“जब औलाद ने छोड़ा साथ, तो कानून ने थामा हाथ!” सच्ची कहानी, अंक- 3

बीपीएस न्यूज़ की बुजुर्गों के अधिकारों पर विशेष सामाजिक जागरूकता मुहीम (भाग- 3)
प्रिय पाठकों, आज की आधुनिक और भागदौड़ भरी जिंदगी में हम अक्सर उन हाथों को भूल जाते हैं, जिन्होंने हमें चलना सिखाया। समाज में बुजुर्गों के साथ बढ़ती उपेक्षा और अकेलेपन को देखते हुए ‘बीपीएस न्यूज़’ एक नई मुहिम चला रहा है। भारत सरकार द्वारा बनाए गए ‘माता-पिता और वरिष्ठ नागरिक भरण-पोषण एवं कल्याण अधिनियम 2007’ की संपूर्ण जानकारी हम हर हफ्ते किस्तों में आप तक पहुँचा रहे हैं। हमारा उद्देश्य केवल कानून बताना नहीं, बल्कि हर बुजुर्ग को उसका हक और हर नागरिक को उसका कर्तव्य याद दिलाना है। आइए, इस मुहिम से जुड़ें और जागरूक बनें।
अंक 3: शिकायत और आवेदन की प्रक्रिया
जागरूक नागरिक: बिना वकील और बिना कोर्ट-कचहरी के कैसे पाएं न्याय?
वरिष्ठ नागरिकों को अदालतों के लंबे चक्कर न काटने पड़ें, इसीलिए इस कानून के तहत एक बेहद सरल और मुफ्त प्रक्रिया बनाई गई है।
 शिकायत कहाँ करें?
हर जिले में सरकार द्वारा ‘भरण-पोषण अधिकरण’ (Maintenance Tribunal) का गठन किया गया है, जिसके अध्यक्ष आमतौर पर एसडीएम (SDM) या उप-विभागीय मजिस्ट्रेट होते हैं।
आवेदन कैसे करें?
बुजुर्ग स्वयं एक सादे कागज पर आवेदन लिखकर एसडीएम कार्यालय में दे सकते हैं।
यदि बुजुर्ग खुद जाने में असमर्थ हैं, तो उनकी तरफ से कोई भी अन्य व्यक्ति या मान्यता प्राप्त संस्था (NGO) आवेदन कर सकती है।
विशेष बात: इस प्रक्रिया में किसी महंगे वकील की ज़रूरत नहीं होती। बुजुर्ग सीधे अपनी बात रख सकते हैं।
फैसले की समय सीमा: कानून के अनुसार, आवेदन करने के 90 दिनों के भीतर ट्रिब्यूनल को मामले का निपटारा कर फैसला सुनाना होता है (विशेष परिस्थितियों में 30 दिन बढ़ाए जा सकते हैं)।
ट्रिब्यूनल बच्चों को हर महीने अधिकतम ₹10,000 (या राज्य सरकार द्वारा तय राशि) तक का गुजारा भत्ता देने का आदेश दे सकता है।
बीपीएस न्यूज़ – सच्ची कहानी
बदला बेटे का दिल: एसडीएम कोर्ट की चौखट पर सुलझा पारिवारिक विवाद, फौजी बेटे ने मां से मांगी माफी

कानपुर। कानून और समझदारी के सही तालमेल से एक बिखरते परिवार को फिर से नई जिंदगी मिली है। मामला श्याम नगर इलाके का है, जहां एक बुजुर्ग मां को अपने हक के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाना पड़ा था, लेकिन प्रशासनिक अधिकारियों के प्रयास और पारिवारिक समझदारी से आखिरकार यह विवाद सुलह-समझौते के साथ समाप्त हो गया। फौजी बेटे ने न्यायालय में अपनी गलतियों के लिए मां से क्षमा मांगी और हर महीने ₹10,000 भरण-पोषण भत्ता देने के साथ-साथ जीवनभर उनकी देखभाल करने का संकल्प लिया।

क्या था पूरा मामला?

श्याम नगर निवासी एक 65 वर्षीय बुजुर्ग महिला के दो पुत्र और तीन पुत्रियां हैं। उनका सबसे छोटा बेटा भारतीय सेना में सिपाही के पद पर तैनात है, जबकि बड़ा बेटा मानसिक रूप से विकलांग है। बुजुर्ग महिला के पति सिविल डिफेंस से सेवानिवृत्त हैं, जिन्हें मिलने वाली ₹19,000 की पेंशन में से वह महिला को ₹5,000 देते हैं। महिला के कंधों पर अपने मानसिक रूप से विकलांग बेटे की जिम्मेदारी और स्वयं के भरण-पोषण का भारी बोझ था।

महिला का आरोप था कि शादी के बाद से ही उनके छोटे फौजी बेटे का व्यवहार बदल गया था। वह न तो घर की जिम्मेदारियां उठा रहा था और न ही मां के बीमार होने पर इलाज का खर्च दे रहा था। इस उपेक्षा से तंग आकर बुजुर्ग मां ने ‘माता-पिता और वरिष्ठ नागरिक भरण-पोषण एवं कल्याण अधिनियम 2007’ के तहत न्याय और अपने हक के लिए एसडीएम कोर्ट में मुकदमा दायर कर दिया था।

सुलह अधिकारी के सामने बदला बेटे का हृदय

मुकदमे की सूचना मिलने के बाद सेना में कार्यरत छोटा बेटा न्यायालय में सुलह अधिकारी के समक्ष उपस्थित हुआ। काउंसलिंग के दौरान सुलह अधिकारी ने बेटे को फटकार लगाते हुए मां के प्रति उसके कर्तव्यों का बोध कराया। देश की रक्षा करने वाले फौजी बेटे को जब अपनी बुजुर्ग मां के प्रति अपनी जिम्मेदारी का अहसास हुआ, तो उसका दिल पिघल गया।

बेटे ने अपनी मां के सामने स्वेच्छा से अपनी गलतियों के लिए क्षमा मांगी। उसने लिखित रूप में समझौता करते हुए वादा किया कि वह हर महीने ₹10,000 सीधे अपनी मां के बैंक खाते में भरण-पोषण के लिए भेजेगा। इसके साथ ही उसने मां की हर सुख-सुविधा और इलाज का पूरा ख्याल रखने व भविष्य में कभी परेशान न करने का लिखित आश्वासन दिया है।

समझौता तोड़ा तो होगी कानूनी कार्रवाई: सुलह अधिकारी

मामले की मध्यस्थता कर रहे सुलह अधिकारी धीरेंद्र कुमार दोहरे ने बताया: हमने दोनों पक्षों को बुलाकर काउंसलिंग की, जिसके बाद दोनों के बीच सम्मानजनक सुलह हो गई है। बेटे ने अपनी गलती मानकर मां से माफी मांगी है और वह हर माह ₹10,000 भरण-पोषण के रूप में देगा। यदि भविष्य में बेटा इस सुलहनामे की शर्तों का पालन नहीं करता है या समझौता तोड़ता है, तो पीड़ित मां को दोबारा कानूनी कार्रवाई करने का पूरा अधिकार होगा।”

इस सुलह-समझौते के बाद बुजुर्ग मां के चेहरे पर राहत और संतोष के भाव दिखाई दिए। कोर्ट की चौखट पर हुए इस सुखद अंत ने समाज को संदेश दिया है कि बुजुर्ग माता-पिता की सेवा ही सबसे बड़ा धर्म है।

बीपीएस न्यूज़ की सीख:
यह मामला समाज के उन तमाम बुजुर्गों के लिए एक बड़ी मिसाल है, जो अपने ही बच्चों के अत्याचारों को भाग्य की लकीर मानकर चुपचाप सहते रहते हैं। ‘वरिष्ठ नागरिक अधिनियम 2007’ न सिर्फ बुजुर्गों को त्वरित न्याय दिलाता है, बल्कि बिखरते हुए परिवारों को फिर से जोड़ने का काम भी करता है। जरूरत सिर्फ सही समय पर सही मंच तक आवाज पहुँचाने की है।
अगले हफ्ते (अंक-4) ज़रूर पढ़ें:
बच्चों द्वारा भरण-पोषण न देने पर सजा का प्रावधान – साथ ही अगली नई सच्ची कहानी के साथ जानिए अगले हफ्ते केवल बीपीएस न्यूज़ पर।”
मदद के लिए यहाँ संपर्क करें: राष्ट्रीय वरिष्ठ नागरिक हेल्पलाइन (Elderline): 14567 (टोल-फ्री नंबर)
नज़दीकी सहायता: अपने क्षेत्र के उप-विभागीय मजिस्ट्रेट (SDM) कार्यालय या स्थानीय पुलिस स्टेशन से संपर्क करें।

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