कानपुर। कानून और समझदारी के सही तालमेल से एक बिखरते परिवार को फिर से नई जिंदगी मिली है। मामला श्याम नगर इलाके का है, जहां एक बुजुर्ग मां को अपने हक के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाना पड़ा था, लेकिन प्रशासनिक अधिकारियों के प्रयास और पारिवारिक समझदारी से आखिरकार यह विवाद सुलह-समझौते के साथ समाप्त हो गया। फौजी बेटे ने न्यायालय में अपनी गलतियों के लिए मां से क्षमा मांगी और हर महीने ₹10,000 भरण-पोषण भत्ता देने के साथ-साथ जीवनभर उनकी देखभाल करने का संकल्प लिया।
क्या था पूरा मामला?
श्याम नगर निवासी एक 65 वर्षीय बुजुर्ग महिला के दो पुत्र और तीन पुत्रियां हैं। उनका सबसे छोटा बेटा भारतीय सेना में सिपाही के पद पर तैनात है, जबकि बड़ा बेटा मानसिक रूप से विकलांग है। बुजुर्ग महिला के पति सिविल डिफेंस से सेवानिवृत्त हैं, जिन्हें मिलने वाली ₹19,000 की पेंशन में से वह महिला को ₹5,000 देते हैं। महिला के कंधों पर अपने मानसिक रूप से विकलांग बेटे की जिम्मेदारी और स्वयं के भरण-पोषण का भारी बोझ था।
महिला का आरोप था कि शादी के बाद से ही उनके छोटे फौजी बेटे का व्यवहार बदल गया था। वह न तो घर की जिम्मेदारियां उठा रहा था और न ही मां के बीमार होने पर इलाज का खर्च दे रहा था। इस उपेक्षा से तंग आकर बुजुर्ग मां ने ‘माता-पिता और वरिष्ठ नागरिक भरण-पोषण एवं कल्याण अधिनियम 2007’ के तहत न्याय और अपने हक के लिए एसडीएम कोर्ट में मुकदमा दायर कर दिया था।
सुलह अधिकारी के सामने बदला बेटे का हृदय
मुकदमे की सूचना मिलने के बाद सेना में कार्यरत छोटा बेटा न्यायालय में सुलह अधिकारी के समक्ष उपस्थित हुआ। काउंसलिंग के दौरान सुलह अधिकारी ने बेटे को फटकार लगाते हुए मां के प्रति उसके कर्तव्यों का बोध कराया। देश की रक्षा करने वाले फौजी बेटे को जब अपनी बुजुर्ग मां के प्रति अपनी जिम्मेदारी का अहसास हुआ, तो उसका दिल पिघल गया।
बेटे ने अपनी मां के सामने स्वेच्छा से अपनी गलतियों के लिए क्षमा मांगी। उसने लिखित रूप में समझौता करते हुए वादा किया कि वह हर महीने ₹10,000 सीधे अपनी मां के बैंक खाते में भरण-पोषण के लिए भेजेगा। इसके साथ ही उसने मां की हर सुख-सुविधा और इलाज का पूरा ख्याल रखने व भविष्य में कभी परेशान न करने का लिखित आश्वासन दिया है।
समझौता तोड़ा तो होगी कानूनी कार्रवाई: सुलह अधिकारी
मामले की मध्यस्थता कर रहे सुलह अधिकारी धीरेंद्र कुमार दोहरे ने बताया: हमने दोनों पक्षों को बुलाकर काउंसलिंग की, जिसके बाद दोनों के बीच सम्मानजनक सुलह हो गई है। बेटे ने अपनी गलती मानकर मां से माफी मांगी है और वह हर माह ₹10,000 भरण-पोषण के रूप में देगा। यदि भविष्य में बेटा इस सुलहनामे की शर्तों का पालन नहीं करता है या समझौता तोड़ता है, तो पीड़ित मां को दोबारा कानूनी कार्रवाई करने का पूरा अधिकार होगा।”
इस सुलह-समझौते के बाद बुजुर्ग मां के चेहरे पर राहत और संतोष के भाव दिखाई दिए। कोर्ट की चौखट पर हुए इस सुखद अंत ने समाज को संदेश दिया है कि बुजुर्ग माता-पिता की सेवा ही सबसे बड़ा धर्म है।
