
राजा उत्तानपाद, स्वयंभुव मनु के पुत्र और भगवान विष्णु के परम भक्त बालक ध्रुव के पिता थे। दो पत्नियों—सुरुचि (प्रिय) और सुनीति (अप्रिय)—के कारण उत्पन्न भेदभाव ने ध्रुव को अपमानित किया, जिससे ध्रुव ने भगवान विष्णु की कठोर तपस्या कर अचल स्थान (ध्रुव तारा) प्राप्त किया।
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- दो रानियां और भेदभाव: राजा उत्तानपाद की पहली पत्नी सुनीति (ध्रुव की माता) और दूसरी सुरुचि (उत्तम की माता) थीं। राजा सुरुचि से अधिक प्रेम करते थे, जिससे सुनीति और ध्रुव उपेक्षित रहते थे।
- अपमानजनक घटना: एक दिन ध्रुव को पिता की गोद में बैठा देख, सौतेली माँ सुरुचि ने उसे अपमानित करते हुए कहा कि राजा की गोद में बैठने के लिए उसे पहले सुरुचि की कोख से जन्म लेना होगा।
- तपस्या और ध्रुव तारा: इस घटना से व्यथित ध्रुव ने घर छोड़ दिया और वन में जाकर नारद जी की सलाह पर भगवान विष्णु की कठोर तपस्या की। विष्णु जी प्रसन्न हुए और ध्रुव को अचल (ध्रुव तारा) पद प्रदान किया।
- राजा का पछतावा: जब ध्रुव वापस लौटा, तो राजा उत्तानपाद को अपनी गलती का अहसास हुआ और उन्होंने ध्रुव को गले लगाकर राजपाठ सौंप दिया।
इस अवसर पर समिति के सभी पदाधिकारी और क्षेत्रवासी उपस्थित रहे। सभी क्षेत्रवासियों द्वारा बढ़-चढ़ कर श्रीमद् भागवत पुराण कथा आयोजन में अपनी सहभागिता प्रदर्शित की। माता अंजनी भक्त मंडल के सदस्यों ने भी हो रही कथा में अपना पूरा सहयोग दिया। कथा 24 फरवरी तक चलती रहेगी। कथा के अंतिम दिवस में कथा का समापन और भंडारा प्रसाद वितरण किया जाएगा।
