किसी मंत्रालय में यदि गड़बड़ हो रही हो, किसी चुनाव में यदि खेल हो रहा हो, किसी समिति में भाई-भतीजावाद चल रहा हो, या किसी मंच पर सच का गला घोंटा जा रहा हो और आप में सोनम वंगचूक बनने कि चूल हो फिर भी आप चुप हैं, तो आप सम्मानित नागरिक नही हैं। लेकिन भूल से भी यदि आपने सवाल पूछ लिया, तो आप तुरंत नजर में आप जायेंगे। आजकल सच बोलने से पहले लोग यह नहीं सोचते कि बात सही है या गलत। वे यह सोचते हैं कि सामने वाला कितना ताकतवर है। यदि ताकतवर है तो सच भी झूठ बन जाता है और यदि कमजोर है तो झूठ भी अपराध बन जाता है। हमारे समाज में एक नया आदर्श वाक्य प्रचलित हो गया है, सब देखो, सब समझो, बस ब्राह्मणवाद हो बर्बाद का गाना गाओ, लेकिन वामपंथी आडंबर के विरोध में कुछ ना बोलो। बोलने से दिल्ली वाले रिश्ते खराब हो सकते हैं पर व्यूज बढ़ेंगे , कांग्रेस का निमंत्रण आ सकता हैं, व्हाट्सएप ग्रुप से जोड़े जा सकते हैं पर सनातन के खिलाफ बोलना ही है सिर्फ इसलिये कि राहुल गाँधी इसे अपना गूंज समझ लेंगे।
इसलिए समझदार लोग आजकल अपनी अंतरात्मा को साइलेंट मोड पर रखकर जीवन जी रहे हैं। मजे की बात यह है कि हर व्यक्ति निजी बातचीत में क्रांतिकारी होता है। चार लोग मिल जाएँ तो व्यवस्था की धज्जियाँ उड़ा देता है। लेकिन जैसे ही वही बात सार्वजनिक मंच पर कहने का अवसर आता है, उसकी क्रांति अचानक छुट्टी पर चली जाती है। सरकार ने जनता के जीवन से जुड़े हर मामलों में ऐसा टैक्स सिस्टम विकसित कर लिया है कि किसी बच्चे के गर्भ में पहले दिन अवतरित होने से लेकर उसके मरने के बाद तक के कार्यक्रम से सरकारी टैक्स की वसूली होती रहे। पहले सरकारें जनता से वसूले टैक्स पर इतना निर्भर नहीं हुआ करती थीं। सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम लगाकर उससे मुनाफा कमाती थीं, अपने खर्च निकालती थीं और इसी उद्देश्य से देश में स्टेट बैंक ऑफ इंडिया, इंडियन आयल कारपोरेशन, भेल इत्यादि स्थापित की गयीं।
अपनी गड़ – गड़ – गड़ करती कार में गड़करी सुझावित पेट्रोल भी उसी कर की व्यवस्था है जिसमें वाहन लेते समय ही दो लाख का टैक्स फिर सड़क का अलग टैक्स, फिर टोल टैक्स फिर मेंटेनेंस टैक्स अर्थात एक ही उपक्रम के लिए पांच बार टैक्स उस पर भी सरकार का मन नहीं भरा तो और टैक्स दो पर मंत्री विधायक इससे मुक्त है क्यूंकि वो ही लोकतंत्र है। यह नीति दोहरी तिहरी ही नहीं बल्कि चौतरफा है । टैक्स का स्तर भी देखिए 1- केंद्र 2- राज्य 3- जिला स्तर 4- ग्रामीण स्तर फिर डायरेक्ट टैक्स और इनडायरेक्ट टैक्स मिलाकर भारत में एक ठीक-ठाक कमाने वाला नागरिक अपनी कुल कमाई का लगभग 70% सरकार को कर के रूप में दे देता है और व्यापारी अपनी कुल आय का 78% सरकार को दे देता है अर्थात व्यापारी साल में 9 महीने और वेतनभोगी साल में 7 महीने बेगारी करता है और ग़रीब से ग़रीब आदमी भी अपनी कमाई का कम से कम 35% तो कर सरकार को देता ही है।
इसका कैलकुलेशन साफ़ है 30% इनकमटैक्स+ बचे हिस्से के खर्च पर 18% जीएसटी वाहन के लिए तेल लिया तो उसपर 50% , इत्यादि इत्यादि खाया तो टैक्स दो, बैंक में जमा करो तो टैक्स दो। सभी को मिलाकर मोटा अनुमान लगाया जाए तो केंद्रीय सरकार की लगभग 70 प्रकार की वसूली और राज्य सरकारों की लगभग 60 प्रकार की वसूली, इसके साथ स्थानीय निकाय जैसे नगर निगम, नगर पालिका, पंचायत इत्यादि की कुल लगभग 50 प्रकार की वसूली मिला कर देश में जनता से लगभग 180 प्रकार के टैक्स, ड्यूटी, सेस, फीस और चार्ज विभिन्न स्तरों पर वसूले जाते हैं। यह टैक्स ही दरअसल धर्मेंद्र प्रधान और नितिन गडकरी सिस्टम हैं जो जनता के पैसे से बने मोडम बेचकर एकमुश्त रकम हथिया रहीं हैं और उसकी भरपाई जनता पर टैक्स लगाकर कर रहीं हैं। जिसमें ग़रीब से ग़रीब आदमी से भी किसी ना किसी रूप में उसकी कमाई का 35% और ठीकठाक कमाने वाले से 60% और व्यापारी से उसकी कमाई का 78% टैक्स वसूल लेती हैं।
आपको क्या करना है बस छुप के चुपरहना है । ऐसे ही भवन निर्माण में नक्शा पास करना भी सरकार की कमाई का जरिया है , नक्शे के लिए पहाड़ खोदने जैसी प्रक्रिया मेरी समझ से बाहर की है , हर कोई अपनी सुविधानुसार अपने मकान का निर्माण कराना चाहता है मगर सरकार वहां भी घुसी हुई है। सरकार इसके माध्यम से भी ना सिर्फ मोटी कमाई करती है , बल्कि इसके सहारे पूरी राजनीति करती है फिर भी नियमानुसार भवन निर्माण भले नक्शा स्विकृति कराकर नहीं बना तो, मौजूद संस्थाओं के अधिकारी के पास अधिकार है कि वह कंपाउंडिंग चार्ज़ लेकर उसे वैध घोषित कर दें , नियमानुसार कंपाउंडिंग सिर्फ वहां नहीं हो सकती जहां निर्माण सरकारी भूमि या सार्वजनिक भूमि पर हो।निर्माण सड़क, पार्क, नाला, तालाब, ग्रीन बेल्ट या अन्य सार्वजनिक उपयोग की भूमि पर हो। निर्माण मास्टर प्लान के भूमि उपयोग के विपरीत हो। आवश्यक पार्किंग, कॉमन एरिया या अनिवार्य सुरक्षा प्रावधानों का गंभीर उल्लंघन है।ऐसा निर्माण जो भवन की संरचनात्मक या अग्नि सुरक्षा पर प्रतिकूल प्रभाव डालता हो। फिर मोहम्मद अली जौहर युनिवर्सिटी के भवनों को कंपाउंडिंग चार्ज़ लेकर नियमित और वैधानिक क्यों नहीं किया गया यह लोग पूछ तो रहे पर चुपचाप !
जब सोच सकारात्मक हो तो बोलिये , नहीं तो नेता मंत्री के पास बहुत पावर होता है। सरकार में चुन चुन कर ऐसे मंत्री तैनात किए गए हैं जो एक एजेंडे को पूरा कर सकें। कहने का अर्थ यह है कि सरकार के 180 दांत है और इसी से वह किसी को भी चबा सकती है , युनिवर्सिटी तक को चबा रही है इसलिए चुप रहिए। कुछ लोग तो इतने अनुभवी हो चुके हैं कि अन्याय देखकर भी चेहरे पर मुस्कान बनाए रखते हैं। मानो कह रहे हों, हमें सब पता है, लेकिन हमें कुछ पता नहीं है। भीड़ भी बड़ी अद्भुत चीज है। भीड़ में खड़े होकर हर व्यक्ति खुद को सुरक्षित महसूस करता है। वहाँ किसी को सोचने की आवश्यकता नहीं होती। बस ताली बजाइए, सिर हिलाइए और घर जाइए। निर्णय कोई और करेगा, जिम्मेदारी कोई और उठाएगा और भविष्य की शिकायतें हम सब मिलकर करेंगे। फिर वर्षों बाद वही लोग बैठकर चर्चा करते हैं कि समाज आगे क्यों नहीं बढ़ रहा, योग्य लोग सामने क्यों नहीं आ रहे, और गलत लोग बार-बार सफल क्यों हो रहे हैं। उत्तर बहुत सरल है। क्योंकि गलत लोग सक्रिय हैं और सही लोग सुविधाजनक मौन में व्यस्त हैं।
इतिहास में कभी भी चुप रहने वालों की मूर्तियाँ नहीं लगीं। मूर्तियाँ उन्हीं की लगीं जिन्होंने सवाल पूछे, विरोध सहा, आलोचना झेली और फिर भी अपने विचारों पर डटे रहे। इसलिए यदि आप भी समाज में प्रतिष्ठित बने रहना चाहते हैं, तो कृपया इस “चुप्पी सम्मान योजना” का लाभ लेते रहिए। अन्याय देखिए, सिर हिलाइए, चाय पीजिए और घर जाइए। लेकिन यदि सचमुच बदलाव चाहिए, तो योजना से बाहर निकलना पड़ेगा। क्योंकि अब समय ऐसा आ गया है कि चुप्पी केवल कमजोरी नहीं, बल्कि कई बार अपराध की साझेदार बन जाती है और इतिहास गवाह है,समाज को नुकसान हमेशा बुरे लोगों ने नहीं , कई बार अच्छे लोगों की चुप्पी ने भी पहुँचाया है।

पंकज सीबी मिश्रा, राजनीतिक विश्लेषक एवं पत्रकार जौनपुर यूपी
