व्यंग्य : दीये का उत्सव बनाम दिए का उत्सव

हमारा देश उत्सवों का देश है जहां देने और लेने दोनो का उत्सव मनाया जाता है। जी हाँ ! दिए का उत्सव और दीये का उत्सव, ये दोनो एक साथ मनाया जाता है। नरक चतुर्दशी से शुरुआत होती है दिवाली की और दिल्ली की दीवाली में हफ्ता भर पहले से हप्ता भर बाद तक दिए का उत्सव चलता है । दिल्ली-एनसीआर वालों के लिए यह संजोग अभी अभी बना है । समझ नहीं आता यह दिवाली  सीजन है या चुनावी सीजन । हर तरफ पटाखे और धुंध-धुएं से उमंग-उत्साह की जान पर बन आई है लोगो को पोलूशन का खतरा दिखाई देने लगा होगा । हम लोग तो यूपी में सरकार भरोसे बैठे हैं तो हमारी  सरकारें भगवान भरोसे। दुनियां कहती हैं त्राहिमाम त्राहिमाम त्राहिमाम की जगह ,राम राम कहिये  जाहि विधि राखे राम ताहि विधि रहिए। अब तो अगलें साल राम के अयोध्या लौटने के बाद ही राहत की उम्मीद है। रामराज्य में दिवाली से पहले श्रीमती जी नें  यह बोलकर चौका दिया कि पूरी साफ सफाई खुद करो  ! मैंने कहा तुम भी साथ दो तो मुझे रसोई में झोंक दिया और कहा कि काम वाली बाई ने अचानक छुट्टी कर ली है, जाओ सिंक में पड़े बर्तन मांज दो। बस देवत्वबोध आ गया । आ गए अपनी औकात पर। एक दिन का भगवन, बाकी भगत। वैसे यह एक दिन का देवत्वबोध भी बड़ा संतोष देता है। हम जैसे सामाजिक जीवन जीने वालों के लिए जीवनबीमा की दिवाली और करवा चौथ सबसे महंगे प्रीमियम वाली पॉलिसी है। न चाहते हुए भी भरे चले जाने की मजबूरी । ऊपर से यह आशंका सालभर सचेत रखती है कि कहीं भूले से भी पॉलिसी ब्रेक हुई तो रेनूवल नहीं है । इसलिए इस भाव से लगे रहो कि प्राण जाए पर त्योहार न जाए। सच कहूं तो कुंआरेपन की ख़ुशी ज्यादा बेहतर लगती है। तब  करवा चौथ अपन के लिए डीडीएलजे में हुआ उत्सव या इवेंट लगता था और अबसे ज्यादा कुछ नहीं होता था। दरअसल अपने गांव तो ऐसी कोई परम्परा थी नहीं, सो जिंदगी के तीसरे दशक में प्रवेश से पहले तक पूरी तरह अपरिचित रहा। जब पहली बार फिल्मों में देखा तो लगा शायद यह भी कोई श्रृंगार उत्सव है, जिसमें अक़्सर आसमान को सिर पर उठा लेने वाली जमीं का चाँद आसमान के चाँद का दीदार छन्नी से करती है और फिर उसी छन्नी से उस आदमी का जिसकी शक्ल-अक्ल का रोना वह सालभर रोया करती है। पता नहीं वह कौन सा खगोलीय संयोग होता है कि उसी शक्ल में अचानक उसे अपना आराध्य दिखने लगता है। खैर बुजुर्ग शायद इसीलिए कह गए हैं- मन चंगा तो कठौती में गंगा जमुना सरस्वती और गोदावरी। वैसे इस कठौत में गंगादर्शन करते  दशक बीत चुके। पर अब प्रायः लगता है कि कठौत में श्रद्धा से ज्यादा सौंदर्य और समृद्धि प्रदर्शन का मिश्रित गंगाजल होता है। अब दिवाली का अलग ही झालर दार प्रदर्शन जिसमें इंसान को लटकना ही है दीवारों से सटकर।
पंकज सीबी मिश्रा
राजनीतिक व्यंग्यकार एवं पत्रकार
जौनपुर यूपी

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