संसद का विशेष सत्र में नारी वंदन अधिनियम लागू कर दिया गया। इसी के साथ लोकसभा क्षेत्र के परिसीमन की भी बात की जा रही है इस नए डीलिमिटेशन बिल के माध्यम से जहां महिलाओ को सदन में 33% आरक्षण देने का गजट जारी हो चुका है। अब राजनिती के प्वाइंट टेबल का सारा समीकरण दिलचस्प होगा। देश का नरेटिव दो हिस्सों में चल रहा है। महिलाओं को चर्चा का हिस्सा बनाया जा रहा है चाहे वो सोनम रघुवंशी के रूप में हो या किसी प्रियंका के रूप में, चाहे मोनालिसा के रूप में हो या हर उस महिला के रूप में जो आजकल के स्ट्रेटेजिक मास्टर प्लान का अनचाहे ही हिस्सा बनते जा रही है। इसमें इन्फ्लूएशर कनिका शर्मा भी है, वायरल बड़ा पाव गर्ल चंद्रिका दीक्षित भी है और कई सारी है जिनको आगे कर महिला सशक्तिकरण के प्रयासों को बढ़ाया अथवा रोका जा सकता था।
इन सभी चर्चाओं में या तो महिलाओं को डराया जाए या फिर अपनी फेमिनिज्म की रक्षा के लिए खुद को डिफेंड करने के लिए बोलने पर सदन में मजबूर किया जाए । जब दोनों तरफ की राजनीति दो हिस्से बंट जाएं तो आरक्षण के हिसाब से उनका उनकी क्रेडिबिलिटी के हिसाब से भविष्य में इस्तेमाल कर लिया जाएगा। कुल मिलाकर निष्कर्ष निकाले तो महिला आरक्षण के दौर में महिलाओं की भागीदारी बढ़ेगी, लेकिन अगर उन्हें सिर्फ नैरेटिव का हिस्सा बनाकर पेश किया जायेगा , तो असली सशक्तिकरण की जगह प्रतीकात्मक राजनीति हावी हो सकती है। सरकार ने सरकार के मंत्रियों ने और खुद प्रधानमंत्री ने इस बिल का जिक्र करते हुए कहा हर राज्य में डेढ़ गुना सीट हो जाएगी और आनुपातिक रूप से यह प्रतिनिधित्व बढ़ा दिया जाएगा। असम का आने वाला विधानसभा चुनाव का परिणाम इसकी समीक्षा करेगा ?
हो सकता है वहां पॉपुलर वोट कांग्रेस को ज्यादा मिले लेकिन सीट भारतीय जनता पार्टी को ज्यादा तो और बेहतर समझने के लिए अपने-अपने शहर के भाजपा शासित राज्यों के नगर पालिका वार्डों के नए परिसीमन को भी हम देख सकते हैं जहां पर भी लगभग इसी तरह की कोशिश की जाती रही है। कांग्रेस के वोट जिन क्षेत्रों में है वह वार्ड 1000 के ऊपर की जनसंख्या के निर्धारित किए जा रहे हैं जबकि जो क्षेत्र भारतीय जनता पार्टी के प्रति प्रतिबद्ध है वहां पर 300 _400 वोटो के, यह अनुपात प्रति 1000 वोटो को लेकर है। इस आधार वार्ड बनाकर परिसीमन के इस खेल में स्थानीय चुनाव आयोग अपना मुंह काला करता रहा है। एक पार्टी विशेष के हित में होगी,और एक महत्वपूर्ण बात और इस बिल में है इस धारा 81 में जो परिवर्तन किया जा रहा है उसे संविधान से हटाकर सामान्य कानून के तहत लाया जा रहा है! ताकि कभी भी उस कानून को बनाने हटाने के लिए तीन चौथाई बहुमत की आवश्यकता नहीं रहे सामान्य बहुमत से भी ऐसा किया जा सके? देश की सत्ता को चोरी से हथियाना के लिए मशीनों के खेल स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन के नाम से मतदाताओं का डीलेशन, और अब परिसीमन ?
आखिर सत्ता इतनी कमजोर क्यों नजर आ रही है ? और इसी बात को लेकर पूरे देश में विमर्श स्थापित करने की कोशिश की जा रही है। लेकिन सच्चाई यह है कि इस बिल के माध्यमसे प्रत्येक राज्य में जो सीट बढ़ाई जा रही है वह आनुपातिक रूप से इस बिल में अंकित नहीं की गई है! सन 1971 के पहले संविधान में स्पष्ट लिखा हुआ था हर जनगणना के बाद लोकसभा क्षेत्र में नए सिरे से परिसीमन किया जाएगा। लेकिन 1971 में संविधान के क्षेत्र 81 मेंबदलाव किया गया था और यह लिखा गया था जो वर्तमान में लोकसभा की सीट हैं उन्होंने परिवर्तन नहीं किया जाएगा परिसीमन के बाद भी । आपातकाल के बाद जब पहली गैर कांग्रेसी सरकार आई तब भी इस संविधान के संशोधन को नहीं बदला गया बाद में जब 2001 में अटल बिहारी वाजपेई जी की सरकार आई और यही सवाल उठा तो उन्होंने कहा इस बोतल के ढक्कन को बंद रहने दिया जाना चाहिए वरना इसमें से जो जिन्न निकलेगा , वह देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था कोअस्त व्यस्त कर सकता है ? उस समय भी इसका परिवर्तन नहीं किया गया और आज तक वही कलेवर है ? तब से ही संविधान का क्षेत्र 81 लोकसभा सीटों के निर्धारण में एक मार्गदर्शक भूमिका अदा करता रहा है!
नारी वंदन अधिनियम एवं डीलिमिटेशन बिल के इस माध्यम से सरकार की जो मूल मंशा है वह चौंकाने वाली है। सरकार बिल लाने के पूर्व अपने वक्तव्य में कह रही है की हर राज्य की 50% सीट बढ़ जाएगी, लेकिन दूसरी तरफ नारी आरक्षण के नाम पर की जा रही इस कवायद को डेलीटेशन बिल में यह कहकर ओवरलैप किया जा रहा है, परिसीमन का परिवर्तन जो भी वर्तमान में अंतिम जनगणना है उसके आधार पर किया जाएगा । बस यही से नेताओं की सत्ता का खेल प्रारंभ हो रहा है।
अगर हर राज्य में आनुपातिक रूप से 50% बढ़ाया जाता तो शायद उचित था? सरकार जो कह रही है उस भाषा के अनुसार तो तमिलनाडु में 39 से 59 सीट हो जानी चाहिए केरल में 20 से 30 सीट हो जानी चाहिए और उत्तर प्रदेश में 80से 120 लेकिन अगर डीलिमिटेशन कानून के साथ इस नारी वंदन अधिनियम को जोड़ाजाए तो तमिलनाडु में यह 50, केरल में सिर्फ 23 और बिहार में 60 की जगह 72 और उत्तर प्रदेश में 120 की जगह 138 हो जाएगी। विपक्ष की माने तो जो सरकार विरोधी क्षेत्र है वहां सीटें कम करने का प्रयास किया जा सकता है, और जहां सरकार के पक्ष के क्षेत्र हैं वहां सीटों की संख्या अपेक्षाकृत ज्यादा बढ़ाए जाने की कोशिश की जा सकती है । असम इसके प्रयोगशाला थी जहां अभी विधानसभा चुनाव में इसी परिसीमन के आधार पर भारतीय जनता पार्टी बहुमत का दावा कर रही है।

पंकज सीबी मिश्रा / राजनीतिक विश्लेषक एवं पत्रकार जौनपुर यूपी
