पर विकल्प नहीं है। जहाँ तक बात ज्ञानेश कुमार की है, उनका रोल ख़त्म हो चुका है। सरकार ने पहले ही क़ानून बना कर उनको सेफगार्ड कर लिया था। नब्बे के दशक की कोई फ़िल्म लगती है जिसमें सरकार या बड़ा डॉन किसी को इस्तेमाल करता है और जब ज़रूरत ख़त्म हो जाये तो उसे मक्खी की तरह निकाल फेंकता है। सरकार के तथाकथित चैनल्स ज्ञानेश कुमार को तानाशाह बुलाने लगे हैं ! ऐसे में क्या अब मिडिया भी अलग फाइट के मूड मे है। देखिए आगे आगे क्या होता है।

पंकज सीबी मिश्रा, राजनीतिक विश्लेषक जौनपुर यूपी
