द्वेष और ईर्ष्या में जीवन न गंवाएं, सद्कर्मों से बनाएं जीवन सार्थक : वेदाचार्य योगेंद्र याज्ञिक

  • प्रेम, परोपकार और आध्यात्मिकता को जीवन का आधार बनाने का आह्वान
कानपुर। मानव जीवन संघर्ष, क्लेश, ईर्ष्या और आपसी द्वेष में जीवन बिताने के लिए नहीं मिला है। जीवन का वास्तविक उद्देश्य अपने सीमित समय का सदुपयोग करते हुए सद्कर्म करना, दूसरों के प्रति प्रेम और सौहार्द की भावना रखना तथा समाज और मानवता के लिए उपयोगी बनना है। यह विचार होशंगाबाद से पधारे वेदाचार्य योगेंद्र याज्ञिक ने व्यक्त किए।
आर्य समाज गोबिन्द नगर के तत्वावधान में आयोजित वेद प्रचार महोत्सव में वेदाचार्य योगेंद्र याज्ञिक ने अपने संबोधन में कहा कि मनुष्य को अपने जीवन की वास्तविकता को समझते हुए प्रत्येक क्षण का सदुपयोग करना चाहिए। जीवन में सोने, बाल्यावस्था, वृद्धावस्था, परिवार और सामाजिक दायित्वों में काफी समय व्यतीत हो जाता है। ऐसे में जो समय हमारे पास उपलब्ध है, उसे आपसी विवाद, ईर्ष्या, अहंकार और अनावश्यक संघर्ष में नष्ट करने के बजाय सेवा, परोपकार और आत्मिक उन्नति में लगाना चाहिए।
उन्होंने कहा कि मनुष्य संसार में खाली हाथ आता है और अंततः उसे अपने भौतिक मोह-माया और सांसारिक संबंधों को पीछे छोड़कर जाना पड़ता है। इसके बावजूद व्यक्ति जीवनभर धन, प्रतिष्ठा, प्रतिस्पर्धा और दूसरों से स्वयं को श्रेष्ठ साबित करने की होड़ में उलझा रहता है। यही मोह और अहंकार कई बार जीवन में अशांति का कारण बनते हैं।
महाभारत से भी मिलता है अहंकार और संघर्ष का संदेश
वेदाचार्य योगेंद्र याज्ञिक ने महाभारत के प्रसंगों का उल्लेख करते हुए कहा कि जब मनुष्य के भीतर अहंकार, मोह, ईर्ष्या और प्रतिद्वंद्विता बढ़ जाती है तो उसके परिणाम गंभीर हो सकते हैं। महाभारत का प्रसंग मानव समाज को यह सीख देता है कि व्यक्तिगत स्वार्थ और श्रेष्ठता सिद्ध करने की जिद अंततः व्यापक संघर्ष का कारण बन सकती है।
उन्होंने कहा कि आज आवश्यकता इस बात की है कि मनुष्य बाहरी प्रदूषण के साथ-साथ अपने मन के भीतर मौजूद नकारात्मकता को भी दूर करे। आधुनिक जीवन की भागदौड़, तनाव, असंतुलित दिनचर्या और खान-पान का प्रभाव व्यक्ति के शरीर और मन दोनों पर पड़ता है। इसलिए स्वस्थ एवं संतुलित जीवन के साथ सकारात्मक चिंतन भी आवश्यक है।
ईश्वर से मांगें सद्मार्ग पर चलने की शक्ति
वेदाचार्य ने कहा कि ईश्वर से केवल सांसारिक सुख-सुविधाएं मांगने के बजाय यह प्रार्थना करनी चाहिए कि हमारा जीवन निरंतर उन्नति और सदाचार के मार्ग पर आगे बढ़े। हमारे कर्मों से किसी को अनावश्यक पीड़ा न पहुंचे और जीवन के अंतिम पड़ाव पर हमें अपने किए हुए कर्मों को लेकर पछतावा न हो।
उन्होंने कहा कि प्रत्येक व्यक्ति को अपने दायित्वों का निर्वहन पूरी ईमानदारी, निष्ठा और पवित्र भावना से करना चाहिए। जीवन की वास्तविक उपलब्धि केवल धन और प्रतिष्ठा अर्जित करना नहीं, बल्कि अपने आचरण से परिवार, समाज और मानवता के लिए सकारात्मक योगदान देना है।
प्रेम और परोपकार से ही जीवन बनेगा सार्थक
वेदाचार्य योगेंद्र याज्ञिक ने कहा कि मनुष्य को दूसरों को पीछे करने के बजाय स्वयं को बेहतर बनाने का प्रयास करना चाहिए। द्वेष के स्थान पर प्रेम, विवाद के स्थान पर संवाद, स्वार्थ के स्थान पर परोपकार और अहंकार के स्थान पर विनम्रता को जीवन का आधार बनाना चाहिए।
उन्होंने कहा कि जीवन बहुत मूल्यवान है, समय सीमित है और प्रत्येक क्षण वापस नहीं आता। इसलिए जीवन को ईर्ष्या और संघर्ष में नहीं, बल्कि सद्कर्म, सेवा, प्रेम और आध्यात्मिक चेतना में लगाना चाहिए। ऐसा जीवन ही अंततः आत्मसंतोष और वास्तविक आनंद प्रदान करता है।
वेदाचार्य ने सभी से आह्वान किया कि वे अपने जीवन को सकारात्मक दिशा दें, दूसरों के जीवन में खुशियां लाने का प्रयास करें और समाज में प्रेम, शांति, सद्भाव एवं मानवता की भावना को मजबूत करने में अपना योगदान दें।
प्रमुख रूप से उपस्थित रहे
वेद प्रचार महोत्सव में वीरा चोपड़ा, शुभ कुमार वोहरा, वीरेन्द्र मल्होत्रा, चन्द्रकान्ता गेरा, डॉ. संतोष अरोड़ा, प्रकाश वीर आर्य, अनिल चोपड़ा, शकुंतला मेहंदी रत्ता सहित अनेक आर्यजन एवं गणमान्य नागरिक उपस्थित रहे तथा उन्होंने वेदाचार्य योगेंद्र याज्ञिक के आध्यात्मिक एवं प्रेरणादायी विचारों का श्रवण किया।

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