गांधी की विरासत इस देश में अब केवल अहिंसा जैसे शब्द और स्वछता अभियान तक सिमित रह गया। शायद अब गाँधी का समर्थन कोई एक नारे से नहीं, बल्कि एक जीवन पद्धति से माना जाता है। गोडसे की विचारधारा कभी सुनी नहीं गई पर संघ कहता है कि अपने विश्वास को परखो,अपने विरोधी को सुनो, स्वयं अपने भीतर झाँको, अन्याय का प्रतिरोध करो, मनुष्य को कभी केवल साधन मत समझो। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की 157 वीं जयंती 2 अक्टूबर 2026 को मनाई गई। यह दिवस केवल गांधी जी को याद करने का दिन नहीं है। यह स्वयं से सवाल करने का दिन भी है कि जिस मनुष्य ने सत्य, अहिंसा, करुणा और आत्मसंयम को अपने जीवन का आधार बनाया, उसके विचार हमारे समय में हमारे लिए क्या अर्थ रखते हैं ! क्या हम उमर खालिद के समर्थन में गाँधी जी के जन्मदिन का उपयोग, उनकी फोटो का उपयोग, उनके नाम का उपयोग सही ठहरा सकते है,? गांधीजी को पढ़ना केवल यह जानना नहीं है कि उन्होंने क्या कहा था। यह समझना भी आवश्यक है कि उन्होंने अपने विचारों को जीवन में किस तरह परखा, बदला और प्रयोग किया। उनके लिए सत्य कोई बंद किताब या अंतिम निष्कर्ष नहीं था। गांधीजी भारत और विश्व में आज भी इसलिए प्रासंगिक हैं क्योंकि उन्होंने खुद को एक ऐसे साधारण व्यक्ति के रूप में प्रस्तुत किया जो जीवन के प्रश्नों से लगातार संवाद करता है और सत्य की निरंतर खोज करता रहता है। गांधीजी को केवल ‘महात्मा’ बनाकर दूर खड़ा कर देना शायद उन्हें समझने का सबसे आसान तरीका है। गांधीजी स्वयं मर्यादा के भीतर रहते हुए प्रश्न करते थे। राजनीति को वे प्रश्नों से मुक्त नहीं रखते थे। वे गीता, बाइबिल और कुरान जैसे विभिन्न धार्मिक ग्रंथों को अपनी प्रार्थना-सभाओं में स्थान देते थे। लेकिन वे किसी ग्रंथ की हर पंक्ति को उसके ऐतिहासिक और मानवीय संदर्भ से परे, बिना विचार स्वीकार करने के पक्ष में नहीं थे। उनके लिए किसी धार्मिक ग्रंथ का महत्व उसके अक्षर से अधिक उसकी आत्मा में था। उनका कहना था कि सच्चा धर्म वही है जो मनुष्य को अधिक सत्यनिष्ठ, करुणामय और न्यायप्रिय बनाए। अहिंसा केवल हिंसा न करने का नाम नहीं थी। वह मनुष्य के भीतर दूसरे मनुष्य के लिए सम्मान, करुणा, धैर्य और आत्मसंयम विकसित करने का प्रयास थी। गांधीजी के लिए साधन और साध्य के बीच भी गहरा संबंध था। वे मानते थे कि जिस समाज की हम कल्पना करते हैं, उसकी ओर जाने वाला रास्ता भी उसी मानवीय मूल्यों से ही निर्मित होना चाहिए।
गाँधी का ‘स्वराज’ केवल सत्ता के हस्तांतरण या विदेशी शासन से मुक्ति तक सीमित नहीं था। उसमें व्यक्ति और समाज—दोनों को अधिक जिम्मेदार, आत्मनिर्भर और नैतिक बनाने की कल्पना जुड़ी हुई थी।इसलिए गांधीजी को पढ़ते हुए सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न शायद यह नहीं है कि गांधी सही थे या गलत? बल्कि हम यह ढूढ़ते है कि गोडसे सही था या गलत ! गांधीजी किन समस्याओं का उत्तर खोज रहे थे? उनके उत्तरों की सीमाएँ क्या थीं? उनकी कही हुई कौन-सी बातें आज भी हमें चुनौती देती हैं?और उनके विचारों को आज के लोकतांत्रिक, वैज्ञानिक और तेजी से बदलते समाज में किस तरह समझा जा सकता है ? किसी महान व्यक्तित्व का सम्मान उसकी हर बात को बिना प्रश्न स्वीकार करना नहीं है। सच्चा सम्मान यह है कि उसके विचारों को अपने समय के प्रश्नों के सामने खड़ा किया जाए। आज दुनिया तकनीक की गति से बदल रही है। विकास और पर्यावरण, स्वतंत्रता और जिम्मेदारी, अधिकार और कर्तव्य, व्यक्ति और समाज के बीच नए प्रश्न लगातार सामने आ रहे हैं। ऐसे समय में गांधीजी को फिर से पढ़ना उपयोगी हो सकता है, क्योंकि वे हमें केवल उत्तर देने वाले विचारक के रूप में नहीं, बल्कि कई बार सही प्रश्न पूछना सिखाने वाले चिंतक के रूप में भी दिखाई देते हैं। बीते दिनों एक विचार-विमर्श के दौरान किसी वक्ता द्वारा कही गई यह पंक्ति सीधे अंतःकरण को छूती है। आज के इस दौर में, जब सार्वजनिक विमर्श प्रायः सतही नारों और तीखे ध्रुवीकरण में उलझ चुका है, यह विचार एक अत्यंत गहरी सच्चाई को उजागर करता है।
महात्मा गांधी को याद रखना बहुत आसान है—उनकी प्रतिमाओं पर माल्यार्पण करना, सरकारी दफ्तरों में उनकी तस्वीरें लगाना, मुद्रा पर उनका अक्स देखना और साल में दो दिन औपचारिक भाषण देकर रस्म अदायगी कर लेना बेहद सहज है। गांधी को बिसरा देना या उनके विचारों को विकृत करना तात्कालिक रूप से कुछ विचारधाराओं के लिए राजनीतिक सहूलियत का विषय हो सकता है। यह संकीर्ण लाभ और वैचारिक ध्रुवीकरण को भले ही संतुष्ट कर दे, परंतु गांधी जिन मानवीय और नैतिक उसूलों के प्रतीक थे, उन्हें भुला देना भारत के भविष्य के लिए अत्यंत आत्मघाती सिद्ध होगा। यदि हम गांधी के सत्य और करुणा को त्याग देंगे, तो हमारे हाथ केवल भय, प्रतिशोध और वैमनस्य का अंधकार ही शेष रहेगा।परंतु गांधी को समग्रता में समझना एक अत्यंत कठिन और विचारोत्तेजक साधना है। इस दर्शन का सबसे विस्मयकारी सत्य यह है कि आप गांधी के विचारों, उनके प्रयोगों और उनके नैतिक आग्रहों को जितना गहराई से समझने का प्रयास करेंगे, उनके प्रति मन में आदर और विस्मय का भाव न आना उतना ही असंभव होता चला जाएगा । इतिहास की सामान्य समझ में हम अक्सर उन्हें केवल एक ऐसे स्वतंत्रता सेनानी के रूप में देखते हैं, जिन्होंने ब्रिटिश हुकूमत से देश को मुक्ति दिलाने में मुख्य भूमिका निभाई। निस्संदेह, यह एक युगांतरकारी घटना थी, परंतु उनका वास्तविक और स्थायी योगदान केवल अंग्रेजों को भारत से बाहर भेजना भर नहीं था। उनका इससे भी महान अवदान यह था कि उन्होंने हमें यह सिखाया कि वास्तव में ‘स्वतंत्रता’ का मर्म क्या है और एक स्वतंत्र समाज को अपनी आंतरिक व्यवस्था का संचालन किस गरिमा के साथ करना चाहिए !

पंकज सीबी मिश्रा, राजनीतिक विश्लेषक जौनपुर यूपी
