लोकतंत्र का गला घोंटकर, पार्टियां तोड़कर, जो विधायकों-सांसदों इधर उधर दौड़ रहे उन्हें अगर जनता सबक सिखाए तो बेहतर ! जी हाँ कुछ इसे खरीद-फरोख्त कह रहे तो कुछ हवा का रुख देख पाला बदलने की कला ! जो लोग खुद को अजेय समझ रहे हैं , वे एक बात गांठ बांध लें सत्ता हमेशा स्थायी नहीं होती, लेकिन कलंक हमेशा स्थायी होता है। चार साल पहले जब शिवसेना को पहली बार तोड़कर एकनाथ शिंदे को मुख्यमंत्री की कुर्सी पर भाजपा ने बिठाया था, तब इसे ऑपरेशन लोटस नाम दिया गया था। कर्नाटक, मध्यप्रदेश आदि में भी यही चला, तब लोगो को लगा यह पैसे के दम पर है पर अब ज़ब बंगाल में यह हुआ तो लोगो को लग रहा यह एक बड़ा खेल है। किसी दल के विधायकों या सांसदों का लालच या दबाव में आकर वर्चस्व वाले दल में केवल इसलिए शामिल होना की शीघ्र ही मंत्री पद पुनः मिलेगा , ताकि सत्ता पर कब्ज़ा किया जा सके, राजनैतिक भ्रष्टाचार का बड़ा उदाहरण है। कोंग्रेसी यही उदाहरण बार-बार लगातार पेश करते रहे है। राजनैतिक विश्लेषक और मीडिया के कई लोग इसे मास्टर स्ट्रोक बता कर भ्रष्टाचार को सही ठहराने में लगे रहते हैं।
जनता का पैसा लूटकर, उसी पैसे से गाड़ी बंगला और वोट खरीदने वाले आज भले ही दल बदल के गीत गा रहे हों, लेकिन इतिहास उन्हें लोकतंत्र के रक्षक नहीं, उसके सौदागर के रूप में याद रखेगा। जनादेश कोई बाजार में बिकने वाली वस्तु नहीं है। यह करोड़ों लोगों के विश्वास, संघर्ष और उम्मीदों का प्रतीक है। जब चुनी हुई सरकारें गिराने और निर्वाचित प्रतिनिधियों को खरीदने का खेल खेला जाता है, तब केवल एक पार्टी नहीं टूटती, बल्कि जनता का भरोसा टूटता है, संविधान की भावना घायल होती है और लोकतंत्र कमजोर होता है। हाँ जाति के नाम पर चुनाव जितने वाले ऐसा करें तो यह उचित है और सबक भी। जो लोग आज जाति एकता, धनबल और सत्ता के अहंकार में चूर होकर नेतागिरी को अपनी जागीर समझ रहे हैं, उन्हें यह नहीं भूलना चाहिए कि जनता की अदालत में न कोई सत्ता काम आती है, न कोई पद, न कोई प्रचार। वहां केवल कर्मों का हिसाब होता है।
बंगाल और महाराष्ट्र के बाद अब यूपी की राजनीति में उथल-पुथल दिखाई दे रही है। शिवसेना के एक बार फिर टूटने की ख़बरें हैं। जाहिर है यह टूट शिंदे गुट में नहीं, उद्धव ठाकरे गुट में है और इसके पीछे भी राजनीतिक फायदा का ही हाथ है। कम से कम छह सांसदों के शिंदे गुट में जाने की खबरें हैं। सांसद संजय राउत ने तो यहां तक आरोप लगाया है कि इन सांसदों को 15-15 करोड़ दिए गए हैं। यानी खुल कर ख़रीद-फरोख़्त की बातें हो रही हैं। यह ऑपरेशन टाइगर हुआ है, यही लिखा आ रहा है। यही ऑपरेशन टाइगर शब्द महाराष्ट्र के राजनैतिक गलियारों में घूम रहा है। टाइगर यानी शेर, बाला साहेब ठाकरे की खड़ी की हुई शिवसेना की पहचान रहा है पर उद्धव उस शेर को सम्हाल नहीं पाए । एकनाथ शिंदे खुद को बाल ठाकरे का असली उत्तराधिकारी बताते हुए शिवसेना के नाम और निशान पर तो कब्ज़ा कर चुके हैं, अब ऑपरेशन टाइगर कहकर वे यह बताना चाह रहे हैं कि शिवसेना के असली शेर उनके साथ ही रहेंगे। राजनीति, युद्ध और प्रेम में सब जायज़ है, जैसे वाक्य भूलना नहीं चाहिए।
सामंतवाद को बढ़ावा देने वालों ने अपनी सुविधा से अपने लिए जातिगत किले गढ़े हैं, जिसे नकार दिया जाना चाहिए। सही केवल वही है जो नैतिकता और कानून की कसौटी पर खरा उतरे। इस लिहाज से देखें तो पार्टियों द्वारा चलाए दल-बदल ऑपरेशन सही नहीं हैं। अगर किसी की विचारधारा बदल जाए और फिर वह पार्टी बदले तो वह ठीक है। लेकिन आप किसी पार्टी और उसके चुनाव चिह्न पर लड़ते हैं, जीत हासिल करते हैं और कुछ वक़्त के बाद धुरविरोधी पार्टी में चले जाते हैं तो यह सीधे-सीधे उस जनता के साथ धोखा है जिसने आपको जिताया। जैसे प.बंगाल में इस समय तृणमूल कांग्रेस के 20 सांसदों ने एक अनजानी पार्टी एनसीपीआई में विलय का ऐलान किया, ताकि वे एनडीए का समर्थन कर सकें। ये 20 सांसद कम से कम एक करोड़ लोगों का प्रतिनिधित्व करते हैं और 2024 में इन लोगों को भाजपा के ख़िलाफ़ लड़ते हुए ही जीत मिली थी। अब ये सांसद भाजपा का विरोध नहीं करेंगे और इस तरह अपनी क्षेत्र की जनता के साथ धोखा करेंगे। पर यह काम नया नहीं है। विपक्ष भी यह राजनिती कर चुका है। बीते 17 अप्रैल को संसद के विशेष सत्र में संविधान संशोधन विधेयक सरकार इंडिया ब्लॉक की एकजुटता के कारण ही पारित नहीं करवा पाई थी।
इसके बाद बंगाल में उसकी जीत तो हो गई, लेकिन वहीं इंडिया गठबंधन में आपसी मजबूती भी बढ़ी। क्योंकि सभी दलों को यह समझ आ गया कि भाजपा अब विपक्ष को किसी हाल में चुनाव नहीं जीतने देगी। भाजपा इंडिया गठबंधन में दरार डाल चुकी थी अब बस मौके के इंतजार में थी तो अब उसके नेताओं को तोड़ने में लग गई । टीएमसी में उसे काफ़ी हद तक सफलता मिल गई है। लेकिन संसद में एकाधिकार के लिए उसे और संख्याबल चाहिए, तो अब फिर से शिवसेना निशाने पर है। हालांकि शिवसेना (यूबीटी) ने लोकसभा अध्यक्ष को पत्र सौंपकर मांग की है कि शिवसेना (यूबीटी) को ही संसद में एकमात्र आधिकारिक राजनीतिक दल के रूप में मान्यता दी जाती रहे। किसी भी अलग गुट, बागी गुट या स्वतंत्र समूह को कोई पहचान, दर्जा, सुविधा या विशेषाधिकार न दिया जाए।
पत्र में यह भी लिखा है कि ऐसी किसी भी मांग पर फैसला लेने से पहले उद्धव ठाकरे गुट को अपना पक्ष रखने का अवसर दिया जाए। पार्टी ने यह भी स्पष्ट किया है कि वह संविधान की दसवीं अनुसूची (दल-बदल विरोधी कानून) के तहत उपलब्ध प्रावधानों का उपयोग करने का अधिकार सुरक्षित रखती है। अब ओम बिड़ला क्या फ़ैसला लेते हैं यह तो बाद में पता चलेगा, लेकिन दलबदल के लगातार हो रहे प्रकरणों में यह विचारणीय है कि आख़िर भाजपा को ऐसा करने का मौका क्या राजनैतिक दलों के नेता खुद नहीं दे रहे हैं। राजनीति में जो भ्रष्टाचार व्याप्त हो चुका है, उस में जांच एजेंसियों के सियासी इस्तेमाल की गुंजाइश बढ़ गई है। उधर सपा को चिंता है कि उत्तर प्रदेश में भी समाजवादी पार्टी के कई विधायक एमएलसी राज्यसभा सांसद भाजपा तोड़ सकती है । क्या स्वार्थ रहेगा ? क्या लालच होगा ? क्या डर होगा ? स्वार्थ, लालच और डर ही वे कारक हैं, जिनके बूते दल-बदल संभव हो पा रहा है। आज भाजपा यह कर रही है, मुमकिन है कल कोई दूसरा सत्ताधारी दल यही करे।
इसे तभी रोका जाएगा जब ईमानदार राजनीति को पुनर्स्थापित किया जाए। काम कठिन है, असंभव नहीं। इतिहास गवाह है कि लोकतंत्र को कमजोर करने वाले कुछ समय के लिए ताकतवर दिखे जरूर, लेकिन अंत में जनता ने उन्हें उसी कठोरता से जवाब दिया, जिसकी उन्होंने कभी कल्पना भी नहीं की थी। सवर्ण वोटरों के हक़ की हत्या करके इतिहासपुरुष बनने का सपना देखने वालों, याद रखो इतिहास तुम्हें महान नहीं, लोकतंत्र पर लगे एक काले धब्बे के रूप में दर्ज कर करेगा। इस लोकतंत्र को बर्बाद करने का पाप भाषणों, विज्ञापनों और प्रचार से नहीं धुलेगा। इसकी कीमत चुकानी होगी।

पंकज सीबी मिश्रा, राजनीतिक विश्लेषक एवं पत्रकार जौनपुर
