व्यंग्य : फिकेपन का भी अपना राजनीतिक स्वाद 

धीरे-धीरे आलोचनाओं वाला मौसम आ गया था। लेकिन आलोचना वाला फीलिंग नहीं आ पा रहा था। लोग अपने-अपने ढंग से जोर लगा रहे थे। कोई पत्थर – तलवार छोड़, कलम पकड़ने की और मिडिया खरीदने की अपील कर रहा था, कोई ‘गोली मारो भालो को’ का ऐलान कर रहा था, कोई धर्म पूछकर दुकान चलाने का फ़रमान जारी कर रहा था, कोई संसद में हाथ नचा नचा मोदी को चिढ़ा रहा था, कोई बेआवाज वफ्फ के नाम से हज़ारों बीघा क़ब्ज़ा कर ले रहा था, दंगे हो रहे थे, आग लगाए जा रहे थे, न्यायिक फ़ैसले हो रहे थे, कोई ज़ोर लगाए हुए थी, कटने-काटने की अपील हो रही थी । तू तड़ाक वाली दोस्ती भी अब आ देख लूंगा में बदल गई। डप्पू  – हेलो हेलो डोलू ! मैं डप्पू  बोल रहा हूँ योर डिअर फ्रेंड । यार तू जिज्जी वाली सीट को बचा ले ,  मम्मी जी के सारे श्रोत गोता खा गये हैं , बहुत नुकसान हो जायेगा उनका।
डोलू – सुनाई नही दे रहा ठीक से , टावर नही आ रहा है मोबाइल में । रुक जाओ हम इधर से करता है । हां मैं ये कह रहा था कि जिज्जी की सीट  तो हम बचा लेंगे पर नुकसान की भरपाई तुमको खुद करना होगा । डप्पू  जी – डोलू  नुकसान की भरपाई मैं कैसे करूंगा।  मैं तो गरीब हूँ। मेरा बचपन गरीबी में बीता है। मेरी माँ …डोलू – अच्छा अच्छा ठीक है …. सुन अपने वालों की एक एक किडनी बेच दो और इनका 5 किलो फ्री राशन बंद करवानें को यात्रा निकाल दो। बहुत हो गया फ्री । बलिदान देना होगा किसी न किसी को तभी मिलेगी सत्ता। बिना बलिदान के क्रांति नही होती। सत्ता पाने वाली फीलिंग कराने की तमाम कोशिशें अपने-अपने ढंग से हो रही थीं। लेकिन सब कोशिशों के बावजूद उदात्त अंतर्राष्ट्रीय गौरव का  एहसास नहीं हो पा रहा । अभी तक क्या नहीं था हमारे पास? राष्ट्रकवि, राष्ट्रीय पक्षी, राष्ट्रीय पशु आदि थे। परंतु राष्ट्रीय गुंडा नहीं था। अब जाकर हमें यह राष्ट्रीय गुंडा मिला तो थोड़ा संतोष हुआ कि देर से ही सही थोड़ा गौरव करने लायक़ एक बात तो हुई। सीना थोड़ा चौड़ा हुआ। लगे हाथ मालूम हुआ कि अब यह देश दुनिया में कहीं भी आतंक फैला सकता है। अंतर्राष्ट्रीय आतंकवाद का सेहरा इसके सिर बँधा। सीना तो फूलकर कुप्पा हो गया। लेकिन विपक्ष की एक कमी अभी बाक़ी थी। अभी तक यहीं का पैसा लेकर लोग विदेश भागते थे।
अब एक राज्य में घोखाधड़ी करके लोग दूसरे में आराम फ़रमाते हैं। अब अंतर्राष्ट्रीय जालसाज़ की कमी भी पूरी हो गई। कोई ज़रूरत नहीं है इसे केन्या, श्रीलंका, चीन, पाकिस्तान आदि के साथ जोड़ने की। आलोचना के गौरव की अनुभूति को जाया मत होने दीजिए। हिंदुत्वा इकोसिस्टम में कौम के उत्थान के लिए विपक्ष द्वारा सिस्टम में सोशल मीडिया के जरिए, नॉन स्टॉप चौबीसों घंटे बारहों महीने खोपड़ी के भीतर धुलाई सफाई और डाटा फीडिंग होती रहती है। आम आदमी हरदम पोस्ट पढ़ता, वीडियो क्लिप्स देखता रहता है और दिमाग में अच्छी तरह बैठवा लेता है कि फलाने ने देश का नाश किया और यात्रा वाला वराह अवतार धारण करके देश का उद्धार करनें आया  हैं, आम आदमी अच्छी तरह बैठवा लेता है कि गैस सिलेंडर चाहे हजार का मिले या उससे ज्यादा का, अगर ब्लेंडर्स प्राइड पी सकते है तो सिलेंडर का ऊंचा प्राइस भी दे सकते हैं, अच्छी तरह बैठवा लेता है कि खुल्लो को टाइट रखने के लिए अगर डेढ़ दो सौ रुपए लीटर में पेट्रोल लेना पड़े तो खुशी खुशी ले लेना चाहिए। इस इकोसिस्टम के बाहर देश दुनिया में क्या चल रहा ये देखने समझने जानने की इन्हे जरूरत नही है। अब हमारे पास बहुत कुछ है – राष्ट्रीय गुंडा है, अंतर्राष्ट्रीय आतंकवाद का सेहरा वाला विपक्ष है, राष्ट्रीय फ्रॉड है और आलोचना में तो अभी बहुत बचा ही हुआ है।

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