जब संतान न दे भरण-पोषण भत्ता: जेल की हवा खाएंगे कलयुगी बच्चे, जानिए कानूनी कार्रवाई की पूरी प्रक्रिया
माता-पिता एवं वरिष्ठ नागरिक अधिनियम 2007: आदेश के बावजूद भत्ता रोकने पर ट्रिब्यूनल जारी करेगा गिरफ्तारी वारंट
वृद्ध माता-पिता की सेवा और भरण-पोषण करना न केवल नैतिक जिम्मेदारी है, बल्कि कानूनी बाध्यता भी है। अक्सर देखा जाता है कि एसडीएम कोर्ट (भरण-पोषण अधिकरण) द्वारा आदेश जारी किए जाने के बाद भी कुछ बच्चे अपने बुजुर्ग माता-पिता को तय किया गया मासिक भत्ता देने में आनाकानी करते हैं या जानबूझकर देरी करते हैं। ऐसे मामलों में कानून में सख्त दंडात्मक प्रावधान किए गए हैं।
1. भत्ता न देने पर क्या है सजा का प्रावधान?
माता-पिता और वरिष्ठ नागरिक भरण-पोषण एवं कल्याण अधिनियम, 2007 के तहत यदि ट्रिब्यूनल के आदेश के बाद भी संतान समय पर मासिक भत्ता नहीं देती है, तो उसके खिलाफ निम्नलिखित सख्त कार्रवाई की जाती है:
- गिरफ्तारी वारंट : भत्ते की रकम न चुकाने पर अधिकरण (SDM Court) संतान के खिलाफ रिकवरी वारंट या गिरफ्तारी का वारंट जारी कर सकता है।
- प्रत्येक माह के लिए जेल: भत्ते का भुगतान न करने की स्थिति में बकाया रकम के बदले प्रत्येक माह की लापरवाही पर 1 महीने तक की जेल (कारावास) की सजा सुनाई जा सकती है।
- संपत्ति की कुर्की : यदि संतान जेल जाने के बाद भी पैसे नहीं देती है, तो प्रशासन उसकी संपत्ति या वेतन (Salary) को जब्त/कुर्क करके बुजुर्गों के भरण-पोषण की भरपाई करवा सकता है।
2. यदि संतान आदेश का पालन न करे, तो बुजुर्ग क्या करें?
यदि ट्रिब्यूनल का आदेश होने के बावजूद बच्चा/वारिस पैसे नहीं दे रहा है, तो बुजुर्गों को दोबारा किसी लंबी मुकदमेबाजी में पड़ने की जरूरत नहीं है:
- रिकवरी आवेदन : बुजुर्ग सीधे उसी एसडीएम/ट्रिब्यूनल में एक आवेदन देकर सूचित कर सकते हैं कि अदालत के आदेश का पालन नहीं हो रहा है।
- पुलिस की भूमिका: ट्रिब्यूनल का वारंट मिलते ही स्थानीय थाना पुलिस की यह जिम्मेदारी बनती है कि वह दोषी संतान को गिरफ्तार कर अदालत के सामने पेश करे या बकाया राशि जमा करवाए।
बीपीएस न्यूज़ – सच्ची कहानी
एसडीएम कोर्ट से बुजुर्ग पिता को मिला न्याय: सुलह अधिकारी ने कराई घर में शांति, सुधरे रिश्ते
कानपुर। बुढ़ापे में जिस उम्र में सहारा चाहिए होता है, उसी उम्र में अपनों के अत्याचार से जब एक 80 वर्षीय बुजुर्ग का जीवन दूभर हो गया, तो उन्हें न्याय की चौखट खटखटानी पड़ी। थाना सेन पश्चिम पारा क्षेत्र के निवासी और शिक्षा विभाग से सेवानिवृत्त एक बुजुर्ग पिता ने अपने अधिकार और सम्मान की लड़ाई के लिए एसडीएम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। हालांकि, वरिष्ठ नागरिक भरण-पोषण कानून और प्रशासनिक सूझबूझ की बदौलत इस पारिवारिक कलह का एक सुखद अंत हुआ है।
दर्द की दास्तान: अपनों ने ही दिया धोखा
पीड़ित बुजुर्ग ने अपनी गाढ़ी कमाई और रिटायरमेंट के पैसों से अपना मकान बनवाया था। लेकिन उम्मीदों के विपरीत, उनके बड़े बेटे और बहू ने उन्हें मानसिक, शारीरिक और आर्थिक रूप से प्रताड़ित करना शुरू कर दिया।
बुजुर्ग का आरोप था कि बड़ा बेटा और बहू उन्हें खाना-पीना तक नहीं देते थे, मारपीट करते थे और उनका एटीएम कार्ड छीनकर जमा पूंजी निकाल लेते थे। अपनों की इस प्रताड़ना को देखकर छोटा बेटा भी गलत राह पर चल पड़ा। वह शराब पीकर घर आता, गाली-गलौज करता और सेवा करने के बजाय विवाद खड़ा करता। अत्यंत दयनीय स्थिति में जीवन यापन कर रहे इस बुजुर्ग ने आखिरकार ‘माता-पिता और वरिष्ठ नागरिक भरण-पोषण एवं कल्याण अधिनियम 2007’ के तहत एसडीएम कोर्ट में याचिका दाखिल की।
सुलह अधिकारी का रुख: डांट भी लगाई और दिल भी जोड़े
मामला जब कोर्ट में पहुंचा, तो सुलह अधिकारी धीरेंद्र कुमार दोहरे ने पूरे धैर्य और संवेदनशीलता के साथ दोनों पक्षों की दलीलें सुनीं। कुछ तारीखों पर सभी पक्षों को आमने-सामने बुलाकर बात की।
सुलह अधिकारी ने कानून के कड़े प्रावधानों का अहसास कराते हुए बड़े बेटे, बहू और छोटे बेटे को कड़ी फटकार लगाई। उन्होंने यह स्पष्ट कर दिया कि बुजुर्ग माता-पिता के अधिकारों का हनन किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। प्रशासन के इस सख्त रुख और समझाइश का असर यह हुआ कि तीनों को अपनी गलती का अहसास हो गया।
फैसले में बनी बात: किराए पर जाएगा बड़ा बेटा, छोटा करेगा सेवा
सुलह अधिकारी की मध्यस्थता से मामले में ऐतिहासिक और सुखद समझौता हुआ:
- बड़े बेटे और बहू का फैसला: समझौते के तहत बड़ा बेटा और बहू 1 सप्ताह के भीतर बुजुर्ग पिता का मकान खाली कर अलग किराए के मकान में रहने चले जाएंगे। बड़े बेटे ने अपनी गलतियों के लिए माफी मांगते हुए समझौते को सहर्ष स्वीकार कर लिया।
- छोटे बेटे का हृदय परिवर्तन: छोटे बेटे ने कोर्ट के सामने पिता से माफी मांगी और शपथ ली कि वह अब कभी शराब नहीं पिएगा। उसने पिता के खाने-पीने, कपड़े, इलाज और सभी सुख-सुविधाओं की पूरी जिम्मेदारी ली।
- पिता का बड़प्पन: बुजुर्ग पिता ने दरियादिली दिखाते हुए छोटे बेटे को माफ कर दिया और उसे अपने साथ ही रखने पर सहमति दे दी।
सुलह अधिकारी धीरेंद्र कुमार दोहरे ने बताया :
“वरिष्ठ नागरिक अधिनियम 2007 के तहत पीड़ित बुजुर्ग हमारे पास न्याय की उम्मीद लेकर आए थे। हमने दोनों पक्षों की बात सुनी। बड़ा बेटा-बहू किराए पर अलग रहने को राजी हुए हैं और छोटे बेटे ने सुधरने की कसम खाई है। कानून का मकसद सिर्फ सजा देना नहीं, बल्कि रिश्तों में सम्मान और सुरक्षा बहाल करना है।”
बीपीएस न्यूज़ की सीख:
‘माता-पिता और वरिष्ठ नागरिक भरण-पोषण अधिनियम 2007’ की जागरूकता श्रृंखला के अंतर्गत ‘बीपीएस न्यूज’ लगातार ऐसी घटनाओं को प्रमुखता से उठा रहा है। यह सच्ची घटना समाज के लिए एक नजीर है कि कोई भी बुजुर्ग खुद को बेबस न समझे—कानून और प्रशासन हमेशा उनके सम्मान की रक्षा के लिए खड़ा है।
कोर्ट-कचहरी के चक्कर लगाना भूल जाइए: सादे कागज पर कैसे लिखें SDM को आवेदन? जानिए पूरा तरीका साथ ही अगली नई सच्ची कहानी अगले हफ्ते केवल बीपीएस न्यूज़ पर।”
