बड़ी बहस : ब्राह्मण विधायकों के बैठक से क्यों ऐतराज ? क्या बीजेपी के गुलाम है ब्राह्मण..! 

  • उत्पीड़न, बढ़ते आरक्षण और कमजोर नेतृत्व से चिंतित है ब्राह्मण समाज , मौका पाते ही बदला लेने को तैयार वोटर
  • योगी की राजनीति को नुकसान पहुंचा सकता है प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी का बयान
  • ब्राह्मण विधायक वक्त आने पर देंगे जवाब या डालेंगे हथियार …!
52 ब्राम्हणो के कुटुंब भोज जुटान में ऐसी क्या बात हुई कि भाजपा में मच गई खलबली ? क्या भाजपा ने ब्राह्मणों को गुलाम बनाने के प्रोजेक्ट में सफलता प्राप्त कर ली है ! अगर बात राजनीति की करें तो पहले फेज में धर्म का चूरन चटा कर ब्राह्मणो को एक – एक कर कांग्रेस से बाहर निकलवाया फिर अटल बिहारी वाजपेयी नामक वह लॉलीपॉप पकड़ा दिया जिसका कोई लाभ  ब्राह्मण समुदाय को हुआ ही नहीं जबकि उसके पैरलल राजनाथ सिंह और कल्याण सिंह लगातार अपने समाज को आगे बढ़ाते रहें । दूसरे फेज में बचे ब्राह्मणो को ठिकाने लगाने के लिए दो ओबीसी नेता गुजरात से पूरी पार्टी हैक कर लेते है और इन्हीं ब्राह्मणो के दम पर यूपी की राजनीति से पहले मायावती को और फिर अखिलेश यादव को उखाड़ फेंकते है। सतीश चंद्र मिश्रा और जितिन प्रसाद के अच्छे नेतृत्व को समाप्त किया जाता है।
श्रीकांत शर्मा और दिनेश शर्मा को चुपचाप किनारे लगा दिया जाता है और किसी को भनक तक नहीं लगती। अब तीसरे फेज में पहले स्वतंत्र देव सिंह चौधरी, फिर भूपेंद्र चौधरी और ठीक उसके बाद पंकज चौधरी जैसे ओबीसी को प्रदेश का नेतृत्व सौप दिया जाता है ताकि पूरी राजनीति जातिवादी प्रक्रिया में शिफ्ट हो जाए और ओबीसी आरक्षण जो पहले 12% था वह बाद में 27% हुआ और अब इसे 42% करने की पहल शुरू हो सके कोई ब्राह्मण चू तक ना करें । सच कहुँ तो ब्राह्मणो के राजनीतिक नरसंहार की तैयारी चल रही है। टोटल सरेंडर करो और यह मानकर खुश रहो कि देश में हिंदू शासन है। क्षत्रिय के कुटुंब बैठक पर चुप रहने वाली भाजपा को ब्राम्हण जुटान से क्यों है तकलीफ.? इसका उत्तर अब अगर नहीं मिला तो आगे यूपी की सत्ता पर सपा का काबिज होना भी लगभग तय ही है । क्यूंकि दो ब्राह्मण मंत्री दया शंकर मिश्र दयालु और ब्रजेश पाठक दोनों से ब्राह्मण समाज नाराज है। क्यूंकि इन्होने अपने समाज के उत्थान की ना पहल की ना सदन में ब्राह्मणो के लिए कोई आवाज़ उठाई। जबकि ओमप्रकाश राजभर और संजय निषाद जैसे लोग अपने समाज के लिए लेटर पर लेटर लिख रहें।
गजब दशा है उत्तर प्रदेश की अब ! कुछ ब्राह्मण विधायक एक साथ बैठकर के चाय पानी पी लिये तो ये बात भारतीय जनता पार्टी के नए  प्रदेश अध्यक्ष  पंकज चौधरी को बुरी लग गई जबकि वह खुद कई बार कुर्मी समाज के कुटुंब बैठक का प्रतिनधित्व करते रहें है। अब जब वह ब्राह्मण विधायकों को धमकी दे दिए की अगर अगली बार इस तरह की बैठक होती है तो कार्यवाई होगी तो लगता है कि भाजपा में लोकतंत्र खत्म हो गया है। अब आपस में लोग बैठेंगे तो इस बात की अनुमति भी भाजपा अध्यक्ष से लेनी पड़ेगी ! हिंदुत्व के नाम पर ब्राह्मण के साथ भाजपा का छल कही भाजपा को भारी ना पड़ जाए   ! अपवाद स्वरूप देवेंद्र फडणवीस को छोड़ दें तो किसी जनप्रिय ब्राह्मण नेता को भाजपा कभी आगे नहीं बढ़ाता दिखा । अगर संजय जोशी आगे बढ़ गए तो क्या नरेंद्र मोदी को आउटशाइन नहीं कर देंगे ? फिर प्रोजेक्ट अंबेडकरी हिंदुत्व कैसे लागू होगा ? इसीलिए भाजपा को ब्राह्मण गुलाम चाहिए। बिहार में यह प्रक्रिया पूर्ण हो गई है और कभी सत्ता के केंद्र में रहने वाला ब्राह्मण आज बिहार समेत कई राज्यों में पूर्णतया बंधक हो गया है। उसकी राजनीतिक महत्वाकांक्षा ही समाप्त हो गई है। सीमा द्विवेदी जैसे लोग कठपुतली बन कर केवल प्रॉपर्टी जमा कर रहें।
ब्राह्मण समाज अब खुलकर इनसे टिकट तक नहीं माँग पा रहा है, न प्रशासन में है, न मंत्रालयों में है, न नौकरी में है। अपने ऊपर हो रहे जातिगत अत्याचारों पर बोल तक नहीं पा रहा है। ब्राह्मणो नें कांग्रेस से निकलने के बाद पूर्णतया अपनी प्राथमिक पहचान हिंदू कर ली है और हिंदू राज देखकर खुश रहता है। जिस पार्टी में अभी हाल ही में विभिन्न सवर्ण–ओबीसी जातियों के जन-प्रतिनिधियों की जातीय बैठक हो चुकी है, वहाँ से इन मानसिक गुलाम विधायकों की बैठक पर ऐसी तीव्र प्रतिक्रिया क्यों आती और फिर रत्नाकर मिश्र को सफाई क्यों देनी पड़ती ? यह तो अच्छा हुआ कि पंकज चौधरी ने सिर्फ़ लेटर जारी किया है, अगर मोहन भागवत तक ख़बर पहुँचती तो इन जाति बनाने वाले हिंदू-विरोधी ब्राह्मणों पर कोड़े बरसाते हुए रेशीमबाग बुलाने का हुक्म जारी कर सकते थे। यूपी के सीएम पर ब्राम्हण विरोधी होने का कलंक लगता रहा है ऐसे में यदि वोटर नाराज हुए तो सपा की चांदी हो जाएगी क्यूंकि लोकसभा चुनाव में इन्हीं ब्राह्मण वोटरों नें चार सौ पार के नारे की हवा निकाल दी थी। भाजपा अध्यक्ष पंकज चौधरी  की नाराज़गी से ब्राह्मण विधायकों को कितना नुकसान होगा या नहीं, यह अलग विषय है, लेकिन इस तरह के बयान देकर वे जाने अनजाने में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी की राजनीतिक साख को सीधा नुकसान पहुँचा रहे हैं। और अब उन्हें प्रदेश अध्यक्ष पद से हटाने तक का नारा बुलंद हो रहा।
किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में समाज के विधायकों को यह स्वतंत्रता और अधिकार होना चाहिए कि वे आपस में बैठकर अपने समाज की समस्याओं, अपेक्षाओं और भविष्य पर विचार कर सकें। इस पर रोक या आपत्ति न सिर्फ असंवैधानिक सोच को दर्शाती है, बल्कि इससे ब्राह्मण समाज में गलत, अपमानजनक और निराशाजनक संदेश जाता है। नेतृत्व का काम समाजों को जोड़ना होता है, दबाना नहीं।किसी भी समूह का सोशल और पोलिटिकल कैपिटल उसका मध्यमवर्गीय  चेतना होता है। अमीरों के लिए इन सब नॉनसेन्स में पड़ने का वक्त नहीं है, गरीब को प्रत्यक्ष कुछ दांव पर दिखता नहीं है।कांग्रेस के पतन के बाद , बगैर स्ट्रीट पर आए सत्ता के व्यवहार को प्रभावित करने की ब्राह्मणों के क्षमता को संघ ने समझ लिया था। इसलिए संघ – भाजपा ने डर के हथियार से ब्राह्मणों के मध्यमवर्गीय समूह को ट्रैप कर लिया है। जहां एक तरफ मुसलमान और  उनकी ऐतिहासिक कारणों का प्राइमरी डर है और दूसरी तरफ रैडिकल अंबेडकरवाद का नया डर है।
किसी भी ब्राह्मणों के फंक्शन शादी-विवाह इत्यादि में चले जाइए। 10 में से 9 ब्राह्मण भाजपाई है मोदी-योगी उसके नेता है। स्तिथि ऐसी बन गई है कि भाजपा सोने का हार छीनकर ब्राह्मणों को पायल पकड़ा रही है और इसको प्रत्यक्ष देखने के बावजूद ब्राह्मणों का एक बड़ा समूह उसमें संतोष कर ले रहा है। एक ब्राह्मण लड़के का पोस्ट पढ़ा कि उसके भतीजे पर स्कूल मे हुई बच्चों की लड़ाई में एसटी एससी ऐक्ट लग गया। यह स्टेट का आम ब्राह्मण के साथ युद्ध नहीं है तो क्या है ? अच्छे मार्क्स लाकर डिज़र्विंग संस्थानों से वंचित रहो , नौकरियों से वंचित रहो और इन सब को नियति मानकर संतोष कर लो तो स्टेट प्रिविलिज्ड पाई हुई जातियों के हेट कैम्पैन का शिकार हो जाओ। कन्हैया कुमार और स्वामी प्रसाद जैसे खैराती तुम्हे धकियाते और गरियाते फिरे। बतौर नागरिक यह जन्म के आधार पर भेदभाव है कि नहीं ? दुनिया मे ऐसा कौन सा गणराज्य है जो अपने नागरिकों के साथ ऐसा कर रहा है ? यह सब तो चलते आ रहा था मगर भाजपा ने अब ब्राह्मणों के राजनैतिक अंत की पटकथा भी लिख दी है। अब ब्राह्मणों का नेता भी ब्राह्मण नहीं बनाएंगे बल्कि संघ-भाजपा के भाई-साहब लोग बनाएंगे। और जब संघ-भाजपा के लोग ही ब्राह्मण नेता बनाएंगे तो कोई ब्राह्मण नेता ब्राह्मणों के मुद्दे पर क्यों बोलेगा उदाहरण के लिए रीता बहुगुणा जोशी और मनोज तिवारी को लें लीजिये।
उन्हें डर है कि अपने समाज की बात किए और कहीं अमित शाह भाई साहब फोन करके धुत्कार दिए तो ? आईएएस वर्मा वाले मुद्दे पर पूरे देश में किसी भाजपा के ब्राह्मण नेता सदन में मुँह नहीं खुला। ना किसी ने उसे अपने अहं पर लेकर उसके बयान के कंसीक्वेंसेज़ तक उसे पहुंचाया। एकमात्र बयान लोजपा के नेता राजू तिवारी का था , जो ब्राह्मणों की राजनीति करके नेता बनें है।भाजपा के भाई साहबों और स्थानीय भाजपा सांसद ने तो एडी-चोटी का जोर लगा दिया था उसे भी हराने के लिए। ऐसे फैसले पार्टी की मजबूती नहीं, बल्कि भीतर की दरारों को और गहरा करते हैं। सोशल मिडिया पर कोई सज्जन लिखते है कि कभी कभी मेरा भी मन करता है कि किसी मंत्री के साथ फोटो खिंचवाऊं और वीडियो बनाऊं। उसके साथ हाथ चमकाते हुए, मुंह बिजकाते हुए फोटो आये, जिसमें लगे कि मैं उसे बता रहा हूं कि यह विकास ठीक नहीं हुआ है, वहां का विकास टेढ़ा है, इधर का विकास पतला है, उधर विकास को पीलिया हो गया है, केवल चेले का विकास हो रहा है, यह विकास नहीं चलेगा, खुद का विकास ज्‍यादा जरूरी है आदि आदि. ताकि लोग समझ सकें कि प्रदेश में जो विकास हो रहा है वह मोदी शाह और पंकज चौधरी नें ही करवाया है।
पंकज सीबी मिश्रा, राजनीतिक विश्लेषक एवं पत्रकार, जौनपुर यूपी 

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