भावनानी के व्यंग्यात्मक भाव – शासकीय सेवा नहीं मेवा खाने आया हूं

लेखक, चिंतक, कवि – किशन सनमुख़दास भावनानी गोंदिया महाराष्ट्र
शासकीय सेवा में हरे गुलाबी छापने आया हूं
मजे से जनता को चकरे खिलाने आया हूं
वेतन पेंशन नहीं ऊपरी कमाई के लिए आया हूं
शासकीय सेवा नहीं मेवा खाने आया हूं
गांव में ईमानदारी से रहकर पछताया हूं
बच्चों के लिए कुछ भी प्रॉपर्टी नहीं बनाया हूं
शासकीय दोस्तोंके दूसरे नामोंपर फ्लैट्स देखाहूं
शासकीय सेवा नहीं मेवा खाने आया हूं
इतने साल ईमानदारीका जीवन जीकर पछतायाहूं
अब शासकीय सेवा में हरे गुलाबी छापनें आया हूं
अब सही निर्णय लेकर जनताको घुमाना चालू किया हूं शासकीय सेवा नहीं मेवा खाने आया हूं
बताना मत अंदर खाने बहुत लफड़ा किया हूं
जन्म जाति सहित सभी प्रमाण पत्र जाली दिया हूं
अनुकंपा के बलपर ऊपर तक सेटिंग किया हूं
शासकीय सेवा नहीं मेवा खाने आया हूं
चकरे खिलाकर माल देने प्रोत्साहित करता हूं
शिकायत पर सेटिंग कर काम रिजेक्ट करवाता हूं
महीनों कागजी कार्रवाई फिर रिजेक्ट करता हूं
शासकीय सेवा नहीं मेवा खाने आया हूं

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